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मेरठ / सरधना: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सरधना विधानसभा सीट सिर्फ एक सामान्य चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि सियासी दिग्गजों की प्रतिष्ठा का एक बड़ा रणक्षेत्र है. इतिहास के पन्नों में अपनी खास जगह रखने वाला यह शहर आज इस बात का गवाह है कि कैसे एक ही सीट पर दो धुरंधर आमने-सामने आकर चुनावी सरगर्मी को चरम पर पहुंचा देते हैं.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और बेगम समरू की विरासत
सरधना अपनी पारंपरिक शिल्पकारी, कपड़ा और लकड़ी उद्योग के लिए जाना जाता है. इतिहास के पन्नों को पलटें तो 18वीं सदी में यह इलाका प्रसिद्ध बेगम समरू की राजधानी रहा है, जिन्हें भारतीय इतिहास में एकमात्र कैथोलिक शासक के तौर पर याद किया जाता है. अपनी ऐतिहासिक इमारतों और सांस्कृतिक विरासत के लिए यह शहर हमेशा से सुर्खियों में रहा है.
चुनावी इतिहास: संगीत सोम से लेकर अतुल प्रधान तक:सरधना के राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो पिछले तीन चुनावों की तस्वीर बेहद दिलचस्प रही है.
2012 और 2017: इन दोनों चुनावों में बीजेपी के फायरब्रांड चेहरे संगीत सोम ने जीत दर्ज कर सरधना को पार्टी का मजबूत किला बना दिया था.2017 के चुनाव में संगीत सोम को 97,921 वोट मिले थे, जबकि समाजवादी पार्टी के अतुल प्रधान 76,296 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे.
2022 में बदला चुनावी समीकरण
2022 के विधानसभा चुनाव में सरधना का मुकाबला फिर संगीत सोम और अतुल प्रधान के बीच हुआ, लेकिन इस बार नतीजा बदल गया. समाजवादी पार्टी के अतुल प्रधान को 1,18,573 वोट मिले, जबकि बीजेपी के संगीत सोम को 1,00,373 वोट हासिल हुए। अतुल प्रधान ने 18,200 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. इस नतीजे ने सरधना की राजनीति में नया मोड़ ला दिया. लगातार दो चुनाव जीतने वाले संगीत सोम को हार का सामना करना पड़ा और अतुल प्रधान विधानसभा पहुंचे.
2027 के चुनाव पर टिकी हैं पश्चिमी यूपी की निगाहें
भले ही 2022 में सत्ता का पलड़ा समाजवादी पार्टी की तरफ झुक गया हो, लेकिन संगीत सोम भी इस सीट की सक्रिय राजनीति से बाहर नहीं हैं. यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि क्या एक बार फिर मुकाबला 'सोम बनाम प्रधान' होगा या कोई तीसरा चेहरा चुनावी समीकरण को नया मोड़ देगा.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की निगाहें इसी सीट पर टिकी हैं कि क्या आगामी चुनाव में एक बार फिर भगवा परचम लहराएगा या साइकिल अपनी रफ्तार बरकरार रखेगी.