पाकिस्तान का पक्का यार, अब भारत से बढ़ा रहा प्यार! अजरबैजान के यू-टर्न से इस्लामाबाद में हाहाकार
Azerbaijan-India Relation Improving: भारत का कट्टर विरोध करने वाले अजरबैजान के स्वभाव में बड़ा यू टर्न देखने को मिला है. खुलेआम पाकिस्तान को समर्थन देने और दिल्ली की कड़ी निंदा करने वाले इस देश ने अब धीरे-धीरे भारत के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की है. इसका नमूना हाल ही में देखने को मिला है.
Azerbaijan-India Relation: किर्गिस्तान के बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO Summit) में पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अर्मेनियाई प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान समेत कई देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं. भारतीय मीडिया में भी ये बैठकें छाईं रहीं, लेकिन किसी का भी ध्यान एक खास बैठक पर नहीं गया. ये बैठक पीएम मोदी और अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव के बीच हुई थी.
लगभग एक साल पहले ही चीन के तियानजिन में इसी तरह के SCO शिखर सम्मेलन में बाकू ने आरोप लगाया था कि भारत ने कुछ अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर संगठन में उसके प्रवेश के प्रयास को रोक दिया था और ठीक एक साल बाद मोदी और अलीयेव एक ऐसे इवेंट में द्विपक्षीय बैठक कर रहे थे, जिसमें पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ और तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन भी मौजूद थे.
अचानक कैसे बदला बाकू?
अजरबैजान के लिए यह बैठक निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण क्षण था. वहां पूरे देश के मीडिया में इसकी खबर छाई रही. सोचने वाली बात ये है कि जो बाकू कुछ समय पहले तक भारत के लिए खुलकर शत्रुतापूर्ण रवैया अपना रहा था, जिसके साथ द्विपक्षीय संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे हैं, जिसने ऑपरेशन सिंदूर के बाद खुलकर इस्लामाबाद का समर्थन किया और भारत की कड़ी निंदा की अचानक उसके बर्ताव में यह बदलाव कहां से आ गया?
भारत-अजरबैजान के संभलते रिश्ते
दोनों देशों के संबंध में इस साल की शुरुआत में एक महत्वपूर्ण सफलता देखने को मिली, जब भारत और अजरबैजान ने बाकू में फॉरेन ऑफिस कंसल्टेशन के छठे राउंड का आयोजन किया. यह साल 2022 के बाद पहली बार औपचारिक रूप से दोनों देशों के बीच शुरू हुई पहली वार्ता थी. इसके अलावा शुक्रवार ( 11 सितंबर 2026) को भारत के विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज और अजरबैजान के उप विदेश मंत्री एल नूर मम्मादोव के बीच व्यापार, टेक्नोलॉजी, पर्यटन, फार्मास्यूटिकल्स, सीमा पार आतंकवाद, एनर्जी और कल्चर जैसे कई बड़े मुद्दों पर चर्चा हुई.
सीबी जॉर्ज ने अजरबैजान के राष्ट्रपति के विदेश नीति सलाहकार हिकमत हाजीयेव से भी मुलाकात की. इस बातचीत में सीमा पार आतंकवाद शब्द का खास महत्व है क्योंकि बाकू के लिए इसका तात्पर्य आर्मेनिया या ईरान, तो भारत के लिए सीधा तौर पर इसका अर्थ पाकिस्तान से जुड़ा है. पिछले साल, जब भारत ने सीमा पार आतंकवाद के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था, तब बाकू ने पाकिस्तान का पुरजोर समर्थन किया था.
कहां खराब हुई बात?
अजरबैजान ने पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा होने के नाते भारत के साथ फ्रेंडली रिलेशन रखता था. वहीं, USSR के पतन के बाद बाकू के एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरने पर भारत ने साल 1992 में इसे संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता दी थी. हालांकि, भारत के अन्य पूर्व सोवियत राज्यों के साथ संबंध अच्छे से आगे बढ़े, लेकिन अजरबैजान के साथ संबंध न तो गहरे हुए और न साधारण तौर पर आगे बढ़े. बाकू में भारतीय राजनयिक मिशन मार्च 1999 में ही खोला गया, जबकि अजरबैजान ने साल 2004 में दिल्ली में अपना राजनयिक मिशन खोला. यहां एंबेसडर की नियुक्ति में तो और भी ज्यादा समय लगा. 20 साल बाद भी दोनों पक्षों के बीच राष्ट्राध्यक्षों या सरकार प्रमुखों के स्तर पर कोई बड़ी हाई लेवल की द्विपक्षीय यात्रा नहीं हुई है.
द्विपक्षीय व्यापार में हुई बढ़ोत्तरी
पिछले कुछ सालों में भारत-अजरबैजान के बीच द्विपक्षीय व्यापार काफी बढ़ गया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2005 में द्विपक्षीय व्यापार 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2023 में 1.435 बिलियन पहुंचा है. इससे भारत अजरबैजान का सातवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया, लेकिन व्यापार अभी भी अजरबैजान के पक्ष में झुका हुआ है, खासतौर से भारत के ऑयल इंपोर्ट के चलते. अजरबैजान से भारत का इंपोर्ट 1.23 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, वहीं एक्सपोर्ट केवल लगभग 201 मिलियन अमेरिकी डॉलर था. उसी साल वहां भारत से आने वाले पर्यटकों की संख्या भी लगभग 1.17 लाख थी.
अजरबैजान ने दिया धोखा
अजरबैजान ने फिर भी पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को मजबूत करते हुए आर्मेनिया को भारत की ओर से किए गए डिफेंस एक्सपोर्ट पर आपत्ति जताई. हालांकि, अभी तक इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि आर्मेनिया ने अजरबैजान के साथ युद्ध के दौरान भारतीय हथियारों का इस्तेमाल किया था. इतना ही नहीं, जहां भारत ने आर्मेनिया-अजरबैजान के बीच विवादित क्षेत्र नागोर्नो-काराबाख पर न्यूट्रल रुख अपनाया, जिसे अजरबैजान ने सैन्य रूप से आर्मेनिया से छीन लिया था, तो वहीं अजरबैजान ने भी जम्मू-कश्मीर विवाद पर पाकिस्तान का समर्थन किया था. उसने अपने क्षेत्र में पाकिस्तानी दूतावास की ओर से कश्मीर दिवस के कार्यक्रमों की अनुमति दी, भारत की ओर से जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन की निंदा की और इस साल की शुरुआत में खालिस्तानी समर्थकों की ओर से आयोजित एक सम्मेलन की भी अनुमति दी.
भारत के साथ दोस्ती में ही भलाई
अजरबैजान को अब शायद यह एहसास हो गया है कि उसके लिए भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना ज्यादा फायदेमंद होगा. ऑपरेशन सिंदूर के बाद बाकू में भारतीय पर्यटकों की संख्या में तकरीबन 30 प्रतिशत की गिरावट आई. यह देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य सोर्स है. ऐसे में उसके लिए यह गिरावट बेहद नुकसानदायक थी. मिडिल ईस्ट से एनर्जी इंपोर्ट में बाधा के चलते बाकू के लिए भारतीय ऊर्जा बाजार का महत्व और भी बढ़ जाएगा. इसके अलावा 'ONGC विदेश लिमिटेड' की अजरबैजान की तेल और पाइपलाइन संपत्तियों में सक्रिय हिस्सेदारी है, जिसमें अजेरी-चिराग-गुनाश्ली तेल क्षेत्र और बाकू-त्बिलिसी-सेहान पाइपलाइन शामिल हैं.
भारत से दोस्ती क्यों जरूरी?
अजरैबजान भारत की ओर से आर्मेनिया के साथ पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और आकाश एयर डिफेंस सिस्टम जैसे डिफेंस डील को लेकर चिंतित है. इसको लेकर उसने भारत की निंदा भी की है और धमकी भी दी है. ऐसे में भारत के साथ संबंधों को नए सिरे से स्थापित करने से वह किसी भी तरह के सैन्य खतरे को टाल सकता है. वहीं, अजरबैजान के इस समय तुर्किये से भी संबंध कुछ खास ठीक नहीं चल रहे हैं. एक समय तक खुद को एक राष्ट्र, दो राज्य कहने वाले ये देश अब तनावपूर्ण रिश्ते से गुजर रहे हैं. इसकी मुख्य वजह तुर्किये का मक्का पैक्ट में शामिल होना और अजरबैजान के सबसे करीबी ऊर्जा और रक्षा साझेदारों में से एक इजरायल के साथ उसका बढ़ता तनाव हो सकता है.
इजरायल-तुर्किये के बीच बढ़ते तनाव ने तुर्किये-अजरबैजान के संबंधों पर बाधा डाल दी है. इसका मुख्य उदाहरण ये है कि पिछले साल मई 2026 में 'द टाइम्स ऑफ इजरायल' ने रिपोर्ट किया था कि पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने अपनी बाकू की यात्रा रद्द कर दी थी क्योंकि तुर्किये ने उनके विमान को अपने एयर स्पेस से गुजरने की अनुमति देने से मना कर दिया था.
भारत के लिए बड़ा अवसर
भारत अजरबैजान के अपने मित्र देशों के साथ बिगड़ते संबंध का पूरी तरह लाभ उठाने की कोशिश करेगा और संभावित रूप से वह उसे तुर्किये के प्रभाव से भी दूर करने का प्रयास करेगा, क्योंकि भारत के लिए तुर्किये महत्वपूर्ण रणनीतिक खतरा बनता जा रहा है. इसके अलावा बाकू भारत को अपने एक्सपोर्ट के लिए अच्छा मार्केट भी प्रदान करता है, जो इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर ( INSTC) का हिस्सा होने के नाते, यूरेशिया में भारत की कनेक्टिविटी के लिए उपयोगी है. ऐसे में बिश्केक में मोदी-अलयेव की मुलाकात द्विपक्षीय संबंधों में एक नए युग की शुरुआत का संकेत देती है. दोनों देश एक बार फिर अच्छे संबंधों के लिए आपस में विचार कर सकते हैं. हालांकि, अजरबैजान की कुछ हरकतों के चलते दिल्ली को अपनी बातचीत जारी रखते हुए भी सतर्क और सावधान रहना चाहिए.