DUSU Election 2026: क्या केवल वोटबैंक बनकर रह गए हैं बिहार-झारखंड के 20 हजार से अधिक छात्र? किसी भी पैनल में जगह नहीं
छात्रों की एक बड़ी संख्या को प्रतिनिधित्व न देकर एक तरह से उनकी उपेक्षा तो की ही जा रही है, स्थानीय प्रभुत्व को बढ़ावा भी दिया जा रहा है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में 20 हजार से अधिक बिहार और झारखंड के छात्र पढ़ रहे हैं तो प्रतिनिधित्व के स्तर पर उन्हें नकारा नहीं जा सकता.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव देश के प्रतिष्ठित छात्रसंघ चुनावों में से एक है. कैंपस में आज 18 सितंबर को मतदान हो रहा है. इस बार दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में बिहार और झारखंड के लिए कुछ भी रोमांचक नहीं है. ऐसा इसलिए, क्योंकि इस बार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ़ इंडिया (NSUI) में से किसी ने भी अपने पैनल में बिहार और झारखंड के छात्रों को जगह नहीं दी है, जबकि इन दोनों राज्यों के विद्यार्थियों की संख्या कैंपस में बहुत ज्यादा है. सवाल यह है कि क्या बिहार और झारखंड के विद्यार्थी दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस में केवल वोटबैंक बनकर रह गए हैं?
ABVP और NSUI, किसी भी पैनल में जगह नहीं
ABVP हो या NSUI ने अपने पैनल में 4-4 उम्मीदवारों को उतारा है. दोनों ही संगठनों के पैनल में दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के समीकरणों को तरजीह दी गई है.
ABVP ने अपने पैनल में अध्यक्ष पद के लिए यश डबास को उतारा है, जो दिल्ली से आते हैं. उपाध्यक्ष पद के लिए इशू मौर्य को मौका दिया गया है. इशू मौर्य वाराणसी, यूपी से आते हैं. सचिव पद के लिए रिया छावड़ी को उतारा गया है, जो दिल्ली की रहने वाली हैं. संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्यराज सिंह को मौका दिया गया है. लक्ष्यराज सिंह राजस्थान से ताल्लुकात रखते हैं.
NSUI की बात करें तो अध्यक्ष पद के लिए राजस्थान से आने वाले विजय शंकर मीणा, उपाध्यक्ष पद पर वीर चतरथ को मौका दिया है. चतरथ दिल्ली से आते हैं. सचिव पद के लिए दिल्ली की नम्रता चौधरी और संयुक्त सचिव पद के लिए राजस्थान से आने वाले गोपाल चौधरी को मौका दिया गया है.
संख्या में किसी से कम नहीं बिहार और झारखंड
मतलब साफ है कि बिहार और झारखंड के छात्र कैंपस में केवल वोटर बनकर रह गए हैं. कैंपस में बिहार और झारखंड के छात्रों की संख्या की बात करें तो संख्या 20 हजार से ज्यादा हो सकती है. दरअसल, दिल्ली यूनिवर्सिटी के नियमित कॉलेजों और पीजी विभागों में डेढ़ लाख छात्र स्टडी करते हैं. इनमें से करीब 1.4 लाख छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में वोटर हैं. माना जाता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुल छात्रों में से 12 से 15 प्रतिशत बिहार से और 3 से 5 प्रतिशत छात्र झारखंड से आते हैं.
कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट लागू होने से बिहार और झारखंड के मेधावी छात्रों की संख्या दिल्ली यूनिवर्सिटी में बढ़ी है. बिहार और झारखंड के छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू, हंसराज, किरोड़ीमल, रामजस और वेंकटेश्वर जैसे शीर्ष कॉलेजों में ज्यादा हैं.
बड़ा वोटबैंक होने के बाद भी पैनल में क्यों जगह नहीं?
दरअसल, दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में बड़े पैमाने पर संसाधनों जेसे गाड़ियों और बजट की जरूरत होती है. चुनाव में लामबंदी का भी बड़ा रोल होता है. दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान नजदीक के होने के कारण आसानी से संसाधन जुटा लेते हैं, लेकिन बिहार और झारखंड से आए छात्रों के लिए ये सब जुटाना इतना आसान नहीं होता.
वे अपनी पढ़ाई और जरूरत की प्राथमिकताओं पर ज्यादा फोकस करते हैं. विश्वविद्यालय के आउटर कैंपसों और डे कॉलेजों में स्थानीय लोगों का प्रभाव होता है और ऐसे छात्रों का नेटवर्क भी मजबूत होता है.
दूसरी ओर, बिहार और झारखंड के छात्रों को आंतरिक कमेटियों, कॉलेज काउंसलर पदों या प्रचार टोलियों तक सीमित रखकर उनका वोट हासिल करने की कोशिश की जाती है.