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इजरायल में 27 अक्तूबर को संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग होगी. वहीं अमेरिका में तीन नवंबर को मिडटर्म इलेक्शन के लिए मतदान होना है. ऐसे में सबको सुरक्षित और फील गुड कराने के लिए इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ही साफ कर चुके थे कि ईरान पर नए हमले न होंगे. व्हाइट हाउस की अधिकारी ने हाल ही में रहा था कि ईरान पर नए हमले नहीं होंगे. इस बीच एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि नेतन्याहू, वोटिंग से करीब हफ्तेभर पहले ईरान के खिलाफ नई एयर स्ट्राइक करने वाले थे, जिसकी भनक लगते ही ट्रंप ने न सिर्फ उन्हें रोका बल्कि उनके पक्ष में वोट मांगने लगे.
हालांकि ये साफ नहीं है कि प्रस्तावित नए हमलों से जुड़े प्रस्तावित मिलिट्री ऑपरेशंस में अमेरिकी सेना सीधे तौर पर शामिल होने वाली थी या नहीं. हालांकि फाइनेंशियल टाइम्स ने तीन अज्ञात सूत्रों के हवाले से बताया कि यह बमबारी 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से किए गए हमलों से भी ज्यादा तेज और भयावाह साबित होने वाली थी.
इजरायली सेना और सुरक्षा बल वोटिंग से पहले ईरान पर बमबारी को एकदम तैयार थे. रुटीन उड़ानों के दौरान बस बटन दबाने भर की देरी थी. इस बार के नए टारगेट में ईरान के परमाणु ठिकानों और सत्ता से जुड़े प्रतिष्ठानों के अलावा बिजली संयंत्रों जैसे नागरिक बुनियादी ढांचे पर भी हमले तय थे, लेकिन ट्रंप ने हमलों को रोक दिया.
इस घटनाक्रम के मद्देनजर, नेतन्याहू ने बीते सोमवार को एक वीडियो जारी किया था, जिसमें वह ट्रंप से बातचीत करते सुनाई दे रहे हैं. बातचीत में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति से कहा, 'डोनाल्ड, आपने कहा था कि हमें एक काम पूरा करना है और हम इसे मिलकर पूरा करेंगे.'
वहीं बुधवार को इजरायली प्रधानमंत्री ने कहा कि ईरान से पैदा होने वाले खतरे को खत्म करने का एकमात्र रास्ता वहां की सरकार को सत्ता से हटाना है. आखिरी दौर की चुनावी रैली में नेतन्याहू ने कहा, 'ईरान हमें खत्म करना चाहता था, हमने उसे रोक दिया. वो एटम बम बनाना चाहता था, हमने रोक दिया... लेकिन वो बाज नहीं आ रहा.'
नए दौर में राजनेता अपने पसंदीदा नेताओं के देश में चुनाव होने पर उनके लिए कैंपेनिंग करके वोट मांगने लगे हैं. इस कड़ी में ट्रंप ने सबसे पहले इजरायल को व्हाइट हाउस का जिगरी और वफादार दोस्त करार दिया. उन्होंने ट्रुथ सोशल पर लिखा- 'बीबी' नेतन्याहू एक वॉरियर प्राइम मिनिस्टर हैं. ईरान के खिलाफ लड़ाई में उनकी भूमिका सराहनीय है, वही ईरान जिसका 51 साल पुराना नारा है, 'डेथ टू इजरायल, डेथ टू अमेरिका.'
ट्रंप ने आगे लिखा- 'तेहरान 'डेथ टू इजरायल, डेथ टू अमेरिका' को सच साबित करना चाहता था, लेकिन हमने उसकी कमर तोड़ दी. इजरायल के पास गलत नेता होता तो अमेरिका को ये काम खुद करना पड़ता. 'बीबी' जबरदस्त विरोध के बावजूद बहादुरी और मजबूती से चुनाव मैदान में डटे हैं, मुश्किलों में वो और मजबूत होकर उभरे. वो आपको कभी झुकने नहीं देंगे. मैं उनकी मजबूती के लिए प्रार्थना करता हूं.'
दूसरी ओर अपनी तारीफ और इजरायल के फेवर में ट्रंप को बैटिंग करते देख गदगद नेतन्याहू ने भी अमेरिका में बसे यहूदी नागरिकों से सच्चे दोस्त को पहचानने का संदेश दिया.
फाइनेंशियल टाइम्स के सूत्र ने कहा कि आने वाले हफ्तों में दोनों देशों का मिलकर ईरान पर हमला करना असंभव बात नहीं है. 'या तो समझौता होगा या हमला.' क्योंकि ट्रंप का आखिरी मकसद ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े समझौते में अपनी शर्तों को मानने के लिए मजबूर करना है.
दोनों नेता चुनावों का सामना कर रहे हैं. इसलिए फिलहाल शांत बैठे हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि बैकडोर से चल रही बातचीत कामयाब नहीं हुई तो नए टारगेट की लिस्ट बन चुकी है. बस मिटटर्म इलेक्शन के नतीजे आने के बाद ईरान पर हमलों का नया दौर शुरू हो सकता है.
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ चंद रोज पहले इजरायल में थे. जहां उन्होंने वरिष्ठ सैन्य अफसरों और नेतन्याहू से बात की. इस दौरान इजरायली अधिकारियों ने संभावित हमलों के लिए ठिकानों की नई लिस्ट सौंपी, जिसमें उन जगहों को भी शामिल किया गया था, जिन्हें 28 फरवरी के हमलों के दौरान निशाना नहीं बनाया गया था. इस सूची में नागरिक बुनियादी ढांचे से जुड़े ठिकाने भी शामिल थे.
देश कोई भी हो, चुनावी साल में सरकारें जनता के कंधों पर टैक्स का बोझ बढ़ाने से बचती हैं. महंगाई से निपटने के लिए सब्सिडी बढ़ाती हैं. कालाबाजारी रोकने के लिए कड़े कदम उठाने के साथ सप्लाई चेन मजबूत करती हैं. पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रखे जाते हैं. इससे दो कदम आगे चलते हुए ट्रंप और नेतन्याहू अपनी पब्लिक को सेफ और सिक्योर महसूस कराने के लिए दुश्मन देशों पर हमले का प्लान टाल देते हैं.