'पुरानी अखबारी कटिंग बनी BJP का हथियार'... मुजफ्फरनगर दंगों पर अखिलेश के खिलाफ फिर गरम हुई यूपी की सियासत
BJP attacks Akhilesh Yadav over Muzaffarnagar riots: मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर बीजेपी ने अखिलेश यादव पर बड़ा हमला बोला है.योगी सरकार के 20 मंत्रियों और 100 से अधिक विधायकों ने उस दौर की पुरानी अखबारी खबरों को सोशल मीडिया पर साझा कर सपा की तत्कालीन सरकार और उसकी प्रशासनिक विफलताओं को घेरा.
Muzaffarnagar News : उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र एक बार फिर बाहर निकल आया है. भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इस राजनीतिक हमले की खास बात यह है कि बीजेपी नेताओं ने इस बार पुराने बयानों के बजाय उस दौर की अखबारों में छपी खबरों की कटिंग का सहारा लिया है. बीजेपी के दिग्गज नेताओं, मंत्रियों और विधायकों ने सोशल मीडिया के जरिए 2013 के दंगों से जुड़ी पुरानी खबरों को साझा करते हुए अखिलेश यादव की तत्कालीन सरकार पर प्रशासनिक नाकामी और तुष्टीकरण की राजनीति के गंभीर आरोप लगाए हैं.
बीजेपी नेताओं का हमला
इस बड़े राजनीतिक हमले की कमान उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों ने संभाली. परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, नगर विकास मंत्री जयवीर सिंह और समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण समेत योगी सरकार के लगभग 20 मंत्रियों ने एक साथ मुजफ्फरनगर दंगों की खबरों के क्लिप्स एक्स पर शेयर किए. इन मंत्रियों ने अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके शासनकाल में राज्य की कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी और दंगे के दौरान सरकार मूकदर्शक बनी रही. मंत्रियों का कहना था कि तत्कालीन सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही बरती, जिसके कारण हालात बिगड़े.
विधायकों ने घेरा, अखिलेश से पूछे सवाल
मंत्रियों के साथ-साथ बीजेपी के 100 से अधिक विधायकों ने भी सोशल मीडिया अभियानों में हिस्सा लिया. विधायकों ने अपने-अपने हैंडल से उस दौर के प्रमुख समाचार पत्रों के मुख्य पन्नों को साझा किया, जिनमें दंगों की विभीषिका, पुलिस की लाचारी और सरकारी फैसलों पर सवाल उठाए गए थे. बीजेपी नेताओं ने एक ही सुर में सवाल उठाया कि जब मुजफ्फरनगर जल रहा था, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनकी सरकार के अन्य प्रभावशाली नेता क्या कर रहे थे? बीजेपी का आरोप है कि सपा शासन में दंगाइयों को संरक्षण दिया गया, जिसके चलते पश्चिमी यूपी लंबे समय तक सांप्रदायिक तनाव में झुलसता रहा.
पुरानी खबरों से सपा की घेराबंदी
इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी रणनीति पुरानी अखबारी खबरों को हथियार बनाना रही. बीजेपी ने उस समय के राष्ट्रीय और स्थानीय समाचार पत्रों की उन रिपोर्टों को सामने रखा, जिनमें दंगों के दौरान हुई जनहानि, पलायन और प्रशासनिक विफलताओं का ब्योरा दिया गया था. बीजेपी का तर्क है कि ये खबरें कोई काल्पनिक आरोप नहीं हैं, बल्कि उस समय के कड़वे सच का दस्तावेज हैं. इन खबरों के जरिए बीजेपी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि समाजवादी पार्टी के शासन में प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था की क्या स्थिति थी और जनता को किन हालातों का सामना करना पड़ा था.
राजनीतिक गरमाहट और सियासी मायने
मुजफ्फरनगर दंगों का मुद्दा दोबारा गर्म होने से उत्तर प्रदेश का राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमा गया है. आगामी चुनाव और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए बीजेपी का यह कदम बेहद अहम माना जा रहा है. बीजेपी का मकसद जनता के बीच अखिलेश यादव की पुरानी सरकार की छवि को याद दिलाना है. इस चौतरफा हमले से समाजवादी पार्टी पर दबाव साफ नजर आ रहा है. यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा इस जोरदार सियासी हमले का जवाब किस तरह देती है, लेकिन फिलहाल मुजफ्फरनगर दंगों का मुद्दा एक बार फिर यूपी की राजनीति के केंद्र में आ चुका है.
क्या था 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा ?
मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में सितंबर 2013 में हुई हिंसा की गिनती यूपी में सबसे गंभीर सांप्रदायिक तनाव वाली घटनाओं में होती है. इस दंगे में सरकारी और सार्वजनिक रिकॉर्ड के मुताबिक 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी. इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में जाना पड़ा था. हिंसा पर नियंत्रण के लिए सेना की मदद भी ली गई थी.