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यूपी विधानसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आ रहा है सियासी सरगर्मियां तेज हो रही हैं. राज्य में 19 फीसदी मुस्लिम वोटर है. यह संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है. यूपी में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में इनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व समय-समय पर बदलता रहा है. आइए जानते हैं यूपी में मुस्लिम राजनीति का फ्लैशबैक? इस बार 2027 चुनाव में क्या बदलेगा सियासी गणित?
यूपी विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के लिहाज से साल 2012 का चुनाव काफी अहम था. उस चुनाव में करीब 68-69 मुस्लिम उम्मीदवार विधायक चुने गए थे. 2012 के चुनाव पर नजर डाले तो सपा ने 403 सीटों में से 224 पर जीत दर्ज की थी. उस समय मुस्लिम विधायकों की हिस्सेदारी 17 फीसदी पहुंच गई थी. हालांकि, 5 साल बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई.
2017 में बीजेपी की पहली बार यूपी में सरकार बनती है. इस चुनाव में बीजेपी को प्रचंड जीत मिलती है. 403 में से 312 विधायक चुने जाते हैं. इनमें मुस्लिम विधायकों की संख्या 24 से 25 थी. हालांकि, बीजेपी से एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना गया. विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व में इस गिरावट को किसी एक वजह से जोड़ना सही नहीं होगा. उम्मीदवारों का चयन, क्षेत्रवार चुनावी मुकाबला, वोटों का बंटवारा और पार्टियों का प्रदर्शन आदि इसके पीछे के कारण हो सकते हैं.
2017 के 5 साल बाद 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में सुधार देखने को मिला. इस चुनाव में मुस्लिम प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ा. 2022 के चुनाव में राज्य से 34 मुस्लिम विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे. ये सभी विधायक सपा गठबंधन से चुनाव जीते थे. सिर्फ समाजवादी पार्टी के 31 विधायक थे, राष्ट्रीय लोकदल से 2 और सुभासपा से एक विधायक जीते थे.
2027 के विधानसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दलों की रणनीति और उम्मीदवारों के चयन का मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर क्या असर पड़ता है. खासकर समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के सामने उम्मीदवारों के चयन को लेकर अलग-अलग राजनीतिक समीकरण होंगे.
लोकसभा चुनाव नतीजों पर डालें नजर
2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी लोकसभा नहीं पहुंचा. यूपी में लोकसभा की 80 सीटें हैं. इनमें से बीजेपी गठबंधन के खाते में 73 सीटें गई थीं. आजादी के बाद यह पहला लोकसभा चुनाव था जब यूपी से कोई भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनकर लोकसभा नहीं पहुंचा. यहां ये जान लेना जरूरी है कि चुनाव में किसी समुदाय के उम्मीदवारों की जीत या हार केवल उसकी आबादी के अनुपात से तय नहीं होती. सीटों पर उम्मीदवारों की संख्या, राजनीतिक दलों की रणनीति, गठबंधन और स्थानीय समीकरण भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

यूपी में 2018 में उपचुनाव हुए. कैराना लोकसभा सीट से रालोद की तबस्सुम हसन सांसद चुनी गईं. इसके बाद यूपी से लोकसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व की वापसी हुई. एक साल बाद यूपी में फिर से आम चुनाव हुए. 2019 के लोकसभा चुनाव में 6 मुस्लिम सांसद चुने गए. इनमें 3 समाजवादी पार्टी और 3 बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर जीते थे.
2024 के लोकसभा चुनाव में भी यूपी से 5 मुस्लिम सांसद चुने गए. इनमें कांग्रेस के इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी के इकरा हसन, जियाउर्रहमान बर्क, अफजाल अंसारी और मोहिबुल्लाह नदवी शामिल हैं. यह आंकड़े बताते हैं कि अलग-अलग चुनावों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व की स्थिति बदलती रही है.

यहां गौर करने वाली बात है कि मुस्लिम वोटर का किसी पार्टी को समर्थन देना और मुस्लिम उम्मीदवारों का विधानसभा या लोकसभा पहुंचना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. किसी सीट पर मुस्लिम वोटरों की संख्या अधिक होने के बावजूद वहां से मुस्लिम उम्मीदवार की जीत जरूरी नहीं है. इसी तरह मुस्लिम आबादी कम होने वाली सीटों पर भी किसी मुस्लिम उम्मीदवार को दूसरे समुदायों का समर्थन मिलने पर जीत हासिल हो सकती है.