इराक से अमेरिकी सेना की करीब 2 दशक बाद विदाई हो गई. 30 सितंबर 2026 को अमेरिकी सेना इराक से अपने बचे हुए ठिकानों से भी निकल गई. अमेरिकी सैनिकों के इराक छोड़ने के फैसले को ईरान और उसके सहयोगी गुट अपनी जीत के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि, अमेरिकी सेना ने एक समझौते के तहत इराक छोड़ने का फैसला किया.
दरअसल, अमेरिका में जो बाइडन के कार्यकाल के दौरान साल 2024 में अमेरिकी सेना की वापसी का समझौता हुआ था. इस दौरान चरणबद्ध तरीके से अमेरिकी सैनिकों के इराक छोड़ने की योजना बनी थी. बाद में डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को लागू किया. अब 30 सितंबर को इस समझौते का आखिरी चरण पूरा हो रहा है. अमेरिकी सेना की इराक में मौजूदगी समाप्त होने के बाद यहां पर ईरान के प्रभाव और फिर से ISIS के विस्तार को लेकर चिंता बढ़ने लगी है.
बता दें कि साल 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला किया था. इस एक्शन के दौरान सद्दाम हुसैन की सरकार को हटाया गया था. इसके बाद कई वर्षों तक अमेरिकी सेना इराक में रही. हालांकि, 2011 के अंत में अमेरिकी सैनिकों ने इराक से वापसी की. बाद में साल 2014 में इस्लामिक स्टेट के तेजी से बढ़ने के बाद अमेरिकी सेना फिर से इराक लौटी.
अमेरिका ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ISIS के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया. साल 2017 तक ISIS के कब्जे वाले इलाकों को वापस भी ले लिया गया. इसके बाद अमेरिकी सैन्य मिशन को खत्म करने की योजना बनाई गई. सितंबर 2024 में दोनों देशों ने मिशन को चरणबद्ध तरीके से लागू करने पर सहमति जताई थी. इस सहमति के तहत आखिरी चरण लागू हुआ है.
अमेरिकी सेना के इराक से हटने के कारण ईरान के प्रभावों को लेकर चिंता सताने लगी है. ईरान के साथ जुड़े कई शिया हथियारबंद गुट इराक की राजनीति और वहां की सुरक्षा व्यवस्था में पहले से ही प्रभाव रखते हैं. इसी बीच समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक सुरक्षा एक्सपर्ट के हवाले से बताया कि अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के समाप्त होने के बाद इन गुटों को अपना प्रभाव बढ़ाने का अधिक मौका मिल सकता है. वहीं, सुरक्षा मामलों के जानकार जासिम अल-बहदली का कहना है कि ईरान समर्थक मिलिशिया इस वापसी को अपनी जीत करार दे रहे हैं. अब इसका इस्तेमाल वे अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कर सकते हैं.
इन सबके बीच अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद इस बात की चिंता भी बढ़ी है कि फिर से इस्लामिक स्टेट का विस्तार हो सकता है. संगठन के पास अब भी स्लीपर सेल नेटवर्क मौजूद है. इराकी और कुर्द अधिकारियों को चिंता सता रही है कि अमेरिकी खुफिया जानकारी और निगरानी की मदद के बिना ISIS को फिर से संगठित होने का मौका मिल सकता है.