UN चार्टर में क्या है ‘दुश्मन देश’ क्लॉज, जिसे हटवाने के लिए अड़ा जापान? UNGA में उठाई मांग
द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हुए करीब 80 साल बीत चुके हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र (UN) के नियमों की किताब में आज भी जापान को ‘दुश्मन देश’ के तौर पर देखा जाता है. अब इसी पुराने नियम को हमेशा के लिए खत्म करवाने के लिए जापान ने संयुक्त राष्ट्र में पूरी ताकत झोंक दी है. आइए जानते हैं पूरा मामला क्या है...
इस वक्त न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का 81वां सेशन चल रहा है, जहां 193 सदस्य देश अपनी बात रख रहे हैं. इसी मंच से अपने पहले ही संबोधन में जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने एक ऐसा मुद्दा छेड़ दिया, जो दशकों पुराना है. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर से ‘दुश्मन देश’ (Enemy States) शब्द और उससे जुड़े नियमों को हमेशा के लिए हटाने की जोरदार वकालत की है.
जापानी प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि 1945 के पुराने चश्मे से आज की दुनिया को नहीं देखा जा सकता. उन्होंने यह मांग ऐसे वक्त उठाई है जब जापान अपनी सुरक्षा और रक्षा बजट बढ़ाने की तैयारी में है, लेकिन चीन और रूस इसी पुराने नियम की आड़ लेकर टोक्यो पर लगातार दबाव बना रहे हैं.
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर UN चार्टर में ‘दुश्मन देश’ का क्या मतलब है, इसे क्यों जोड़ा गया था और जापान इसे हटवाने के लिए इतना जोर क्यों दे रहा है?
UN की डायरी में कैसे लिखा गया ‘दुश्मन’ का नाम?
ये बात करीब 80 साल पुरानी है, जब 1939 से 1945 के बीच दूसरा विश्व युद्ध लड़ा गया था. उस वक्त जंग मुख्य रूप से दो बड़े गुटों के बीच थी. एक तरफ अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन (मित्र राष्ट्र) थे, तो दूसरी तरफ जर्मनी, इटली और जापान. सितंबर 1945 में जब जापान ने आखिरकार घुटने टेके, तब जाकर यह महाविनाशकारी युद्ध खत्म हुआ और जीत मित्र राष्ट्रों की हुई.
दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद जब 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र (UN) की नींव रखी गई और उसके नियम-कायदे तय हुए, तो जीतने वाले देशों ने उसमें 'दुश्मन देश' से जुड़े कड़े नियम डाल दिए. ये वही देश थे, जो आगे चलकर सुरक्षा परिषद (UNSC) के स्थायी सदस्य यानी वीटो पावर वाले देश बने.
जीतने वाले देशों ने यह नियम इसलिए बनाया था ताकि हार चुके जापान, जर्मनी या इटली जैसे देश दोबारा सिर न उठा सकें और फिर से जंग का माहौल न बनाएं. इसके लिए सीधा सा फंडा यह तय किया गया कि अगर इनमें से किसी देश ने फिर से कोई गड़बड़ की तो बिना किसी लंबी कागजी कार्रवाई या सुरक्षा परिषद की मीटिंग का इंतजार किए, सीधे उन पर मिलिट्री एक्शन लिया जा सके.
आर्टिकल 53, 77 और 107 में है जिक्र
आर्टिकल 53: यह आर्टिकल कहता है कि कोई भी क्षेत्रीय संगठन सुरक्षा परिषद (UNSC) की परमिशन के बिना किसी पर हमला नहीं कर सकता, लेकिन इसमें एक बड़ी छूट दी गई है, वो ये कि अगर कार्रवाई दूसरे विश्व युद्ध के किसी 'दुश्मन देश' के खिलाफ हो रही हो, तो किसी से पूछने की जरूरत नहीं है.
आर्टिकल 107: यह रूल जंग जीतने वाले बड़े देशों को खुली छूट देता है कि वे पुराने दुश्मन देशों के खिलाफ बिना UN की मंजूरी के भी सीधा फौजी एक्शन ले सकते हैं. दुनिया भर में बिना UN की इजाजत सेना का इस्तेमाल मना है, लेकिन यह नियम उस पाबंदी को पूरी तरह दरकिनार कर देता है.
आर्टिकल 77: यह उन इलाकों के कामकाज और देखरेख से जुड़ा है, जिन्हें जंग खत्म होने के बाद इन दुश्मन देशों से छीनकर अलग कर दिया गया था.
आखिर जापान इसे क्यों हटवाना चाहता है?
जापान के इस नियम के पीछे पड़ने की सबसे बड़ी वजह उसकी अपनी सुरक्षा है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने शांतिवादी संविधान अपनाया था, जिसके तहत वह आक्रामक सेना नहीं रख सकता था, लेकिन आज के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. जापान अब अपनी आत्मरक्षा के लिए सेना को आधुनिक बना रहा है और डिफेंस बजट में भारी इजाफा कर रहा है. मसला यहां फस रहा है कि जब भी जापान अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए कोई कदम उठाता है, चीन और रूस तुरंत UN चार्टर के इसी ‘दुश्मन देश’ वाले नियम के विरुद्ध बताकर टोक्यो पर कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाते हैं. जापान का साफ मानना है कि 80 साल पहले खत्म हो चुकी जंग की आड़ लेकर आज उसके हाथ नहीं बांधे जा सकते.
जापान की मांग के बावजूद कहां फंसा है पेंच?
जापान इसे हटाने की कोशिश लंबे समय से कर रहा है. खुद संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने भी 1995 में ही मान लिया था कि अब इन पुराने नियमों का कोई मतलब नहीं रह गया है. इसके बाद 2005 में महासभा ने चार्टर से ‘दुश्मन देश’ शब्द को हटाने का बाकायदा प्रस्ताव भी पास कर दिया था. इसके बावजूद यह ठप्पा आज तक नहीं हट पाया, क्योंकि सुरक्षा परिषद के पांच बड़े दादा अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन (P5) ने इस पर मिलकर हरी झंडी नहीं दिखाई. असल पेंच यह है कि UN के नियमों में जरा सा भी बदलाव तभी हो सकता है, जब ये पांचों देश एक सुर में राजी हों और कोई भी अपनी वीटो पावर न चलाए.
जानकार क्या कहते हैं?
संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व राजदूत मंजीव सिंह पुरी बताते हैं कि खेल सिर्फ UN में वोट डालने तक सीमित नहीं है, चार्टर में बदलाव तभी संभव है जब ये पांचों वीटो वाले देश न सिर्फ महासभा में इसके पक्ष में खड़े हों, बल्कि इसे अपने-अपने देश की संसद से भी कानून बनाकर पास करवाएं और यहीं पर आकर पूरी गाड़ी अटक जाती है.
मंजीव सिंह पुरी ने आगे बताया कि कहने को तो 1995 से ये नियम बस कागजों पर सिमट कर रह गए हैं, लेकिन कूटनीति के खेल में इनका इस्तेमाल आज भी जमकर होता है. इसके न हटने के पीछे का एक बड़ा पेंच यह भी है कि जापान में आज भी अमेरिकी सेना का बेस है, जो चीन और रूस की आंखों में हमेशा खटकता रहता है.
जानकारों की मानें तो इन पांचों बड़े देशों (P5) के मन में एक डर यह भी है कि अगर आज चार्टर की भाषा बदलने के लिए हाथ लगाया गया, तो कल को सुरक्षा परिषद के विस्तार और बाकी बड़े सुधारों की मांग और तेज हो जाएगी. ऐसे में दुनिया की इस सबसे ताकतवर टेबल पर उनका एकछत्र राज और दबदबा खतरे में पड़ सकता है.
UN और सुरक्षा परिषद में बड़े सुधारों की मांग
न्यूयॉर्क के मंच से प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने सिर्फ 'दुश्मन देश' वाले नियम को हटाने तक अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि इसे सुरक्षा परिषद के पूरे ढांचे में बड़े बदलाव से जोड़ दिया. उन्होंने साफ कहा कि आज के दौर में सुरक्षा परिषद का बदलना बहुत जरूरी हो चुका है.
ताकाइची ने अपने बयान में कहा, 'पूरी दुनिया में अमन-चैन बनाए रखने की जिम्मेदारी संभालने वाली सुरक्षा परिषद का मौजूदा ढांचा असल में 1945 के हालात को दिखाता है. अब बिना वक्त गंवाए इसे ऐसा रूप देना होगा, जो आज की दुनिया की जमीनी हकीकत को सही मायने में दिखा सके. इसके लिए जरूरी है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी और गैर-स्थायी दोनों तरह के सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए, ताकि यह ज्यादा निष्पक्ष और असरदार बन सके.' उन्होंने यह भी याद दिलाया कि दुनिया के ज्यादातर देश सुरक्षा परिषद में इस तरह के विस्तार के पक्ष में हैं.
चीन और रूस के साथ बढ़ता तनाव
जापान की यह मांग मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों को देखते हुए और भी ज्यादा नाजुक हो जाती है. पिछले कुछ समय से चीन और रूस दोनों ही जापान पर राजनीतिक, आर्थिक और फौजी दबाव लगातार बढ़ा रहे हैं. चीन ने जापानी कंपनियों के लिए बेहद जरूरी 'रेयर अर्थ मैग्नेट्स' की सप्लाई रोक दी है. वहीं दूसरी तरफ, उसके लड़ाकू विमान और जंगी जहाज जापान के समुद्री तटों के बिल्कुल पास लगातार युद्धाभ्यास कर रहे हैं. जब पिछले साल नवंबर में ताकाइची ने साफ इशारा दिया था कि अगर चीन ने ताइवान पर हमला करने की हिमाकत की, तो जापान भी अपनी सेना के साथ मैदान में उतर सकता है, इसके बाद से दोनों देशों के बीच तनातनी और बढ़ गई.
वहीं दूसरी तरफ, रूस ने भी जापान के पास अपनी फौजी ड्रिल बढ़ा दी है और जापान के रक्षा बजट बढ़ाने के फैसले का जमकर विरोध कर रहा है. चीन और रूस दोनों ही जापान की घेराबंदी करने के लिए बार-बार UN चार्टर के इसी ‘दुश्मन देश’ वाले नियम का सहारा लेते हैं.
चीन का दावा है कि यह नियम दूसरे विश्व युद्ध के बाद तय हुई दुनिया की व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है, जबकि रूस दक्षिणी कुरील द्वीप समूह को लेकर चल रहे जमीनी विवाद में इस नियम की आड़ लेकर जापान के दावों को खारिज कर देता है. अगस्त में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विवादित इलाके के दौरे पर ताकाइची ने सख्त नाराजगी जताते हुए दो टूक कहा था कि इससे 'जापान के लोगों की भावनाओं को गहरी चोट पहुंची है और यह किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.'