काका हाथरसी: आज के 'मीम कल्चर' में भी दिखती है जिनकी परछाईं
सोचिए...कोई आपको हंसाए, आप ठहाका लगाएं और फिर अचानक वही हंसी आपको अपने आसपास की किसी कड़वी सच्चाई की याद दिला दे. काका हाथरसी का यही कमाल था.
आज जब सोशल मीडिया पर कुछ सेकेंड का वीडियो किसी गंभीर मुद्दे को भी हंसी-मजाक में बदल देता है. जब मीम और व्यंग्य समाज की बेचैनी को आवाज देने का जरिया बन चुके हैं, तब करीब एक सदी पहले के एक कवि को याद करना खासा दिलचस्प लगता है. वह कवि काका हाथरसी थे.
काका हाथरसी को याद करते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. उनकी कविताओं में हास्य था, शब्दों का खेल था और मंच पर ऐसा अंदाज था कि श्रोता ठहाके लगाने लगते थे.
लेकिन उनकी कविता की असली ताकत ठहाकों के खत्म होने के बाद सामने आती थी. जब हंसी थमती थी और कविता की बात मन में उतरती थी तो समाज की कोई न कोई सच्चाई उजागर हो जाती थी.
यही काका हाथरसी की सबसे बड़ी खूबी थी. उन्होंने लोगों को सिर्फ हंसाया नहीं बल्कि हंसते-हंसते उन्हें अपने आसपास की दुनिया देखने का एक नया नजरिया भी दिया.
साधारण नाम से असाधारण पहचान तक
काका हाथरसी का असली नाम प्रभुलाल गर्ग था. उनका जन्म 18 सितंबर 1906 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुआ था. साहित्य की दुनिया में उन्हें जो नाम मिला उसके पीछे भी एक रोचक कहानी है. अपनी आत्मकथा 'मेरा जीवन : ए-वन' में इस बात को उन्होंने साझा किया है.
दरअसल, एक नाटक में उन्होंने 'काका' नाम के एक सनकी किरदार की भूमिका निभाई थी. यह किरदार लोगों को खूब पसंद आया और 'काका' नाम उनके साथ इस तरह जुड़ा कि आगे चलकर यही उनकी पहचान बन गया.
हाथरस से जुड़ाव के कारण नाम के साथ 'हाथरसी' जुड़ा और प्रभुलाल गर्ग बन गए काका हाथरसी. नाम भले ही मजाकिया अंदाज वाला था लेकिन उनके लेखन के पीछे की दृष्टि बेहद गंभीर थी.
जब हंसी व्यवस्था पर सवाल बन जाती थी
काका हाथरसी की कविता की दुनिया बहुत दूर की दुनिया नहीं थी. उनके विषय हमारे आसपास से आते थे.
रोजमर्रा की जिंदगी, सरकारी दफ्तर, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, अनुशासनहीनता, भीड़, आम आदमी की परेशानियां और सामाजिक विसंगतियों को उन्होंने अपनी कविताओं में जगह दी.
यही कारण है कि उनकी कविताएं सुनते हुए श्रोता खुद को उनमें कहीं न कहीं खोज लेते थे. उनका तरीका सीधा था. वह किसी बड़ी समस्या पर भारी-भरकम भाषण नहीं देते थे.
वह उसी समस्या को हंसी के जरिए सामने रखते थे. पाठक या श्रोता पहले मुस्कुराता था, फिर हंसता था और कुछ देर बाद उसे एहसास होता था कि जिस बात पर वह हंस रहा था, उसमें उसकी अपनी जिंदगी की कोई सच्चाई छिपी हुई है.
आज की भाषा में कहें तो काका हाथरसी अपने समय के ऐसे व्यंग्यकार थे जो 'कॉमन मैन' की भाषा में सिस्टम की कमियां दिखाते थे.
उनकी भाषा में 'आम आदमी' क्यों दिखाई देता था?
काका हाथरसी की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उनकी भाषा थी. उन्होंने अपनी बात को इतना जटिल नहीं बनाया कि पाठक शब्दों में उलझ जाए.
उनकी शैली में बोलचाल की सहजता थी. शब्दों का इस्तेमाल इस तरह होता था कि बात सीधे श्रोता तक पहुंच जाए.
यही वजह है कि उनका व्यंग्य केवल साहित्यिक हलकों तक सीमित नहीं रहा. कवि सम्मेलनों में जब वह मंच पर आते थे तो लोगों को पहले से पता होता था कि अब कुछ ऐसा सुनने को मिलेगा जिसमें हंसी भी होगी और बात भी.
उनका हास्य किसी व्यक्ति विशेष का मजाक उड़ाने तक सीमित नहीं था. उसके पीछे समाज को देखने की दृष्टि थी.
लेकिन काका सिर्फ हास्य कवि नहीं थे. उनकी प्रतिभा का दायरा इससे कहीं बड़ा था.
उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत का भी गहरा ज्ञान था. 1932 में उन्होंने 'संगीत कार्यालय' की स्थापना की. यह संस्था भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य से जुड़ी पुस्तकों के प्रकाशन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हुई.
1935 में उन्होंने 'संगीत' नाम की मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया. संगीत पर उन्होंने 'वसंत' नाम से भी लेखन किया और इस क्षेत्र में कई पुस्तकें लिखीं.
काका हाथरसी के लंबे साहित्यिक सफर को देश ने भी सम्मान दिया. 1985 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया.
काका हाथरसी के जीवन से जुड़ा एक ऐसा संयोग भी है जिसे याद किया जाता है.
उनका जन्म 18 सितंबर 1906 को हुआ था और निधन 18 सितंबर 1995 को. यानी जिस तारीख को उनका जन्म हुआ, उसी तारीख को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा.
आज के दौर में काका हाथरसी को पढ़ना क्यों जरूरी है?
समय बदल गया है. माध्यम बदल गए हैं. कविता सुनने के लिए अब सिर्फ कवि सम्मेलन का मंच जरूरी नहीं. सोशल मीडिया, यूट्यूब, रील्स और मीम्स ने व्यंग्य को घर-घर पहुंचा दिया है.
लेकिन समाज की कई समस्याएं आज भी हमारे सामने हैं.
भ्रष्टाचार पर सवाल आज भी उठते हैं. सरकारी व्यवस्था को लेकर शिकायतें आज भी होती हैं. भीड़, ट्रैफिक, अनुशासन, दिखावा, राजनीति और रोजमर्रा की परेशानियां आज भी आम आदमी की बातचीत का हिस्सा हैं.
फर्क सिर्फ इतना है कि आज इन पर मीम बनते हैं, कार्टून बनते हैं और सोशल मीडिया पोस्ट वायरल होते हैं. काका हाथरसी के दौर में यही काम कविता और मंचीय व्यंग्य करते थे.
इस लिहाज से उनकी रचनाएं हमें यह समझने का मौका देती हैं कि हास्य केवल मनोरंजन नहीं है. हंसी कई बार असहमति व्यक्त करने का बेहद प्रभावी तरीका भी हो सकती है.
किसी समस्या पर गुस्सा पैदा करना आसान है लेकिन उसी समस्या पर लोगों को हंसाते हुए सोचने के लिए मजबूर करना कहीं अधिक कठिन काम है. काका हाथरसी ने यही किया.