भागलपुर: राघोपुर में गंगा का रौद्र रूप अब तबाही की ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है, जिसे देखकर लोग सदमे में हैं. छोटी अलालपुर में आधा दर्जन से अधिक पक्के मकान समेत दो दर्जन से ज्यादा घर गंगा में समा चुके हैं. करोड़ों रुपये खर्च कर कराए गए कटावरोधी कार्य भी गंगा की धारा के सामने टिक नहीं सके. हालात ऐसे हैं कि जो लोग कभी अपने पक्के मकानों में सुकून की जिंदगी जीते थे, आज वे बेघर होकर सड़क पर आ गए हैं. लोगों की पूरी गृहस्थी गंगा में समा गई है. महिलाओं की आंखों में आंसू हैं, सामने उजड़ा आशियाना है और मन में एक ही सवाल है कि अब कहां जाएंगे, कहां रहेंगे? पीड़ितों का आरोप है कि उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस इलाके में बिहार सरकार के पथ निर्माण मंत्री इंजीनियर शैलेंद्र विधायक हैं और ऊर्जा मंत्री बुलो मंडल का भी आवास है, वहां लोगों के घर और तटबंध आखिर क्यों नहीं बचाए जा सके? जब जनप्रतिनिधियों के अपने क्षेत्र में कटाव से ऐसी तबाही मच रही है, तो बाकी इलाकों के लोग सुरक्षा की उम्मीद किससे करें?
यह सवाल इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि राघोपुर में पहले भी कटाव की समस्या आती रही है और पूर्व में तटबंधों को बचाने के प्रयास किए गए थे, लेकिन इस साल जुलाई से शुरू हुआ गंगा का कटाव लगातार विनाशकारी होता गया और अब तक मार्जिनल बांध, करीब 125 साल पुराना रेल लाइन बांध, दर्जनों घर, आधा दर्जन मंदिर और महादेवपुर गंगा घाट तक गंगा में समा चुके हैं.
तबाही का सिलसिला यहीं नहीं थमा है. अब गंगा की तेज धारा का दबाव 14 नंबर सड़क पर बना हुआ है, जिससे लोगों की चिंता और बढ़ गई है. अगर यह सड़क भी कटाव की चपेट में आती है, तो इलाके में आवागमन का संकट और गहरा सकता है. दूसरी ओर, जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता की ओर से दावा किया जा रहा है कि फिलहाल कटाव पर रोक लग गई है, लेकिन जमीन पर तबाही झेल चुके लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह राहत स्थायी है या खतरा अब भी बरकरार है?
विभाग की ओर से यह भी बताया जा रहा है कि गंगा यहां अंडरमाइनिंग कर रही है, यानी सतह के नीचे की मिट्टी कटने से जमीन की पकड़ कमजोर हो रही है. विशेषज्ञों के हवाले से विभाग की ओर से यह वजह भी बताई जा रही है कि भागलपुर क्षेत्र में गंगा में गाद जमा होने के कारण नवगछिया और राघोपुर की तरफ नदी की धारा का रुख बदल गया है, जिससे कटाव की रफ्तार तेज हुई है.
सवाल सिर्फ नदी की धारा बदलने का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के कटावरोधी कार्यों की प्रभावशीलता और उनकी जवाबदेही का भी है. आखिर इतनी बड़ी तबाही के बाद भी लोगों के घर, मंदिर और ऐतिहासिक तटबंध क्यों नहीं बचाए जा सके? जिन परिवारों ने अपनी आंखों के सामने जीवनभर की कमाई गंगा में समाते देखी, उनके पुनर्वास और भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?
राघोपुर में आज गंगा सिर्फ जमीन नहीं काट रही, बल्कि सैकड़ों परिवारों की जिंदगी, उनकी यादें और उनके सुरक्षित भविष्य की उम्मीदें भी बहाकर ले जा रही है. एक पीड़ित महिला का कहना है कि कहां रहेंगे, कहां जाएंगे, कोई ठीक नहीं है. दशहरा पूजा का समय है, लेकिन कोई खुशी नहीं है. देखते ही दिमाग चकरा रहा है. नींद नहीं आ रही है. सरकार हम सब के लिए कुछ सोचे. एक अन्य बाढ़ पीड़ित महिला ने कहा, कुछ नहीं बचा. केवल शरीर पर कपड़े बचे हैं. जो भी संपत्ति बनाए थे, सब गंगा नदी लील गई.
जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता जयप्रकाश पासवान का कहना है कि नदी यहां 90 डिग्री पर मुड़ जाती है. यहां नदी की गहराई 35 से 45 मीटर ही है. उनका कहना है कि लोगों को बचा लिया गया है.
रिपोर्ट: अश्वनी कुमार, भागलपुर