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3.5 लाख की खूंखार फौज और ईरानी मिसाइलें: जानिए कैसे पहाड़ों से निकले बागी लड़ाके दुनिया के लिए बन गए 'काल'?

ये वही हूती हैं, जिन्होंने 2014 में यमन की राजधानी पर कब्जा करके सबको चौंका दिया था. इन्हें ईरान से ड्रोन और मिसाइलें मिलती हैं, जिनके दम पर ये सऊदी अरब जैसी ताकतों से भी कई साल तक लोहा ले चुके हैं. इन दिनों यह संगठन लाल सागर के समुद्री रास्तों पर कब्जा करने में जुटा है और उसने पूरी दुनिया की नाक में दम कर रखा है.

3.5 लाख की खूंखार फौज और ईरानी मिसाइलें: जानिए कैसे पहाड़ों से निकले बागी लड़ाके दुनिया के लिए बन गए 'काल'?
Image Credit: हूतियों के बारे में जानिए

हूतियों ने इन दिनों लाल सागर में तबाही मचा रखी है. कभी यमन के पहाड़ों में साधारण बंदूकों के साथ लड़ने वाले हूती विद्रोही आज पूरी दुनिया की नींद उड़ा रहे हैं. हाल ही में इस संगठन ने लाल सागर के सबसे अहम समुद्री रास्ते 'बाब अल-मंदेब' जलडमरूमध्य पर कब्जा जमा लिया है. ईरान की मिसाइलों और ड्रोनों के दम पर आज ये लड़ाके न सिर्फ समंदर में बड़े-बड़े जहाजों की नाक में दम कर रहे हैं, बल्कि सऊदी अरब और इजरायल तक सीधे हमले बोल रहे हैं.

1990 के दशक में जिनके पास बुनियादी हथियार तक नहीं थे, आज उनके पास 3.5 लाख लड़ाकों की फौज, घातक ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलें हैं. यमन के एक छोटे से पहाड़ी परिवार से शुरू हुआ यह आंदोलन आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे खूंखार खिलाड़ी बन चुका है. ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि आखिर ये हूती हैं कौन और एक मामूली विद्रोही गुट देखते ही देखते दुनिया के लिए इतना बड़ा सिरदर्द कैसे बन गया? आइए इनकी पूरी कहानी जान लेते हैं.

कौन हैं हूती विद्रोही?

हूती असल में यमन का एक बागी हथियारबंद गुट है. ये यमन के अल्पसंख्यक शिया समुदाय (जैदी) से आते हैं. इनका सीधा फंडा है अमेरिका, इजरायल और पश्चिमी देशों का विरोध करना. ईरान इन्हें खुला समर्थन देता है. लेबनान के हिजबुल्लाह और फलस्तीन के हमास से भी इनकी पक्की यारी है.

शुरुआत कहां से हुई?

यमन में करीब एक हजार साल तक जैदी शिया इमामों का राज रहा, जो 1962 में खत्म हो गया. इसके बाद देश में सुन्नी और सलाफी विचारधारा का असर बढ़ने लगा. साथ ही सरकार भी इस इलाके और समुदाय की अनदेखी करने लगी. इसी के विरोध में 1990 के दशक में हुसैन बद्रुद्दीन अल-हूती ने अपनी पहचान और धर्म को फिर से मजबूत करने के लिए एक आंदोलन शुरू किया.

इस संगठन का असली नाम 'अंसार अल्लाह' है. इसका मतलब होता है 'अल्लाह के बंदे'. 1990 के दशक में इसकी नींव हुसैन अल-हूती ने रखी थी. उन्हीं के नाम पर इस गुट का नाम 'हूती' पड़ा. उनकी मौत के बाद अब उनका भाई अब्दुल मलिक अल-हूती पूरा संगठन चलाता है.

बगावत का रास्ता कैसे चुना?

साल 2000 के आसपास हूतियों ने यमन की सरकार के खिलाफ हथियार उठा लिए थे. उस वक्त वहां अली अब्दुल्ला सालेह राष्ट्रपति थे. हूती अपने इलाके के लिए ज्यादा हक और आजादी मांग रहे थे. दोनों के बीच कई लड़ाइयां हुईं.

2011 में जब पूरे अरब देशों में बगावत की हवा चली (अरब स्प्रिंग), तो जनता सड़कों पर आ गई. राष्ट्रपति सालेह को कुर्सी छोड़नी पड़ी. उनकी जगह नए राष्ट्रपति बने मंसूर हादी, लेकिन हादी की पकड़ बहुत कमजोर निकली.

राजधानी पर कब्जा और राष्ट्रपति का भागना

सरकार की कमजोरी देख हूतियों ने खेल कर दिया. उन्होंने 2014 में यमन की राजधानी सना पर धावा बोल दिया. कमाल की बात यह रही कि जिस पुराने राष्ट्रपति सालेह से वे लड़ते थे, उन्हीं की फौज से हाथ मिला लिया. 2015 आते-आते हूतियों ने आधे से ज्यादा यमन पर कब्जा कर लिया. नए राष्ट्रपति हादी को जान बचाकर देश छोड़कर भागना पड़ा.

सऊदी अरब की एंट्री और सालों की जंग

यमन में हुए तख्तापलट को देख पड़ोसी देश सऊदी अरब के कान खड़े हो गए. उसे लगा कि अगर हूतियों का राज हुआ, तो उसका कट्टर दुश्मन ईरान उसकी सीमा तक आ पहुंचेगा. इसके बाद सऊदी अरब ने बाकी अरब मुल्कों को साथ लिया और हूतियों पर जंग छेड़ दी.

सालों तक बमबारी हुई और जमीन पर भारी लड़ाई लड़ी गई, लेकिन हूतियों को हिलाया नहीं जा सका. यह गतिरोध 2022 में संघर्ष विराम पर जाकर थमा. सऊदी गठबंधन की तमाम कोशिशों के बाद भी आज यमन के बड़े हिस्से पर हूतियों का ही कब्जा है.

2023 से 2025 के बीच जब गाजा में जंग छिड़ी, तो हूतियों ने फलस्तीन का साथ देने का दावा किया. उन्होंने लाल सागर से गुजर रहे जहाजों और सीधे इजरायल पर मिसाइलें व ड्रोन दागने शुरू कर दिए. इसके बाद जब 28 फरवरी से अमेरिका ने हूतियों के सबसे बड़े मददगार ईरान पर हमले किए, तो वे फिर भड़क गए. उन्होंने लाल सागर में जहाजों को दोबारा निशाना बनाना शुरू कर दिया और सऊदी अरब के तेल-गैस ठिकानों पर भी हमले बोल दिए.

यमन के भीतर अभी क्या चल रहा है?

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के हफ्तों में यमन में चला आ रहा 2022 का शांति समझौता (सीजफायर) पूरी तरह से तार-तार हो चुका है. जिन पुराने मोर्चों पर शांति थी, वहां फिर से भीषण गोलीबारी और धमाके शुरू हो गए हैं. इनमें उत्तर में मारिब और अल-जौफ से लेकर दक्षिण के ताइज, मध्य यमन के धाले और लाल सागर के तटीय इलाके 'तिहामा' तक हर तरफ बारूद की गंध है.

सबसे बड़ा खेल पिछले हफ्ते हुआ, जब हूतियों ने दक्षिणी तिहामा में बेहद तेजी से धावा बोला. उन्होंने सबसे पहले अहम बंदरगाह शहर मोचा (Mocha) को अपने कब्जे में लिया. इसके बाद देखते ही देखते लाल सागर के पूरे तटीय इलाके और आसपास के द्वीपों पर अपना झंडा फहरा दिया.

इसका सीधा असर यह हुआ कि 19 किलोमीटर (12 मील) चौड़ा पूरा 'बाब अल-मंदेब' जलडमरूमध्य अब हूतियों की तोपों और मिसाइलों की जद में आ चुका है.

अब यहां से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों और एशिया की तरफ जाने वाले सऊदी अरब के तेल टैंकरों का रास्ता रोकना हूतियों के बाएं हाथ का खेल बन गया है. इतना ही नहीं, हूती लड़ाके अब इस नए ठिकाने से अदन शहर पर बड़ा जमीनी हमला बोलने की फिराक में हैं. दूसरी तरफ, हूतियों के इस बढ़ते कदम को रोकने के लिए सऊदी अरब ने मोर्चा संभाल लिया है और सरकारी फौजों की मदद के लिए लगातार जोरदार हवाई हमले कर रहा है.

हूतियों की मिसाइलें और ड्रोन कितने खतरनाक हैं?

हूतियों की सबसे बड़ी ताकत है दूर बैठे दुश्मन पर सटीक निशाना लगाना. इनकी बैलिस्टिक मिसाइलें 1,800 किलोमीटर दूर इजरायल तक पहुंच चुकी हैं. साल 2025 में तो इनकी एक मिसाइल सीधे इजरायल के मुख्य एयरपोर्ट के पास जा गिरी थी. इसके अलावा, वे पड़ोसी देश सऊदी अरब के शहरों और ठिकानों पर भी लगातार मिसाइलें दागते रहे हैं.

ड्रोन के मामले में भी हूतियों ने बड़ा खेल कर दिखाया है. पहले वे सऊदी अरब पर ही ड्रोन से हमला करते थे, लेकिन अब वे सीधे जंग के मैदान में भी छोटे-बड़े ड्रोनों की झड़ी लगा रहे हैं. 2022 के सीजफायर से पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था, पर अब युद्ध में ड्रोन का यह अंधाधुंध इस्तेमाल दुनिया के लिए नया और बड़ा खतरा बन चुका है.

हूती लड़ाके किन हथियारों से लड़ रहे हैं?

सितंबर की शुरुआत से ही हूतियों ने कई वीडियो जारी किए हैं. इन वीडियो में उनके हथियारों और ताकत की साफ झलक दिखती है:

सटीक ड्रोन हमले: जारी किए गए वीडियो में दिख रहा है कि हाई-क्वालिटी कैमरों वाले ड्रोन सीधे इमारतों, गाड़ियों और सैन्य ठिकानों पर बम और मोर्टार गिरा रहे हैं. निशाना बिल्कुल सटीक लग रहा है.

जमीनी लड़ाकों का अंदाज: लड़ाके हथियारों से लदी पिक-अप गाड़ियों और पैदल मार्च करते नजर आते हैं. ज्यादातर लड़ाके फौजी वर्दी के बजाय पारंपरिक अरबी चोगे में हैं. उनके हाथों में असॉल्ट राइफलें, हल्की-भारी मशीनगनें और स्नाइपर गन साफ देखी जा सकती हैं. कुछ लड़ाके बाकायदा मिलिट्री वर्दी में भी हैं.

छीने गए सऊदी हथियार: हूतियों ने सऊदी समर्थित सेना से छीने गए हथियारों की भी नुमाइश की है. इनमें बख्तरबंद गाड़ियां, टैंक, तोपें, सैटेलाइट डिश और ड्रोन को जाम करने वाले डिवाइस तक शामिल हैं.

हूतियों तक हथियार कैसे पहुंचते हैं?

संयुक्त राष्ट्र (UN) की 2025 की एक रिपोर्ट बताती है कि हूतियों ने बाहरी तकनीकी मदद और खुद के जुगाड़ से अपनी मिसाइल और ड्रोन तकनीक को काफी मजबूत कर लिया है.

UN के कड़े प्रतिबंधों के बावजूद हथियारों की जमकर तस्करी हो रही है. हथियार और कलपुर्जे ओमान सीमा के रास्ते सड़क से और समंदर के जरिए यमन पहुंचाए जाते हैं. पकड़े गए सामानों में ड्रोन के कंट्रोलर, जहाजों की लोकेशन ट्रैक करने वाले डिवाइस, ड्रोन के इंजन और मिसाइल के पुर्जे शामिल हैं. इससे पहले 2023 में तो बने-बनाए ड्रोन, मिसाइल में इस्तेमाल होने वाले केमिकल और ईरान में बनी एंटी-टैंक मिसाइलें तक पकड़ी जा चुकी हैं.

ईरान से जुड़े सूत्रों का भी कहना है कि तेहरान ने हूतियों को हथियार और सैन्य एक्सपर्ट दोनों भेजे हैं, भले ही ईरान दुनिया के सामने इससे साफ मुकर जाता है. डिफेंस थिंक टैंक IISS की रिपोर्ट के मुताबिक, हूतियों ने अपने यहां छोटे-मोटे हथियार बनाना जरूर सीख लिया है, लेकिन हाई-टेक हथियारों और जरूरी कलपुर्जों के लिए वे आज भी पूरी तरह से ईरान पर ही टिके हैं.

एक मामूली बागी गुट पूरी सेना में कैसे बदल गया?

संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट के मुताबिक, आज हूतियों के पास करीब 3.5 लाख लड़ाकों की बहुत बड़ी फौज है. इनमें 18 साल से कम उम्र के लड़कों को भी जबरन या बरगलाकर भर्ती किया गया है. इनकी असली ताकत है चुपके से घुसपैठ करना, ड्रोन से अचूक हमले बोलना, भारी गोलाबारी करना और रास्तों पर लैंडमाइन्स बिछाना.

हूतियों को किसने ट्रेनिंग दी?

लंदन के थिंक टैंक RUSI के रक्षा विशेषज्ञ बराक शिबान बताते हैं कि 2011 के अरब स्प्रिंग के तुरंत बाद ईरान और लेबनान के हिजबुल्लाह ने हूतियों को कमांडो स्तर की ट्रेनिंग देनी शुरू की थी. इसी ट्रेनिंग की बदौलत यह बिखरा हुआ पहाड़ी लड़ाका गुट एक सधी और बेहद अनुशासित सेना में तब्दील हो गया.

UN के एक्सपर्ट्स का दावा है कि हिजबुल्लाह के मिसाइल और ड्रोन ऑपरेटर सीधे यमन में रहकर हूतियों के साथ काम कर रहे हैं. इतना ही नहीं, ईरान की खूंखार कुद्स फोर्स के जनरल अब्दुलरजा शाहलाई भी खुद यमन में मौजूद रहे हैं और युद्ध की पूरी रणनीति तैयार करने में हूतियों का मार्गदर्शन करते रहे हैं.

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Bhoopendra Rai

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पत्रकारिता में 9 साल से सक्रिय भूपेंद्र कुमार राय Zee News में सीनियर सब एडिटर के तौर पर न्यूज टीम का हिस्सा हैं, देश विदेशी की खबरें कवर करते हैं. 2017 में ETV Bharat (हैदराबाद) से करियर की शुरुआत करने के बाद वे 2020 में Zee News पहुंचे, जहां 2022 तक काम किया. 2023 में News24 की स्पोर्ट्स टीम को लीड करने का मौका मिला. इसके बाद India Daily Live में बतौर चीफ सब एडिटर स्पोर्ट्स टीम के साथ जुड़े. 2024 में दोबारा News24 लौटे और नई स्पोर्ट्स वेबसाइट लॉन्चिंग का अहम हिस्सा रहे. अक्टूबर 2025 में News24 से अलविदा लेकर एक बार फिर Zee News पहुंचे हैं. खेलों में गहरी रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, ओलंपिक गेम्स, हॉकी वर्ल्ड कप समेत बड़े खेल इवेंट को कवर करने का अनुभव है. ब्रेकिंग न्यूज, क्रिकेट एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर अच्छी पकड़ है. जी न्यूज में खेल से जुड़ी खबरों के बाद अब न्यूज टीम के साथ रियलटाइम न्यूज पर काम कर रहे हैं. एक्सप्लेनर और किसी भी मुद्दे पर रिसर्च के साथ उसे आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. आप Bhoopendra.Rai@zeemedia.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facebook से जुड़ सकते हैं.
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