Israel Election 2026: इजरायल में फिर फंसा सियासी पेच! किंगमेकर बनीं अरब पार्टियां, नेतन्याहू के पास सरकार बनाने के 3 रास्ते
1948 में देश की स्थापना के बाद से इजरायल में हमेशा गठबंधन सरकारें रही हैं. इस बार भी यही हाल दिख रहा है, क्योंकि 90 प्रतिशत से ज्यादा वोटों की गिनती पूरी होने के बाद भी सरकार बनाने का रास्ता साफ नहीं हो सका है. ऐसे में जानते हैं 53 सीटों पर लीड कर रहे नेतन्याहू गुट के पास सरकार बनाने के कौन से तीन विकल्प हैं.
Israel Election Result 2026: इजरायल में इस बार सरकार कौन बनाएगा? यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि हर बार की तरह इस बार भी किसी एक दल को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है. 90% वोटों की गिनती पूरी होने के बाद जो रुझान सामने आए हैं, वे किसी भी गुट को स्पष्ट बहुमत देते नजर नहीं आ रहे.
शुरुआती रुझानों के मुताबिक, इजरायली संसद की 120 सीटों में से 53 पर बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन बढ़त बनाए हुए है, जबकि यशार पार्टी के अध्यक्ष गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाला गुट 48 सीटों पर आगे चल रहा है. ये दोनों ही गठबंधन बहुमत के आंकड़े से दूर हैं, क्योंकि सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 61 का है.
हम यहां डिटेल से जानेंगे कि अगर शुरुआती रुझान नतीजों में बदले, तो बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन के पास सरकार बनाने के कौन-से तीन रास्ते होंगे?
अरब पार्टियां किंगमेकर बनकर उभरीं
आपको सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि इस बार अरब पार्टियां किंगमेकर बनकर उभर रही हैं. दरअसल, इस बार चुनावी मैदान में उतरीं 2 अरब पार्टियों को कुल 19 सीटें मिलती दिख रही हैं. अगर ये शुरुआती रुझान अंतिम नतीजों में तब्दील होते हैं, तो यह अपने आप में एक नया रिकॉर्ड होगा, क्योंकि इससे पहले अरब पार्टियों ने अधिकतम 15 सीटों पर ही जीत हासिल की थी.
दरअसल, इजरायली संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों का आंकड़ा जरूरी है. नेतन्याहू जादुई आंकड़े से कम सीटें होने पर भी सरकार बना सकते हैं. उनके लिए 19 सीटों के साथ किंगमेकर बनकर उभरी अरब पार्टियों की जरूरत भी नहीं है.
नेतन्याहू के पास कौन-से 3 विकल्प हैं?
1. विपक्षी खेमे में सेंधमारी करनी होगी
नेतन्याहू के पास सबसे पहला ऑप्शन सीधा-सिंपल है. उन्हें विपक्षी खेमे में सेंधमारी करनी होगी. मतलब ये कि वो विपक्षी गठबंधन की किसी पार्टी या उनके कुछ सांसदों को तोड़ें और अपने पाले में लाएं. इस काम के लिए उन्हें लालच देना होगा, जैसे सरकार में मलाईदार पद, मंत्रालय का ऑफर या फिर उनकी कुछ बड़ी शर्तें माननी होंगी.
अगर ऐसा हुआ तो कुछ सांसद फ्लोर टेस्ट में नेतन्याहू के फेवर में वोट कर सकते हैं या फिर उस वक्त गैरहाजिर ही रह जाएं. ऐसा होने से नेतन्याहू के लिए सरकार बनाने का रास्ता काफी आसान हो जाएगा, लेकिन यह कहने में जितना आसान है असल में होना उतना ही कठिन, क्योंकि पूरे चुनाव में विपक्षी नेताओं का एक ही मेन एजेंडा था कि नेतन्याहू को कैसे भी सत्ता से बाहर करना है. ऐसे में विरोधी खेमे से उनके पाले में जाना किसी के लिए भी बड़ा रिस्की रहेगा.
2. नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट का कार्ड खेलना
दूसरा ऑप्शन है कि नेतन्याहू बाकी पार्टियों को साथ लेकर एक 'नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट' का दांव चलें. इसके तहत उनके साथ मौजूदा राइट-विंग और कट्टर धार्मिक साथियों के अलावा विपक्ष के कुछ बड़े चेहरे भी शामिल हो सकते हैं. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट या गादी आइसेनकोट जैसे कद्दावर नेताओं का रोल काफी अहम साबित हो सकता है.
हालांकि, यह फॉर्मूला सेट करना बेहद मुश्किल है. इसके लिए रोटेशनल प्राइम मिनिस्टरशिप (बारी-बारी से पीएम पद), मिलिट्री सर्विस (सैन्य भर्ती) के नियम और कई कोर पॉलिसीज पर भारी कॉम्प्रोमाइज करना पड़ेगा. इसमें सबसे बड़ी दिक्कत तो नेतन्याहू और आइसेनकोट के बीच की पुरानी सियासी अदावत है. एक और बात कि नेतन्याहू के कट्टर दक्षिणपंथी साथी किसी भी हाल में विपक्षी नेताओं के साथ पावर शेयरिंग के लिए एग्री नहीं होंगे.
3. अल्पमत सरकार चलाना
तीसरा ऑप्शन अल्पमत सरकार चलाने का है, जो बिना 61 के जादुई आंकड़े के संभव है. इसके लिए एक माइनॉरिटी गवर्नमेंट खड़ी करनी होगी. यानी गठबंधन के पास अपनी खुद की 61 सीटें न भी हों, तब भी वो विश्वास मत (कॉन्फिडेंस वोट) पास करवा ले. इसके लिए अरब पार्टियों को सरकार में शामिल होने की कतई जरूरत नहीं है. अगर वो वोटिंग के वक्त सदन से वॉकआउट कर जाएं या सिर्फ वोट देने से बच जाएं तो सदन में मौजूद और वोट करने वाले सांसदों की कुल संख्या घट जाएगी और नेतन्याहू सिंपल मेजॉरिटी से ट्रस्ट वोट आराम से निकाल ले जाएंगे.
ये ऑप्शन और ज्यादा घातक होगा, क्योंकि इस जुगाड़ वाली सरकार की लाइफ हमेशा खतरे में रहेगी. ऐसी हुकूमत में स्टेबिलिटी की कोई गारंटी नहीं होती. देश में कोई भी बजट पास कराने से लेकर हर छोटे-बड़े कानून को संसद में पास करवाने के लिए नेतन्याहू को हर बार नए सिरे से सांसदों का समर्थन जुटाना पड़ेगा, जो माथापच्ची का काम होगा. मान लीजिए अगर किसी भी मोड़ पर पूरा विपक्ष एकजुट होकर सरकार के खिलाफ वोट कर दे, तो फिर कुर्सी गिरते देर नहीं लगेगी. इसलिए नेतन्याहू इस ऑप्शन के बारे में तो सोच भी नहीं रहे होंगे.
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