जमुई: आजादी के दशकों बाद आदिवासी बहुल इलाके में पक्की सड़क और पुल-पुलिया का सपना पूरा होने की उम्मीद जगी, लेकिन निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर उठे सवालों ने इसे सवालों के घेरे में ला दिया है. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत करीब 1 करोड़ 23 लाख रुपये की लागत से बन रही सड़क और पुलिया में कथित अनियमितता का आरोप लगा है. ग्रामीणों का कहना है कि झनी नदी पर बन रही पुलिया की ढलाई के बाद ही मसाला हाथ से झड़ रहा है. वहीं, सरिया के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. नाराज ग्रामीणों ने निर्माण कार्य रुकवा दिया और गुणवत्ता की जांच की मांग की.
मामला सोनो प्रखंड के बटिया थाना क्षेत्र का है. बटिया से बुच्ची गांव तक करीब 1.5 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कराया जा रहा है. योजना के तहत सड़क पर लगभग तीन पुल-पुलियों का निर्माण होना है. इसी क्रम में झनी नदी पर पुलिया बनाई जा रही है. ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण में निर्धारित गुणवत्ता मानकों की अनदेखी की जा रही है. लिहाजा, उन्होंने मौके पर पहुंचकर विरोध जताया और निर्माण कार्य की तकनीकी जांच की मांग की.
ढलाई के बाद ही झड़ने लगा मसाला
दरअसल, ग्रामीणों का कहना है कि पुलिया की ढलाई के बाद ही मसाला झड़ने लगा है. ऐसे में सवाल उठता है कि यदि निर्माण की गुणवत्ता अभी से सवालों के घेरे में है, तो बाढ़ और तेज बारिश के दौरान पुलिया कितनी मजबूत रहेगी? ग्रामीणों ने स्लैब की ढलाई में सरिया के इस्तेमाल और गुणवत्तापूर्ण निर्माण सामग्री की मांग उठाई. उनका कहना है कि सरकारी राशि से बन रहे इस महत्वपूर्ण निर्माण में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
शिकायत पर पहुंचे जेई, डीपीआर का दिया हवाला
ग्रामीणों की शिकायत पर ग्रामीण कार्य विभाग, झाझा प्रमंडल के जेई राजकुमार दुबे निर्माण स्थल पर पहुंचे. हालांकि, ग्रामीणों के सवालों के बीच निर्माण की गुणवत्ता और सरिया के इस्तेमाल को लेकर उनका जवाब चर्चा का विषय बन गया.
जेई राजकुमार दुबे ने कहा कि डीपीआर पटना से तैयार होता है और विभाग को जो एस्टीमेट दिया गया है, उसी के अनुसार काम कराया जा रहा है. उनका कहना था कि एस्टीमेट में स्लैब के लिए सरिया का प्रावधान नहीं है, ऐसे में वे सरिया कैसे लगवा सकते हैं.
जेई के इस बयान से सवाल उठने लगे हैं कि आखिर झनी नदी पर बन रही पुलिया के निर्माण का प्राक्कलन किस तकनीकी आधार पर तैयार किया गया है? यदि संबंधित स्लैब में सरिया का प्रावधान नहीं है, तो क्या इसकी तकनीकी उपयुक्तता और सुरक्षा का आकलन किया गया है? वहीं, ढलाई के बाद मसाला झड़ने की ग्रामीणों की शिकायत पर भी तकनीकी जांच जरूरी है.
डीपीआर बनी तो स्थानीय हालात का आकलन हुआ या नहीं?
ग्रामीणों के विरोध के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि जमुई के आदिवासी और पिछड़े इलाके में नदी-नालों की भौगोलिक स्थिति, बरसात और बाढ़ की आशंका को ध्यान में रखकर निर्माण का प्राक्कलन तैयार किया गया या नहीं. यदि डीपीआर में किसी जरूरी निर्माण सामग्री का प्रावधान नहीं है, तो संबंधित तकनीकी अधिकारियों को इसकी समीक्षा करनी चाहिए. हालांकि, सरिया के प्रावधान और पुलिया की मजबूती से जुड़े सवालों का अंतिम जवाब तकनीकी दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकेगा.
ग्रामीणों ने गुणवत्ता जांच की उठाई मांग
शिवलाल सोरेन, चंदारी राय, बड़कू मरांडी सहित अन्य ग्रामीणों ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए विरोध जताया. ग्रामीणों की मांग है कि पुलिया की तकनीकी जांच कराई जाए और निर्माण में निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाए. उनका कहना है कि यह सड़क आसपास के गांवों के आवागमन के लिए महत्वपूर्ण है. ऐसे में निर्माण कार्य में किसी भी तरह की कथित गड़बड़ी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.
बहरहाल, करीब 1 करोड़ 23 लाख रुपये की लागत वाली इस योजना में उठे सवालों का जवाब संबंधित विभाग को देना होगा. हालांकि, फिलहाल ग्रामीणों के आरोप और जेई का डीपीआर संबंधी बयान ही सामने आया है. निर्माण की वास्तविक स्थिति, सरिया के प्रावधान और मसाला झड़ने की वजह स्पष्ट करने के लिए निष्पक्ष तकनीकी जांच जरूरी है. अब देखना होगा कि विभाग निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच कराता है या ग्रामीणों की शिकायत केवल बयानबाजी तक सीमित रह जाती है.
अभिषेक निराला की रिपोर्ट