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आंध्र प्रदेश और ओडिशा के सीमावर्ती गांवों में सालों से चला आ रहा सीमा विवाद एक बार फिर से गर्मा गया है. विवादित कोटिया पंचायत क्षेत्र में स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई, जब ओडिशा के अधिकारियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों का एक दल वहां के स्थानीय गांवों में पहुंचा. ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं और युवाओं ने इस दौरे का कड़ा विरोध करते हुए अधिकारियों की गाड़ियों को घेर लिया और जोरदार नारेबाजी की.
ग्रामीणों के विरोध के दौरान एक मुख्य बात जो सामने आई, वह थी भाषा को लेकर उनका सख्त रुख. ओडिशा के कोरापुट जिले के सब-कलेक्टर और तीन प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के गांव में दाखिल होते ही स्थानीय महिलाओं ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया. ग्रामीणों ने अधिकारियों से दो-टूक शब्दों में कहा, 'हम ओडिया भाषा नहीं जानते हैं, हमसे केवल तेलुगु में बात कीजिए. आप चाहें कोई भी हों या किसी भी पद पर हों, अगर हमारे गांव में आएंगे तो आपको तेलुगु में ही बोलना होगा.' ग्रामीणों का यह रुख साफ दर्शाता है कि वे अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को आंध्र प्रदेश से जुड़ा हुआ मानते हैं.
गांवों में बढ़ते तनाव को देखते हुए आंध्र प्रदेश और ओडिशा, दोनों राज्यों द्वारा भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है. हालांकि, इस पुलिस तैनाती से ग्रामीणों का गुस्सा और बढ़ गया. प्रदर्शनकारी ग्रामीणों और महिलाओं ने गांव में दोनों राज्यों के पुलिस कर्मियों की मौजूदगी पर कड़ा एतराज जताया. उन्होंने साफ तौर पर मांग उठाई कि दोनों राज्यों की पुलिस तुरंत प्रभाव से उनके गांवों से बाहर निकले और उन्हें शांति से रहने दे.
आंध्र प्रदेश के प्रति अपना समर्थन जताते हुए स्थानीय महिलाओं ने राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही जन-कल्याणकारी योजनाओं का जिक्र किया. महिलाओं का कहना था कि उन्हें आंध्र प्रदेश सरकार से बेहतर सुविधाएं और आर्थिक सहायता मिल रही है. उन्होंने बताया कि आंध्र सरकार की 'तल्लीकी वंदनम' योजना के तहत बच्चों की शिक्षा के लिए ₹52,000 की राशि मिल रही है. इसके अलावा, उन्हें 'रैथु भरोसा' का लाभ और ₹4,000 की मासिक सामाजिक सुरक्षा पेंशन नियमित रूप से प्राप्त हो रही है. यही कारण है कि वहां के निवासी आंध्र प्रदेश प्रशासन के साथ रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं.
दो राज्यों के बीच जारी खींचतान से परेशान होकर स्थानीय लोगों ने एक अनोखा विरोध प्रदर्शन किया. अपनी पहचान और आंध्र प्रदेश से जुड़ाव साबित करने के लिए ग्रामीणों ने अपने आधार कार्ड, राशन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड और बैंक पासबुक सड़क पर बिछा दिए. ग्रामीणों का कहना था कि दो राज्यों की राजनीति और आपसी विवाद के कारण वे सालों से पिस रहे हैं और मानसिक तनाव झेल रहे हैं. वे बुनियादी सुविधाओं और शांतिपूर्ण जीवन की आस में लगातार संघर्ष कर रहे हैं.
जब ओडिशा के नेताओं और प्रतिनिधियों का काफिला गांव के अंदर पहुंचा, तो स्थानीय युवाओं ने उनकी गाड़ियों के आगे आकर रास्ता रोक दिया. इस दौरान ओडिशा के नेताओं, स्थानीय नेताओं और ग्रामीणों के बीच काफी देर तक तीखी बहसबाजी होती रही. स्थिति को संभालना अधिकारियों के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया.
आंध्र-ओडिशा सीमा पर रहने वाले आदिवासियों और ग्रामीणों की मांग बहुत स्पष्ट है, वे अपने गांवों को आंध्र प्रदेश का हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने दोनों राज्यों के शीर्ष अधिकारियों और सरकारों से अपील की है कि वे आपसी टकराव और विवाद को छोड़कर इस मसले का कोई ठोस और स्थायी समाधान निकालें, ताकि सीमावर्ती इलाकों में शांति और सौहार्द वापस लौट सके.