UP Navratri Special: नवरात्रि में देशभर के देवी मंदिरों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है. कहीं मां की भव्य प्रतिमा के दर्शन होते हैं, तो कहीं प्राचीन परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है. लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक ऐसा देवी मंदिर है, जिसकी पहचान ही यहां की अनोखी पूजा-पद्धति है. यहां गर्भगृह में देवी की पारंपरिक मूर्ति की नहीं पालने की पूजा की जाती है. यह मंदिर मां अलोपशंकरी के नाम से प्रसिद्ध है और अलोपीबाग इलाके में स्थित है. मंदिर की यह परंपरा श्रद्धालुओं के मन में कई सवाल पैदा करती है. आखिर यहां देवी की प्रतिमा क्यों नहीं है? पालने को मां का स्वरूप मानकर पूजा करने के पीछे क्या मान्यता है? और मंदिर का नाम अलोपशंकरी कैसे पड़ा? नवरात्रि के मौके पर इस अनोखे मंदिर की धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को समझते हैं।
जहां मूर्ति नहीं, पालने में मां के दर्शन करते हैं भक्त
आमतौर पर देवी मंदिरों में श्रद्धालु मां दुर्गा या उनके किसी अन्य स्वरूप की प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना करते हैं. लेकिन प्रयागराज के अलोपशंकरी मंदिर में पूजा का केंद्र एक पालना है. यही इस मंदिर को दूसरी जगहों से अलग पहचान देता है. मंदिर के गर्भगृह में स्थापित पालने को लाल चुनरी से सजाया जाता है. भक्त यहां पहुंचकर पूजा करते हैं, चुनरी और नारियल चढ़ाते हैं और मां से परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. उनके लिए पालना ही देवी की उपस्थिति और आस्था का प्रमुख प्रतीक है. इस मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी बनावट या पूजा की विधि नहीं है, बल्कि वह धार्मिक विश्वास भी है, जिसके कारण पीढ़ियों से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते रहे हैं।
मां अलोपशंकरी नाम कैसे पड़ा? क्या है पौराणिक मान्यता?
मंदिर के नाम के पीछे माता सती से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रचलित है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होने के बाद माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे. इसके बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे. ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे और वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजे जाने लगे.
अलोपशंकरी मंदिर को लेकर प्रचलित मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सती के हाथ का पंजा गिरा था और फिर अदृश्य हो गया. ‘अलोप’ शब्द का अर्थ लुप्त या अदृश्य होना है. इसी मान्यता से मंदिर का नाम अलोपशंकरी पड़ा माना जाता है.यहां ध्यान देने वाली बात है कि यह मंदिर से जुड़ी धार्मिक और पौराणिक मान्यता है. इसे किसी ऐतिहासिक घटना के प्रमाणित विवरण के बजाय श्रद्धालुओं की आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए.
क्या अलोपशंकरी मंदिर शक्तिपीठ है?
प्रयागराज का अलोपशंकरी मंदिर स्थानीय धार्मिक परंपरा में शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है. इसे लेकर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है और नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है.
प्रयागराज में मां अलोपशंकरी के अलावा मां ललिता देवी और मां कल्याणी देवी के मंदिर भी प्रमुख देवी धामों में गिने जाते हैं. इन मंदिरों की धार्मिक परंपराएं शहर की आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
नवरात्रि में यहां की परंपराएं
नवरात्रि के पावन पर्व पर इस शक्तिपीठ का महत्व और अधिक बढ़ जाता है.यहां देश के कोने-कोने से श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं. नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर परिसर को भव्य तरीके से सजाया जाता है और पालकी (डोली) का विशेष श्रृंगार किया जाता है. भक्त यहां आकर चुनरी चढ़ाते हैं, मत्था टेकते हैं और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद मांगते हैं. यह मंदिर सनातन संस्कृति और अध्यात्म का एक ऐसा अनूठा संगम है, जो भक्तों को भौतिकता से परे एक अलौकिक अहसास कराता है.मंदिर की पहचान किसी भव्य प्रतिमा से नहीं, बल्कि पालने की पूजा की परंपरा से जुड़ी है. यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए दर्शन का अनुभव सामान्य देवी मंदिरों से अलग होता है.
बच्चों के मुंडन की परंपरा भी है खास
मां अलोपशंकरी मंदिर से जुड़ी एक और प्रचलित परंपरा बच्चों के मुंडन संस्कार की है. कई परिवार बच्चों के जन्म के बाद यहां मुंडन कराने की मन्नत मानते हैं और निर्धारित समय पर मंदिर पहुंचकर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं.