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ECI Conflict Legal Analysis: 14 आपत्तियां और CEC ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयोग में मचे घमासान पर क्या कहता है कानून?

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर एक बार फिर से सियासत गरमा गई है. एक अंग्रेजी अखबार ने दावा किया कि दो चुनाव आयुक्तों ने SIR प्रक्रिया को लेकर करीब 14 आपत्तियां दर्ज कराई थीं. इसको लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया है.

ECI Conflict Legal Analysis: 14 आपत्तियां और CEC ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयोग में मचे घमासान पर क्या कहता है कानून?
Image Credit: चुनाव आयोग में मचे घमासान पर क्या कहता है कानून? (Zee Media)

किसी भी संस्था या परिवार के मुखिया की मुसीबत तब बढ़ जाती है, जब उसके अपने लोग उसके फैसलों के खिलाफ हो जाएं. मौजूदा समय में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ ऐसा ही हो रखा है. दरअसल, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर एक अंग्रेजी अखबार ने दावा किया कि चुनाव आयोग में इस मुद्दे पर बड़ा मतभेद था. दावे के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्त (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी. अखबार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं को जोड़ने वाले फॉर्म नंबर-6 में डिक्लेरेशन फॉर्म जोड़ने वाले कॉलम का सुखबीर संधू ने कड़ा विरोध किया था. इसके बावजूद इसे जोड़ा गया. इस रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. वहीं, आयोग का जवाब संक्षिप्त रहा है. चुनाव आयोग ने खुद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324, कानूनी नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के तहत काम करने वाला एक संवैधानिक निकाय बताया गया है. आयोग ने कहा कि लिखित नोट, सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं.

क्या CEC अकेले कोई फैसला ले सकते हैं?

फिलहाल, इस घटना से जो सवाल उठते हैं वे कानूनी हैं, और उनमें से कुछ के जवाब काफी स्पष्ट हैं. अनुच्छेद 324(1) के तहत चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार चुनाव आयोग के पास होता है, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पास. अनुच्छेद 324(3) के अनुसार, जब अन्य आयुक्तों की नियुक्ति होती है, तो CEC अध्यक्ष के तौर पर काम करते हैं और वह खुद को बॉस नहीं समझ सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने साल 1995 में टीएन शेषन बनाम भारत सरकार केस में इसे स्पष्ट कर दिया था.

Election commission of India

टीएन शेषन बनाम भारत सरकार केस

बता दें कि टीएन शेषन देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त थे. चुनाव सुधार में उनका बड़ा अहम योगदान है. सख्ती के साथ चुनाव कराना उनकी खासियत थी. उस वक्त सिर्फ मुख्य चुनाव आयोग ही सारे फैसले लिया करता था. टीएन शेषन की एकतरफा शक्तियों को लगाम लगाने के लिए अक्टूबर 1993 में तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने चुनाव आयोग को 'बहु-सदस्यीय संस्था' बना दिया था. टीएन शेषन ने इसका कड़ा विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट चले गए. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से शेषन की याचिका को खारिज कर दिया था. कोर्ट ने साफ कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त केवल आयोग के अध्यक्ष हैं. आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद होने पर बहुमत के आधार पर लिया ही फैसला लिया जाएगा.

क्या कहता है कानून?

इसके बाद संसद ने इसे कानूनी जामा पहना दिया. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 में कहा गया है कि आयोग का कामकाज सर्वसम्मति से किया जाएगा और जहां सदस्यों की राय अलग-अलग हो, वहां बहुमत की राय मानी जाएगी. इस कानून के आधार पर अगर दो चुनाव आयुक्तों ने किसी प्रस्ताव पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई हो तो बहुमत प्रस्ताव के खिलाफ है. इसके बावजूद लिया गया निर्णय, संविधान का उल्लंघन होगा. इस मामले में भी आयोग की सार्वजनिक प्रतिक्रिया हैरान करने वाली है. उसने कहा है कि पिछले साल लिए गए सभी निर्णय पूरे आयोग के सर्वसम्मत निर्णय थे. एक अन्य बयान में उसने कहा कि सभी निर्णय बहुमत से लिए गए थे और केवल कुछ नोटों को ही उजागर किया जा रहा था.

SIR

कहां फंस रहा चुनाव आयोग?

ये दो अलग-अलग दावे हैं. अगर कोई वकील एक ही हलफनामे में दोनों बातें कहता है, तो बेंच उससे पूछेगी कि वह वास्तव में किस बात पर कायम है. हो सकता है कि इनका कोई ऐसा स्पष्टीकरण हो जो दोनों में तालमेल बिठा सके. हो सकता है कि फाइल पर आपत्तियां दर्ज की गई हों और बाद में प्रस्तावों में संशोधन करके उन्हें सर्वसम्मति से पारित किया गया हो. अगर ऐसा है तो बैठकों के विवरण में इसका उल्लेख होगा और आयोग को उन्हें सार्वजनिक कर देना चाहिए. हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मई से अगस्त तक यानी लगभग चार महीनों तक आयोग ने एक भी औपचारिक बैठक नहीं की. आयोग की पहली पूर्ण बैठक 9 सितंबर को हुई. फॉर्म-6 से जुड़े नियम जुलाई में लागू किया गया. सितंबर में जाकर आयोग ने इसे आधिकारिक रूप से मंजूर किया. हालांकि, तबतक बहुत देर हो चुकी थी. जिन लोगों का नाम जुलाई में रजिस्टर होने से रह गया था, उन्हें सितंबर के इस अप्रूवल से कोई फायदा नहीं मिला.

फॉर्म 6 में बदलाव का अधिकार किसके पास?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार फॉर्म 6 में बदलाव करने का सबसे गंभीर आरोप लगा है. आरोप के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार ने जुलाई 2025 में फॉर्म 6 में एक नई शर्त जोड़ दी कि आवेदक को यह साबित करना होगा कि उसके या उसके माता-पिता का नाम पुरानी मतदाता सूची में था या नहीं. इसके बिना उसका फॉर्म 6 स्वीकार नहीं किया जा सकता. दावा है कि मई 2025 में ही दोनों चुनाव आयुक्त (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने इस पर अपनी आपत्ति जताई थी. उन्होंने साफ कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा नियमों में औपचारिक संशोधन किए बिना 'फॉर्म 6' का फॉर्मेट नहीं बदला जा सकता, इसके बावजूद ऐसा किया गया. दोनों इसे वापस लेने को भी कहा था.

'फॉर्म 6' को 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' के तहत तय किया गया है. ये नियम केंद्र सरकार द्वारा 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950' की धारा 28 के तहत, कमीशन से सलाह-मशविरा करने के बाद बनाए जाते हैं. कमीशन से सलाह तो ली जाती है, लेकिन नियम वह नहीं बनाती. वह प्रशासनिक निर्देशों के ज़रिए उनमें संशोधन नहीं कर सकती. सुप्रीम कोर्ट ने कई बार ऐसा कहा है. 'मोहिंदर सिंह गिल बनाम चीफ इलेक्शन कमिश्नर (1978) मामले में कोर्ट ने आर्टिकल 324 को शक्तियों का भंडार बताया था.

'ERONet' सॉफ्टवेयर को लेकर विवाद

विवाद का दूसरा पहलू मतदाता सूची डेटाबेस से जुड़े 'ERONet' सॉफ्टवेयर से जुड़ा है. 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950' की धारा 13B के तहत, मतदाता सूची तैयार करने और उसके पुनरीक्षण की जिम्मेदारी 'निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी' (ERO) की है. 'ERONet' सॉफ्टवेयर से हुई गड़बड़ियों के कारण ना सिर्फ ERO के अधिकारों का हनन हुआ, बल्कि कई वैध मतदाताओं के नाम कट गए, जिससे वो 'अपना वोट डालने' के अधिकार से वंचित रह गए. गोवा में ERO ने जांच के बाद 97 लोगों को वैध मतदात पाया, लेकिन आयोग के सॉफ्टवेयर (ERONet) में नामों को वापस जोड़ने का विकल्प ही नहीं था. अधिकारियों द्वारा 8 बार चिट्ठी लिखने के बावजूद सॉफ्टवेयर ठीक नहीं हुआ और मतदाता सूची में 97 लोगों के नाम नहीं दर्ज हो सके. यह मामला सामने आने पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल पर नाराजगी जताई.

SIR

कैबिनेट सचिव को क्यों लिखा गया पत्र?

SIR प्रक्रिया में गड़बड़ी को लेकर दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को चिट्ठी लिखी थी, इसे लेकर भी काफी चर्चा हो रही है. कुछ लोगों ने सवाल उठाया है कि उन्होंने किस हैसियत से ऐसा किया? यह सवाल जायज है और इसका उत्तर किसी के लिए भी सहज नहीं हैं. साल 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि चुनाव आयोग राष्ट्रपति के अधीन है, ना कि सरकार के. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कोर्ट ने साफ कहा था कि चुनाव आयोग को सरकारी प्रभाव से मुक्त रखना लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है. ऐसे में अपने आंतरिक विवाद को कैबनेट सचिव के पास ले जाना, इस सिद्धांत के अनुकूल नहीं बैठता.

राष्ट्रपति के पास क्यों नहीं गए?

हालाँकि, इसका एक दूसरा पहलू भी है. चुनाव आयोग को कर्मचारी और नियम बदलने की मंजूरी सरकार से ही मिलती है, इसलिए सरकार को यह बताना जरूरी था कि उसके बनाए नियमों को दरकिनार किया जा रहा है. अनुच्छेद 324(6) में इसका जिक्र है. दूसरा सवाल यह भी है कि दोनों आयुक्तों ने राष्ट्रपति से संपर्क क्यों नहीं किया, जबकि आयोग सैद्धांतिक रूप से उनके प्रति जवाबदेह माना जाता है. यह सच है कि राष्ट्रपति ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं, लेकिन वे आयोग के कामकाज का पर्यवेक्षण नहीं करते. सांसदों की अयोग्यता के मुद्दे पर तो अनुच्छेद 103(2) के तहत राष्ट्रपति आयोग की सलाह मानने के लिए बाध्य होते हैं. इसके अलावा राष्ट्रपति को पत्र भेजने पर भी बात घूम-फिरकर उसी सरकार के पास ही पहुंचती.

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

इस मामले के निपटारे के लिए सही मंच एक संवैधानिक अदालत (हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट) ही है. कोई भी प्रभावित मतदाता अदालत का रुख करके यह पूछ सकता है कि क्या फॉर्म 6 की शर्त 1960 के नियमों के खिलाफ है? क्या विवादित फैसले धारा 18 के तहत वैध रूप से लिए गए थे? और क्या ERONet का ढांचा EROs के वैधानिक कार्यों में बाधा डालता है? अदालत संबंधित फाइलें, असहमति पत्र और बैठकों के विवरण मंगा सकती है. इससे उन सभी अटकलों पर पूर्णविराम लग जाएगा, जिन्हें प्रेस बयान शांत नहीं कर पाए हैं.

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About the Author

Rajnish Kumar

Rajnish Kumar

रजनीश कुमार सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं. वे दिल्ली और पटना की अदालतों में एक अनुभवी और भरोसेमंद वकील के रूप में जाने जाते हैं. जटिल कानूनी मसलों को सरल तरीके से सुलझाने में माहिर रजनीश कुमार का मानना है कि कानून के बारे साफ-सुथरी जानकारी सभी को मिलनी चाहिए. ये बड़े मुद्दों पर कानूनी पक्ष मीडिया में रखते रहे हैं.
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