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Uttarakhand Glacial Lake: नेपाल में आई त्रासदी के बाद ग्लेशियर झीलों से आने वाली बाढ़ यानी GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) एक बार फिर चर्चा में है. इस घटना ने हिमालयी राज्यों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं है. उत्तराखंड की बात करें तो यहां करीब 450 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं. खास बात ये है कि इनमें से 13 झीलों को संवेदनशील मानते हुए A, B और C कैटेगरी में रखा गया है. नेपाल में आई आपदा के बाद उत्तराखंड के ग्लेशियर झीलों ने चिंता बढ़ा दी है.
आखिर ग्लेशियर झील क्या होती है?
सबसे पहले यह जान लेते हैं कि आखिर ग्लेशियर झील होती क्या है? यह कैसे बनती है?. ऊंचे पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियर यानी बर्फ की विशाल नदियां जब धीरे-धीरे पिघलती हैं तो उनका पानी कई जगहों पर जमा होने लगता है. कई बार ग्लेशियर के आसपास या उसके आगे जमा मलबा, मिट्टी, पत्थर और बर्फ पानी के लिए प्राकृतिक बांध का काम करते हैं. इसी के पीछे पानी जमा होकर एक झील का रूप ले लेता है. इन्हें ही ग्लेशियर झील कहा जाता है.
भविष्य के खतरे का आकलन जरूरी
अब सवाल उठता है कि आखिर ये खतरनाक कब हो जाती हैं? या तबाही कैसे मचाती हैं. दरअसल, सामान्य स्थिति में ये झीलें शांत रहती हैं. लेकिन अगर इनमें अचानक पानी बढ़ जाए या आसान शब्दों में कहें कि झील को रोककर रखने वाला प्राकृतिक बांध टूट जाए तो खतरा बढ़ जाता है. नेपाल जैसी तबाही आ सकती है. ऐसे में उत्तराखंड के 13 संवेदनशील झीलों की वास्तविक स्थिति समझने और भविष्य के खतरे का आकलन करना जरूरी है.
GLOF क्या है क्यों इतना खतरनाक?
GLOF का पूरा नाम ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड है. इसका मतलब ग्लेशियर झील का अचानक फट जाना या उसका पानी तेजी से बाहर निकल जाना. आसान भाषा में समझें, तो पहाड़ के ऊपर पानी का एक बड़ा जलाशय बना होता है उसे रोकने के लिए कोई मजबूत कंक्रीट की दीवार नहीं, बल्कि मिट्टी, बर्फ, पत्थर और मलबे से बना प्राकृतिक बांध है. अगर यह बांध कमजोर पड़ गया और अचानक टूट गया तो झील का पानी कुछ ही समय में नीचे की ओर तेजी से दौड़ सकता है. इस पानी की ताकत अपने साथ बड़े-बड़े पत्थर, बोल्डर, मलबा और पेड़ों तक को बहाकर ले जाने की होती है.
उत्तराखंड में कितनी ग्लेशियर झीलें हैं?
अब बात उत्तराखंड की करते हैं. उत्तराखंड में करीब 450 ग्लेशियर झीलें हैं. इनमें से 13 झीलों को संवेदनशीलता के आधार पर A, B और C कैटेगरी में रखा गया है. इनमें A कैटेगरी को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है. इसमें पांच प्रमुख झीलें शामिल हैं.
A कैटेगरी की प्रमुख ग्लेशियर झीलें
1. वसुधारा झील: चमोली जिले में मौजूद वसुधारा झील को संवेदनशील झीलों में शामिल किया गया है.
2. मांबाग झील: पिथौरागढ़ के धारचूला क्षेत्र की मांबाग झील भी A कैटेगरी में है.
3. स्यूंतियानकित्त झील: धारचूला क्षेत्र की यह झील भी संवेदनशील झीलों की सूची में शामिल है.
4. प्यूंगरू झील: पिथौरागढ़ जिले की एक और ग्लेशियर झील प्यूंगरू को A कैटेगरी में रखा गया है.
5. अनाम झील: चमोली के जोशीमठ क्षेत्र की अनाम ग्लेशियर झील भी बेहद संवेदनशील झीलों में शामिल है.
इन पांच झीलों पर खास नजर इसलिए जरूरी है क्योंकि इनके आसपास की भौगोलिक परिस्थितियां और झीलों की स्थिति भविष्य में खतरे की संभावना को प्रभावित कर सकती हैं.
B कैटेगरी में कौन सी झीलें?
इसके बाद B कैटेगरी आती है. इसे अपेक्षाकृत कम, लेकिन फिर भी संवेदनशील श्रेणी माना गया है. इसमें प्रमुख रूप से दो झीलों को शामिल किया गया है.
1. सरस्वती ताल: ये ताल चमोली जिले में स्थित है.
2. केदारताल: यह उत्तरकाशी जिले में स्थित है.
इन झीलों की भी लगातार निगरानी जरूरी है, क्योंकि ग्लेशियर क्षेत्र स्थिर नहीं होते. मौसम, तापमान, बर्फ पिघलने और आसपास की भौगोलिक परिस्थितियों में बदलाव से झीलों की स्थिति बदल सकती है.
C कैटेगरी में क्या है?
C कैटेगरी में उन ग्लेशियर झीलों को रखा गया है, जिन्हें फिलहाल अपेक्षाकृत कम संवेदनशील माना गया है. इनमें टिहरी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर क्षेत्रों की कुछ ग्लेशियर झीलें शामिल हैं. हालांकि, कम संवेदनशील का मतलब यह नहीं है कि इन झीलों से कभी खतरा नहीं हो सकता. पहाड़ों में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं। इसलिए वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है.
विशेषज्ञ क्यों चिंतित हैं?
भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत ने बताया कि उत्तराखंड में 13 में से 5 ग्लेशियर लेक बेहद संवेदनशील हैं. इनके अध्ययन के लिए लगातार कार्य किया जा रहा है. इन पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना बेहद जरूरी है जिसके लिए पिछले कई सालों से प्रयास चल रहे हैं. वहीं, वाडिया के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत का कहना है कि इस तरह की ग्लेशियर लेख अगर आउटबर्स्ट होती है तो बहुत बड़ी परेशानी निचले इलाकों में हो सकती है.
8 सितंबर से भेजी जाएगी टीम
ग्लेशियर लेके आउटबर्स्ट फ्लड को लेकर उत्तराखंड का आपदा प्रबंधन विभाग भी काफी गंभीर है. उत्तराखंड स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के सीईओ और सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने इस मामले में जानकारी दी है कि 8 सितंबर से 13 में से दो संवेदनशील जिलों के अध्ययन के लिए एक्सपर्ट की टीम भेजी जाएगी.
अर्ली वार्निंग सिस्टम के लिए विशेष पैकेज
उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन का कहना है कि ग्लेशियर में अर्ली वार्निंग सिस्टम के लिए NDMA से स्पेशल पैकेज भी दिया गया है, इसके जरिए इस तरह की झील की मॉनिटरिंग के लिए अत्याधुनिक संसाधन भी इंस्टॉल करने पर कार्य किया जा रहा है. बहुत ज्यादा ऊंचाई और तापमान इस तरह की तकनीक के लिए हालांकि एक बड़ी चुनौती हैं.
ग्राउंड जीरो पर जाएंगे विशेषज्ञ
उन्होंने बताया कि ग्लेशियर लेक के अध्ययन के लिए वाडिया संस्थान, बीरबल साहनी संस्थान, CWC, सीडेक, और कई अन्य संस्थाओं के विशेषज्ञ इन खतरनाक ग्लेशियर लेक के अध्ययन के लिए ग्राउंड जीरो पर जाएंगे और भविष्य के खतरे को लेकर भी इस पर कार्य किया जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे महत्वपूर्ण चीज सिर्फ खतरे की पहचान करना नहीं, बल्कि खतरे की जानकारी समय रहते लोगों तक पहुंचाना है.
खतरा टाला जा सकता है
ग्लेशियर झीलों का खतरा पूरी तरह खत्म करना शायद संभव न हो, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, नियमित अध्ययन और मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए इसके असर को काफी कम किया जा सकता है. सबसे जरूरी है कि संवेदनशील झीलों की स्थिति को सिर्फ कागजों तक सीमित न रखा जाए. समय-समय पर उनकी जांच हो, आंकड़े जुटाए जाएं और नीचे रहने वाले लोगों तक चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत हो.