बीजेपी के 'माहिष्मती' में सेंधमारी: पहले बांकीपुर सीट हाथ से गई और अब पटना शिक्षक निर्वाचन सीट
ऐसे भारतीय जनता पार्टी के एक के बाद एक किले ध्वस्त होते रहे, तो यह उसके लिए आने वाले समय में गंभीर संकट का सबब बन सकता है. जरूरी है कि पार्टी आलाकमान और इसके कर्ता-धर्ता इसे गंभीरता से लें और दूर हो रहे वोटरों में उम्मीद की किरण दिखाएं.
भारतीय जनता पार्टी के माहिष्मती किले में सेंध लग गई है. पहले बांकीपुर हाथ से निकल गया और अब पटना शिक्षक निर्वाचन सीट पर राष्ट्रीय जनता दल का कब्जा हो गया. बांकीपुर में भी भारतीय जनता पार्टी पिछले करीब 3 दशक से काबिज थी और पटना शिक्षक निर्वाचन सीट भी इतने ही समय से भारतीय जनता पार्टी के कब्जे में था. 2026 में एक के बाद एक दोनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी की करारी हार हो गई है. खास बात यह है कि जिस भाजपा को कभी शहरी पार्टी कहा जाता था, वह पटना के ही इन दोनों सीटों से आउट हो चुकी है. दशकों से शहरी वोटर भाजपा के आधार रहे हैं, लेकिन इन दो सीटों पर आए परिणाम से यह जाहिर होता है कि भाजपा से उनका मोहभंग हो रहा है.
पटना शिक्षक निर्वाचन सीट से भाजपा के नवल किशोर यादव को राष्ट्रीय जनता दल के डॉ. संजीव कुमार सिंह ने 1057 वोटों से हरा दिया है. इस तरह इस सीट पर भाजपा का दशकों से चला आ रहा दबदबा खत्म हो गया है. डॉ. संजीव खगड़िया से आते हैं और भूमिहार समाज से ताल्लुक रखते हैं. बांकीपुर की तरह पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी भूमिहार वोटरों की चुनाव में अहम भूमिका रही है. अगर इन दोनों सीटों को उदाहरण मान लें तो भूमिहारों का भाजपा से मोहभंग होता दिख रहा है. अब सवाल उठता है कि क्या भारतीय जनता पार्टी का किला रहा पटना का इलाका अब उसके हाथ से फिसल रहा है?
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नवल किशोर यादव का हारना भाजपा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. 1996 में पहली बार इस सीट से नवल किशोर यादव एमएलसी चुने गए थे और उसके बाद से लगातार जीत हासिल करते आ रहे थे. इसी तरह बांकीपुर सीट पर भाजपा जनता पार्टी पिछले 30 सालों से लगातार जीत हासिल करती आ रही थी. पहले बांकीपुर सीट को पटना पश्चिम कहा जाता था, लेकिन 2008 के परिसीमन के बाद इसे बांकीपुर कहा जाने लगा. 1995 से बांकीपुर सीट भाजपा का अभेद्य किला रहा था, लेकिन इसी साल इस सीट पर हुए उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा के इस गुरूर को तोड़ दिया था. अब वहीं काम डॉ. संजीव ने पटना शिक्षक सीट पर की है.
शहरी और सवर्ण वोटरों के चलते पटना का पूरा इलाका भारतीय जनता पार्टी का बड़ा गढ़ माना जाता था, लेकिन इन दो सीटों पर लगातार मिली करारी हार से लगता है कि अब उसकी पकड़ कमजोर हो चली है. जानकारों का कहना है कि बीजेपी ने इन दोनों सीटों को अति सुरक्षित मान लिया था, लेकिन अब ये दोनों सीटें गंवानी पड़ गई हैं. जन सुराज पार्टी के मैदान में आने से बीजेपी के वोट बैंक में टूट हुई है और इसका सीधा फायदा राजद को मिला है. बांकीपुर में तो बीजेपी का वोटर ही जन सुराज पार्टी के पक्ष में चला गया था.
पटना शिक्षक सीट पर भाजपा को मिली हार का मतलब यह है कि वेतन आयोग को लागू करने में हीलाहवाली पार्टी को भारी पड़ी है. शिक्षा क्षेत्र में बीजेपी की सम्राट सरकार जो बिल लाने वाली थी, जिसमें स्नातक शिक्षा को अलग करने का प्रावधान होने की बात कही जा रही थी, वो शिक्षकों को रास नहीं आई है. कुल मिलाकर बुद्धिजीवियों में सरकार के खिलाफ जबर्दस्त असंतोष था और राष्ट्रीय जनता दल के प्रत्याशी डॉ. संजीव ने उसे भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. बांकीपुर और पटना शिक्षक सीट पर मिली हार मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए भी एक बड़ा सबक है. अगर शहरी वोटर भाजपा के हाथ से निकल गया तो उसके लिए गंभीर संकट पैदा हो सकता है.