SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

पाकिस्तान में जब भी हुआ कत्लेआम, अफगानिस्तान को चुकानी पड़ी कीमतः एक बार फिर इतिहास दोहराने का खतरा

पाकिस्तान का राजनीतिक बदलाव अक्सर अफगानिस्तान को प्रभावित करती रही है. जनरल जिया-उल-हक से लेकर इमरान खान तक पाकिस्तान में जब भी सत्ता परिवर्तन हुआ, तो इसका सीधा असर अफगानिस्तान की राजनीति पर देखने को मिला है. खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी का लगाने से क्या अफगानिस्तान में भी कुछ बड़ा सियासी भूचाल आ सकता है?

Written By K. Raj Mishra
Published: Oct 12, 2026, 01:43 PM IST | Updated: Oct 12, 2026, 04:01 PM IST
Image Credit: प्रतीकात्मक AI तस्वीर
Join

पाकिस्तान एक बार फिर से गृह युद्ध और तख्तापलट की दहलीज पर खड़ा है. पड़ोसी मुल्क में हालात काफी तनावपूर्ण हैं और आवाम की आवाज को दबाने के लिए शहबाज शरीफ सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी लगा दी है. राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के आदेश के बाद प्रांतीय सरकार के सारे अधिकार गवर्नर को सौंप दिए गए हैं. पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी लागू होते ही अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार की टेंशन बढ़ गई है. दरअसल, पाक में जब भी तख्तापलट हुआ, अफगानिस्तान की सियासत भी सीधे तौर पर प्रभावित हुई है. खैबर पख्तूनख्वा तो सीधा अफगानिस्तान की सीमा से जुड़ा हुआ है और पाकिस्तान ने भी खैबर पख्तूनख्वा में बिगड़ते हालातों के लिए अफगानिस्तान को ही जिम्मेदार ठहराया है. लिहाजा, काबुल इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है.

पाकिस्तान-अफगानिस्तान के कैसे हैं रिश्ते?

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखेंगे तो पाकिस्तान का राजनीतिक बदलाव अक्सर अफगानिस्तान को प्रभावित करती रही है. जनरल जिया-उल-हक से लेकर इमरान खान तक पाकिस्तान में जब भी सत्ता परिवर्तन हुआ, तो इसका सीधा असर अफगानिस्तान की राजनीति पर देखने को मिला है. अफगानिस्तान में जब 15 अगस्त 2021 को तालिबानियों का पूर्ण कब्जा हुआ तो पाकिस्तान काफी खुश हुआ था. उसे लगा कि अब तालिबानी लड़ाकों के साथ मिलकर भारत को परेशान किया जा सकता है, लेकिन हालात उल्टे पड़ गए. तालिबान ने पाकिस्तान की जगह भारत को अपना दोस्त समझा. इस कारण से पिछले एक-दो वर्षों से दोनों देशों के बीच काफी तनाव और टकराव की स्थिति देखने को मिल रही है. पाकिस्तान का आरोप है कि तालिबानी लड़ाके उसके यहां अशांति फैला रहे हैं. दोनों देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जंग जैसे हालात भी चल रहे हैं. अक्सर पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान पर हवाई हमले की खबरें सामने आती रहती हैं.

अयूब खान के आते ही बिगड़े पाक-अफगान संबंध

वैसे तो पाकिस्तान में कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका. पाकिस्तान में सरकार सिर्फ मुखौटा है, जबकि पर्दे के पीछे से आर्मी ही देश चलाती है. 14 अगस्त 1947 को जन्मे पाकिस्तान में पहली बार सैन्य तख्तापलट अक्टूबर 1959 में हुआ था. उस वक्त राष्ट्रपति सैयद इस्कंदर अली मिर्जा ने देश में इमरजेंसी लगाते हुए मार्शल लॉ लगा दिया था. इसके 13 दिन बाद सेना प्रमुख जनरल अयूब खान ने सत्ता हड़प ली थी. इसका असर पाक-अफगानिस्तान के रिश्ते पर भी पड़ा था. जनरल अयूब खान ने सत्ता में आते ही अफगानिस्तान-पाकिस्तान महासंघ को पूरी तरह से खारिज कर दिया था.

जिया-उल-हक ने तालिबानियों को सपोर्ट किया

इसके बाद 5 जुलाई 1977 को जनरल जिया-उल-हक ने तख्तापलट करते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार हटा दी और पूरा कंट्रोल खुद संभाल लिया. जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार में अफगानिस्तान के साथ सीमा विवाद सुलझाने के लिए 'डूरंड रेखा' समझौता अपने अंतिम चरण में पहुंच गया था, लेकिन जनरल जिया-उल-हक के आते ही यह शांति समझौता कभी लागू नहीं हो सका. 1977 में पाकिस्तान में सेना ने देश पर कब्जा किया तो 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत संघ ने अपनी सेना उतार दी. सोवियत संघ के खिलाफ जिया-उल-हक ने तालिबान लड़ाकों की काफी मदद की.

इस्लामाबाद की सियासत से काबुल रहा प्रभावित

1990 में पाकिस्तान में नवाज शरीफ की सरकार बनी, तो 1992 में अफगानिस्तान में राष्ट्रपति डॉ. मोहम्मद नजीबुल्लाह की सरकार गिर गई. सोवियत संघ के टूटने से काबुल पर तालिबानी लड़ाकों ने कब्जा कर लिया था और अफगानिस्तान में पहली बार तालिबानी शासन लागू हुआ था. हालांकि, इसके बाद अफगानिस्तान में काफी खून-खराबा देखने को मिला.

अक्टूबर 1999 में पाकिस्तान में फिर तख्तापलट हुआ. इस बार जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ की सरकार को बर्खास्त करके कमान अपने हाथों में ले ली, तो साल 2001 में पाकिस्तान के समर्थन से अफगानिस्तान में अमेरिका की सेना घुस गई. अमेरिकी सैन्य अभियान के बाद अफगानिस्तान की पहली तालिबान सरकार सत्ता से हट गई.

पाक सत्तापलट का अफगानिस्तान पर होगा असर?

अगस्त 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की विदाई हुई और दूसरी बार तालबानियों को सत्ता मिली, तो पाकिस्तान में 10 अप्रैल 2022 इमरान खान की सरकार गिर गई. ये घटनाओं इतने कम अंतराल में हुईं, जिससे सियासी जानकारों को आशंका है कि खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी लगने का अफगानिस्तान में भी ना देखने को मिले.

ये भी पढ़ें- CCTV बन गए हैं खतरनाक हथियार? कैमरों और मिसाइल के कनेक्शन पर डराने वाली रिपोर्ट

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

कर्मराज मिश्रा ज़ी न्यूज (डिजिटल) टीम में बतौर चीफ सब एडिटर कार्यरत हैं. वे यहां देश-विदेश की राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं. कानपुर यूनीवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर की डिग्री हासिल करके IBN-7 न्यूज चैनल से इंटर्नशिप की. इसके बाद खबर फास्ट, नेशन लाइव और साधना न्यूज न्यूज चैनलों में काम करने के बाद डिजिटल का रुख किया और 2017 से 2020 तक हिंदुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी में बतौर सीनियर सब एडिटर काम किया. इसके बाद News Nation, India Ahead के बाद वर्तमान में Z Media का हिस्सा हैं. मीडिया में 10 साल के कार्यकाल के दौरान यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़ और दिल्ली विधानसभा चुनावों के अलावा 2019 और 2024 का लोकसभा चुनाव कवर किया है.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES