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वाराणसी: काशी में धनतेरस का सबसे बड़ा आकर्षण इस बार भी सुड़िया का धन्वंतरि मंदिर रहने वाला है.इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि ये साल में 364 दिन बंद रहता है. इसके दरवाजे सिर्फ धनतेरस वाले दिन खुलते हैं, वो भी कुछ घंटों के लिए।शाम को खुलता है, रात को बंद हो जाता है. धनतेरस की शाम को जैसे ही मंदिर के पट खुलते हैं, बाहर भक्तों की लंबी लाइन लग जाती है. शाम 5 बजे के आसपास से शुरू हुआ दर्शन का सिलसिला रात 10 बजे तक चलता है.इसके बाद कपाट फिर बंद कर दिए जाते हैं. अगले दर्शन के लिए फिर एक साल इंतजार करना पड़ता है.
बताया जाता है कि काशी के एक वैद्य परिवार ने तीन सौ साल से भी पहले धनतेरस पर धन्वंतरि जयंती मनाना शुरू किया था. उस समय से लेकर आज तक उसी परिवार की अगली पीढ़ियां इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं. आज भी उसी परिवार के लोग पूजा-पाठ का पूरा जिम्मा संभालते हैं.
मंदिर के अंदर भगवान धन्वंतरि की छोटी सी लेकिन बेहद खूबसूरत मूर्ति रखी है. ये मूर्ति अष्टधातु से बनी है और इस पर रत्न जड़े हैं. भगवान के हाथों में अमृत से भरा कलश, शंख, चक्र और औषधि दिखाई देती है. बगल में सेविकाएं खड़ी हैं. भक्त कहते हैं कि मूर्ति को देखकर ऐसा लगता है जैसे बैकुंठ में आ गए हों.
धनतेरस के दिन इस मंदिर में सोने-चांदी से ज्यादा जड़ी-बूटियों की पूजा होती है. हिमालय की तरफ से लाई गई दुर्लभ जड़ी-बूटियां, फूल और पौधे भगवान को चढ़ाए जाते हैं.इसी को भक्त आरोग्य का प्रसाद मानते हैं.
लोगों का मानना है कि धनतेरस पर यहां दर्शन कर लेने से सालभर बीमारियों से बचाव होता है. जो लोग लंबे समय से बीमार हैं, वो यहां खासतौर पर मन्नत मांगने आते हैं. कई लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर जड़ी-बूटी चढ़ाकर जाते हैं.
पौराणिक मान्यता के मुताबिक, समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने ही धन्वंतरि के रूप में अवतार लिया था. वो अपने साथ अमृत का कलश लेकर आए थे. इसी दिन को धनतेरस के रूप में मनाया जाता है. आयुर्वेद की शुरुआत भी उन्हीं से मानी जाती है. काशी से उनका पुराना रिश्ता बताया जाता है.
धन्वंतरि कूप, महामृत्युंजय मंदिर – दारानगर, वाराणसी
धन्वंतरी मंदिर – सिधौली क्षेत्र, सीतापुर
सर्वदेव धन्वंतरी मंदिर – बख्शी का तालाब, लखनऊ
श्री धन्वंतरी मंदिर – छोटी बाजार, बांदा