विंध्यधाम में उमड़ा आस्था का जनसैलाब: नवरात्रि के 5वें दिन मां स्कंदमाता के दर्शन को लगीं लंबी कतारें
Skandamata Puja Navratri 5th Day: नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है. मान्यता है कि मां स्कंदमाता अपने भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं. मीरजापुर के विंध्याचल धाम में विराजमान मां विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं.
मीरजापुर/राजेश मिश्र: मां विंध्यवासिनी की पावन धरा और सिद्धपीठ विंध्याचल में नवरात्रि उत्सव की धूम मची हुई है. शारदीय नवरात्रि की पंचमी तिथि पर भगवती के पांचवें स्वरूप माँ स्कंदमाता का पूजन-अर्चन पूरे विधि-विधान के साथ किया जा रहा है. तड़के मंगला आरती के बाद से ही विंध्य पर्वत और मोक्षदायिनी पतित पावनी गंगा के संगम तट पर स्थित मंदिर परिसर भक्तों के जयकारों से गुंजायमान है.
मां दुर्गा के पांचवा स्वरूप स्कंदमाता
मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप का नाम स्कंदमाता है. नवरात्रि की पंचमी तिथि को स्कंदमाता की पूजा की जाती है. इनकी चार भुजाएं हैं, दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा में भगवान स्कंद गोद में हैं. दाहिने तरफ की नीची वाली भुजा में कमलपुष्प है. बाएं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा तथा नीचे वाली भुजा में भी कमलपुष्प है. स्कंदमाता भक्तों को सुख- शांति प्रदान वाली है. देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कंद की माता होने के कारण मां दुर्गा के पांचवे स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जानते हैं. नवरात्रि की पंचमी तिथि को साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिए जिससे कि ध्यान वृत्ति एकाग्र हो सके. यह शक्ति परम शांति व सुख का अनुभव कराती है. मां स्कंदमाता की उपासना से मन की सारी कुण्ठा जीवन-कलह और द्वेष भाव समाप्त हो जाता है. मृत्यु लोक में ही स्वर्ग की भांति परम शांति एवं सुख का अनुभव प्राप्त होता है. साधना के पूर्ण होने पर मोक्ष का मार्ग स्वत: ही खुल जाता है.
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आदिकाल से आस्था का केंद्र रहे विन्ध्याचल में विन्ध्य पर्वत व पतित पावनी मां भागीरथी के संगम तट पर श्रीयंत्र पर विराजमान माँ विंध्यवासिनी का पांचवे दिन "स्कंदमाता" के रूप में पूजन व अर्चन किया जाता है. भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण इस पांचवें स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है. यह कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है. इनका वाहन भी सिंह है. इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है. यह दोनों हाथों में कमल दल लिए हुए और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रह्मस्वरूप सनत कुमार को थामे हुए हैं. स्कंद माता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्म रूप छह सिर वाली देवी का है. नवरात्र की पंचमी तिथि को साधक का मन विशुद्ध चक्र में होता है जो माँ की कृपा से जागृत हो जाता है.
विशुद्ध चक्र और मोक्ष का मार्ग
विद्वान पुरोहितों के अनुसार, नवरात्रि की पंचमी तिथि को साधक का ध्यान 'विशुद्ध चक्र' में केंद्रित होता है. मां स्कंदमाता की सच्चे मन से उपासना करने से साधक के जीवन के सभी द्वेष, कलह और मन की कुंठाएं समाप्त हो जाती हैं. माँ की कृपा से साधक को मृत्युलोक में ही स्वर्ग जैसी परम शांति और सुख का अहसास होता है, और अंततः मोक्ष का मार्ग स्वतः ही खुल जाता है. पं० राजन मिश्र के अनुसार सिद्धपीठ में देश के कोने-कोने से आने वाले भक्त माँ का दर्शन करने के लिए लम्बी लम्बी कतारों में लगे रहते हैं. भक्तों की आस्था से प्रसन्न होकर माँ उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर देती है.
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