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आखिर बरसों-बरस में हम बदल गए तो ये जाहिर है ये एक प्रक्रिया रही होगी? तो क्या वो प्रक्रिया रुक गई? हम इंसान के मौजूदा सांचे में ढल गए और अब ऐसे ही रहेंगे? ऐसा कैसे हो सकता है? आखिर हर चीज तो बदल रहा है. हमारी आंखों के सामने बदल रहा है तो हम जैसे हैं वैसे क्यों रहेंगे?
आपमें से तमाम लोगों ने थ्योरी ऑफ इवॉल्यूशन पढ़ा होगा. ये बंदरों के हमारे पूर्वज होने का सिद्धांत इसी से तो निकला है. आज हम थ्योरी ऑफ इवॉल्यूशन के अगले जोन में लेकर आपको चलेंगे. आज पर्दा उठाएंगे कि बंदर से मनुष्य और अब मनुष्य से आगे क्या?
बहुत दिलचस्प कहानी है. सबकुछ साइंटिफिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित है. पिछले कुछ हजार वर्षों में जिस तरह से इंसानी शरीर ने खुद को बदला है, वही तो सबसे बड़ा प्रमाण है. लेकिन हमने कभी इस बदलाव पर उतनी गहराई से सोचा ही नहीं. कुछ वैज्ञानिकों ने इस बारे में सोचा तो कमाल की चीजें सामने आई हैं.
साइंस की मौजूदा सोच क्या है? यही कि इंसानों का इवॉल्यूशन रुक चुका है. इंसान अब जैसा है बस वैसा है. यानी जिस तरह से हम बंदर से इंसान बने अब यहां से कुछ और बन जाएंगे ऐसा नहीं है. मौजूदा सोच यही है कि आधुनिक मेडिसिन और तकनीक ने इंसानों में इवॉल्यूशन की प्रक्रिया को रोक दिया है.
इंसानी विकास यानी इवॉल्यूशन के रुक जाने की ये जो थ्योरी है इसकी एक और वजह मानी जाती है. ये वजह है हमारी आराम-तलबी. यानी हमारी लाइफ इतनी आरामदेह हो गई है कि हमारा जेनेटिक इवॉल्यूशन रुक गया है. लेकिन इन सारी थ्योरी को खारिज करने का वक्त आ चुका है.
लेकिन एक नई रिसर्च बताती है कि हम आज भी इवॉल्व कर रहे हैं. इंसानों का शरीर, इंसानों की कद-काठी, रंग-रूप सब-कुछ बदल रहा है. यानी जो हम आज हैं, आने वाले वक्त में वैसे नहीं होंगे. हमारी शारीरिक समस्याएं वैसी नहीं होंगी, जैसी अभी हैं. इसकी वजह ये है कि हमारा जीन बदल रहा है.
इससे जानने के लिए पहले कुछ परिस्थितियों को समझिए. एक इंसान हमेशा अलग-अलग हालात का सामना करता है. कई बार बाहर से चुनौतीपूर्ण हालात होते हैं. ऐसी बाहरी चुनौती भौगोलिक परिस्थितियों, इंसान की आर्थिक परिस्थितियों, बीमारियों या किसी ऐसे संक्रमण से हो सकता है, जो शरीर के अंदर जेनेटिक बदलाव तक ला देते हैं.
नई जेनेटिक स्टडी में यह बिल्कुल साफ हो गया है कि हम अभी भी विकसित हो रहे हैं. नई रिसर्च कहती है कि विकास लगातार चलने वाला प्रोसेस है लेकिन क्यों?
इसे ऐसे समझिए कि जैसे जनसंख्या के दो अलग-अलग वर्ग हैं. दोनों की अलग-अलग भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां हैं. मुमकिन है कि एक वर्ग भोजन खोजने में महारत रखता हो, जबकि दूसरा शिकार करने में. इसकी तरह, इंसानों का कोई समूह ऐसा हो सकता है, जो बीमारियों से लड़ने में ज्यादा सक्षम हो. कोई आर्थिक रूप से इतना समृद्ध हो, जिसे शारीरिक मेहनत ही न करनी हो. ये सभी गुण या स्थितियां उन्हें पर्यावरण के खतरों से बचने में अधिक सक्षम बनाती हैं. इन्हीं को 'सिलेक्शन प्रेशर' कहा जाता है.
यहीं से फर्क शुरू होता है. जीन में बदलाव की प्रक्रिया शुरू होती है और ये बदलाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाता है. सिलेक्शन प्रेशर हमें अपने दिए गए माहौल में जीवित रहने के लिए बदलाव की ओर ले जाते हैं. इसे जीव वैज्ञानिक अनुकूलन यानी एडैप्टेशन कहते हैं. ये हमारे शरीर की मजबूरी है, जिसे हम नहीं रोक सकते. इसे रोकना हमारे लिए उचित भी नहीं है.
इसी एडैप्टेशन ने हमें हमारा आज का रूप और स्वरूप दिया है. परिस्थितियों से संघर्ष के आज के दौर में भी यही एडैप्टेशन आगे हजारों वर्ष बाद हमें एक नया रूप देगा. इंसानों का वह रूप कैसा होगा, हमें नहीं पता लेकिन वह आज जैसा बिल्कुल नहीं होगा. इंसान आज जो है, जैसा है, वैसा नहीं रहेगा. हम परिवर्तित हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे.
एक और बड़ा बदलाव इंसान में होने वाली बीमारियों को लेकर भी हुआ है. ये बदलाव भी हजारों वर्षों में आया है. इस इवॉल्यूशन से इंसान की वायरस को लेकर रिएक्शन बदल गया है. जाहिर है वायरस से पैदा होने वाली संक्रामक बीमारियों के प्रति हमारा शरीर अब अलग तरीके से रिएक्ट करता है. यहां तक कि HIV संक्रमण के साथ भी ये बदलाव आया है. दक्षिण अफ्रीका में अब ये संक्रमण आम है और इसके प्रति शरीर खुद को खुद ब खुद इम्यून भी बना ले रहा है.