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1903 में पहाड़ पर हुआ था कुछ ऐसा, जिसने आने वाले वर्षों की कहानी ही बदल दी

Uttarakhand: देवभूमि उत्तराखंड सिर्फ अपने पावन धामों और बर्फीली वादियों के लिए ही नहीं, बल्कि दुर्लभ औषधीय पौधों के खजाने के लिए भी जाना जाता है. बहुत कम लोग जानते हैं कि 1903 में अल्मोड़ा के चौबटिया उद्यान से यहां पहली बार 'बेलाडोना' नाम की जड़ी-बूटी की व्यावसायिक खेती शुरू की गई थी.

1903 में पहाड़ पर हुआ था कुछ ऐसा, जिसने आने वाले वर्षों की कहानी ही बदल दी
Image Credit: Uttarakhand First Medicinal Herb Belladonna

Uttarakhand First Medicinal Herb Belladonna: हिमालय की गोद में बसा उत्तराखंड, जिसे दुनिया 'देवभूमि' के नाम से जानती है, अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा और अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है. बद्रीनाथ-केदारनाथ के पावन धाम, हरिद्वार-ऋषिकेश के आध्यात्मिक तट, जिम कॉर्बेट का वन्य जीवन और 'वैली ऑफ फ्लावर्स' की खूबसूरती इसे पर्यटन और शांति का अनूठा संगम बनाती हैं.

लेकिन देवभूमि का एक और समृद्ध पहलू है यहां की आबोहवा में पनपने वाली दुर्लभ और बहुमूल्य जड़ी-बूटियां. प्राचीन काल से ही यह क्षेत्र आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा का गढ़ रहा है. ऐसे में क्या आप जानते हैं कि आधुनिक और व्यवस्थित तरीके से उत्तराखंड की धरती पर सबसे पहले किस जड़ी-बूटी की व्यावसायिक खेती शुरू की गई थी?

देवभूमि की पहली व्यावसायिक जड़ी-बूटी
उत्तराखंड में सबसे पहले जिस जड़ी-बूटी की व्यवस्थित खेती शुरू की गई, उसका नाम है बेलाडोना (Atropa belladonna). इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत 120 साल से भी पहले 1903 में हुई थी. कुमाऊं क्षेत्र के अल्मोड़ा जिले में स्थित चौबटिया के सरकारी उद्यान से पहली बार बेलाडोना के पौधे रोपे गए थे. यहां की मध्यम ऊंचाई वाली ठंडी जलवायु और समृद्ध मिट्टी इस विदेशी पौधे को रास आ गई, जिसके बाद इसे व्यावसायिक रूप से बढ़ावा दिया गया.

यूरोपीय पौधे का उत्तराखंड बना नया ठिकाना
बेलाडोना मूल रूप से यूरोप और मध्य एशिया के ठंडे और पहाड़ी इलाकों का पौधा है. हालांकि, उत्तराखंड के अनुकूल मौसम और हिमालयी पारिस्थितिकी के कारण यह यहां न केवल प्राकृतिक रूप से उगने लगा, बल्कि इसकी पैदावार भी बेहतरीन साबित हुई. चिकित्सा विज्ञान में बेलाडोना का बहुत अधिक महत्व है.

कौन सा है उपयोगी भाग?
इस पौधे का मुख्य उपयोग एट्रोपिन (Atropine) जैसे महत्वपूर्ण अल्कलॉइड प्राप्त करने के लिए किया जाता है, जो दर्द निवारक, आंखों की जांच और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी कई आधुनिक दवाओं को बनाने में काम आता है. बेलाडोना की सूखी पत्तियों, टहनियों और परिपक्व जड़ों से औषधीय तत्व निकाले जाते हैं.

कैसे होती है बेलाडोना की खेती?
बेलाडोना की खेती में धैर्य और देखभाल की काफी जरूरत होती है. इसकी बुवाई आमतौर पर मार्च-अप्रैल या अक्टूबर-नवंबर के दौरान की जाती है. यह पौधा ऐसी मिट्टी में सबसे अच्छी वृद्धि करता है, जहां पानी का निकास (Drainage) बेहतर हो. इसे अत्यधिक भीषण ठिठुरन वाली सर्दियों से बचाना पड़ता है. पत्तियों और टहनियों की कटाई समय-समय पर की जाती है, जबकि पौधे की जड़ों को रोपण के लगभग 3 साल बाद काटकर निकाला जाता है, क्योंकि तब तक उसमें औषधीय गुणों की सांद्रता सबसे ज्यादा होती है.

उत्तराखंड सिर्फ अपने धार्मिक स्थलों और पहाड़ियों के लिए ही नहीं, बल्कि भारत में औषधीय पौधों की खेती का आधार बनने के लिए भी जाना जाता है. 1903 में चौबटिया से शुरू हुई बेलाडोना की यह कहानी आज भी राज्य के समृद्ध जड़ी-बूटी इतिहास की गवाही देती है.

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About the Author

Pooja

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पूजा सिंह एक डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें न्यूज़ मीडिया में 5 सालों से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीतिक हलचलों, क्राइम और स्थानीय (हाइपरलोकल) मुद्दों की सटीक व रियल-टाइम डिजिटल कवरेज पर उनकी मजबूत पकड़ है.माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद पूजा ने अपने करियर की शुरुआत ETV भारत से की थी. ज़ी मीडिया से पहले उन्होंने Inshorts और नवभारत जैसे प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में काम करते हुए डिजिटल जर्नलिज्म, कंटेंट क्यूरेशन और न्यूज़ डेस्क ऑपरेशंस का अनुभव हासिल किया. वे खबरों की प्रामाणिकता और ग्राउंड रियलिटी को प्राथमिकता देती हैं, ताकि पाठकों तक हर जरूरी अपडेट तेजी से पहुंचे.पूजा सिंह से आप Pooja1.Singh@India.com पर ईमेल के माध्यम से सीधे संपर्क कर सकते हैं.
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