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BRICS 2026: भारत BRICS 2026 की मेजबानी कर रहा है. 12 और 13 सितंबर को देश की राजधानी नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों के नेताओं का जमावड़ा लगने जा रहा है. ईरान, चीन, रूस समेत दुनिया के अन्य देशों के नेता भी नई दिल्ली आने वाले हैं. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी इस ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. भारत मंडपम में सम्मेलन की मेजबानी करने को तैयार है.
दरअसल, ब्रिक्स शिखर सम्मलेन केवल नियमित बहुपक्षीय बैठक नहीं है, बल्कि तेजी से बदल रहे वैश्विक समीकरणों के बीच सामन्वय स्थापित करने का एक तरीका है. इस बार होने वाली ये अहम बैठक ऐसे समय पर हो रही है, जब पश्चिम एशिया में लंबे समय से युद्ध जारी है और इसका असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. सबसे खास बात है कि ब्रिक्स में ईरान के औपचारिक प्रवेश के बाद पहली बार ये बैठक भारत में हो रही है. यही कारण है कि ब्रिक्स में ईरान की मौजूदगी और बढ़ता प्रभाव भारत के काफी अहम हो जाता है.
जैसा की सभी जानते हैं कि ब्रिक्स शुरू से ही उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का एक आर्थिक और विकासात्मक मंच रहा है. हालांकि, समय के साथ कुछ अन्य देशों की एंट्री इस ग्रुप में हुई. ब्रिक्स का असल उद्देश्य दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में विकासशील देशों की हिस्सेदारी बढ़ाना रहा है. लेकिन अब संगठन की राजनीतिक तस्वीर काफी बदल गई है.

1 जनवरी 2024 से ईरान भी ब्रिक्स देशों का हिस्सा बना है. चूंकि, ईरान पिछले कई दशकों से पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और उसकी विदेश नीति का आधार हमेशा से पश्चिमी प्रभाव का विरोध ही रहा है. ऐसे में ईरान की एंट्री के बाद भारत के सामने भी चुनौती खड़ी होने की प्रबल संभावना है. वह भी ऐसे समय में, जब पश्चिम एशिया एक बड़े संकट से गुजर रहा है.
ब्रिक्स में ईरान का शामिल होना इस मंच को पश्चिम देशों की नजर में एंटी वेस्टर्न गठबंधन के रूप में पेश करने का जोखिम पैदा करता है. पहले भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार ब्रिक्स देशों को धमकी भी दी है. इन सबके बीच नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती है ब्रिक्स संगठन के मूल पहचान को बनाए रखे और इसको एक तरफा किसी पश्चिम विरोधी मंच में तब्दील न होने दे.
ईरान कच्चा तेला का सबसे बड़ा उत्पाद है. वहीं, भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण राणनीतिक जुड़ाव तेहरान की कनेक्टिविटी है. भारत ने सदैव मिडिल ईस्ट और यूरेशिया तक सीधी पहुंच की चाहत रखी है. हालांकि, भौगोलिक रूप से पाकिस्तान के अड़ंगो के कारण भापत को जमीनी रास्ता नहीं मिल पाया.
अब ईरान ही इस भू-राजनीतिक अवरोध का सबसे मजबूत और व्यावहारिक समाधान है. ऐसे में हमें चाबहार बंदरगाह की अहमियत, पाकिस्तान को दरकिनार करने के रास्ते और आईएनएसटीसी को गति देने के पर विचार करना होगा.

भारत की ओर से ईरान के चाबहार के विकास के लिए दीर्घकालिक समझौते भी पिछले कुछ समय में हुए हैं. आने वाले वक्त में इस पोर्ट की मदद से भारत की पहुंच अरब सागर के रास्ते ईरान और वहां से आगे अफगानिस्तान एवं मध्य एशियाई देशों तक होने की संभावना है.
इसके अलावा पाकिस्तान को दरकिनार करना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इस्लामाबाद हमेशा भारत के मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच को रोकने की कोशिश करता है. ऐसे में चबहार के पूरी तरीके से सक्रिय होने के बाद भारत की ओर पाकिस्तान के रास्ते पर अपनी निर्भरता को समाप्त कर लेगा.
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण दुनिया के बड़े-बड़े देशों में तेल की कमी देखने को मिली है. भारत भी इससे अछूता नहीं रही. चूंकि, भारक अपनी एनर्जी की आवश्यकताओं का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है. साल 2019 से पहले भारत ईरान से तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक था.
ईरानी तेल से भारत को कई मायनों में लाभ था. ईरान से तेल लेने पर भारत को सस्ती ढुलाई,आकर्षक क्रेडिट शर्तें और डॉलर के मुकाबले रुपये-रियाल में भुगतान की सुविधा मिला करती थी. बाद में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण होने के बाद भारत ने भी ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया.
भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मलेन में ब्रिक्स देशों के नेता जुटेंगे. इस शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी. इस समय ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध चरम पर है, ऐसे में BRICS में ईरान से बढ़ती नजदीकियों के बीच नई दिल्ली के लिए सबसे नाजुक पहलू अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक संबंध हैं। चूंकि, भारत फिलहाल अमेरिका से साथ क्वाड जैसी मजबूत साझेदारी का हिस्सा है. भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में कई बड़े समझौते पर विचार चल रहा है.
गौरतलब है कि ईरान की ब्रिक्स सदस्यता भारत के लिए मध्य एशिया के बंद दरवाजों को खोलने वाली चाबी है. ऐसे में नई दिल्ली को इस शिखर सम्मलेन में अपनी अध्यक्षता का सही इस्तेमाल करते हुए यह संदेश देने की कोशिश करनी होगी कि ब्रिक्स का उद्देश्य किसी भी वैश्विक व्यवस्था को तोड़ना नहीं, बल्कि विकासशील देशों के हितों की रक्षा करते हुए अधिक समावेशी, बहुध्रुवीय और संतुलित विश्व का निर्माण करना है.