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मुरादाबाद की अनोखी रामलीला! यहां रावण की अस्थियां नहीं लूटी जातीं, 3 दिन बाद होती है विधि-विधान से तेरहवीं और विसर्जन

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक ऐसी रामलीला भी होती है, जहां रावण दहन के बाद उसकी अस्थियों को सुरक्षित रखा जाता है.रावण दहन के 3 दिन बाद उसकी अस्थियों का विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है.

Edited ByPreeti Chauhan
Published: Oct 25, 2026, 06:48 AM IST|Updated: Oct 25, 2026, 06:57 AM IST
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मुरादाबाद की अनोखी रामलीला! यहां रावण की अस्थियां नहीं लूटी जातीं, 3 दिन बाद होती है विधि-विधान से तेरहवीं और विसर्जन
Image Credit: Ravana Asthi Visarjan Tehrvi News

About the Author

Preeti Chauhan

Preeti Chauhan

प्रीति चौहान जीन्यूज में पत्रकार हैं, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड डिजीटल टीम में  ब्रेकिंग, हाइपरलोकल, क्राइम, और अन्य मुद्दों को लेकर खबरें लिखती हैं. 
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आकाश शर्मा/मुरादाबाद: यूं तो देशभर में दशहरे के दिन रावण दहन के बाद लोगों में रावण की अस्थियां (प्रतीक) लूटने की होड़ सी मच जाती है. लोग इन्हें अपने घर ले जाने के लिए दौड़ पड़ते हैं. लेकिन, आज हम आपको एक ऐसी रामलीला के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां यह परंपरा पूरी तरह उलट है. यहां रावण की अस्थियां कोई नहीं लूटता, बल्कि उनके वध के 3 दिन बाद पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ उनका अस्थि विसर्जन और तेहरवी का कार्यक्रम संपन्न किया जाता है.

18 साल से चली आ रही है अनूठी परंपरा

हम बात तक रहे हैं यूपी के मुरादाबाद की. यहां काशीराम नगर में लगने वाली रामलीला में पिछले लगभग 18 सालों से यह अनूठी परंपरा चली आ रही है. यहां हाल ही में रावण दहन किया गया और अब इसके 3 दिन बाद हिंदू परंपरा के अनुसार विधि-विधान से अस्थि विसर्जन व अन्य रीति-रिवाज पूरे किए जा रहे हैं.  रामलीला समिति के सदस्यों और टीम के साथ बातचीत के दौरान यह बात सामने आई कि रावण दहन के बाद लोग उसकी अस्थियां उठाकर न भागें, इसके लिए विशेष प्रबंध किए जाते हैं.

क्यों की जाती है रावण की तेहरवी और विसर्जन?

समिति के सदस्यों के मुताबिक, रावण भले ही बुराई और अहंकार का प्रतीक था, लेकिन वह ऋषि विश्रवा के पुत्र और वेदों के प्रकांड विद्वान ब्राह्मण थे. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद जब तक अस्थि विसर्जन और तेहरवी जैसे संस्कार न हों, आत्मा को शांति नहीं मिलती है.

रावण को विद्वान ब्राह्मण मानकर निभाते हैं रस्में

कहीं भी रावण दहन के बाद इस तरह के विधान देखने को नहीं मिलते, लेकिन इस समिति का उद्देश्य लोगों को यह संदेश देना है कि हर विद्वान के प्रति शास्त्र सम्मत नियमों का ध्यान रखा जाना चाहिए.

दशहरे से पहले शुरू होती है रामलीला

काशीराम नगर की यह रामलीला दशहरे से दो दिन पहले शुरू होती है और चार दिन बाद यहां रावण दहन का भव्य आयोजन होता है. रामलीला समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि रावण ब्राह्मण कुल में जन्मे और विद्वान पुरुष थे. इसी मान्यता को ध्यान में रखते हुए काशीराम नगर में रावण की अस्थियों को रामगंगा नदी में ससम्मान विसर्जित किया जाता है. इसके बाद विद्वान पंडितों की देखरेख में तीजा व तेहरवीं कर गरीबों को भोजन कराया जाता है, ताकि धार्मिक और सांस्कृतिक विधान पूरी तरह पूरा हो सके और इसके साथ ही रामलीला के समापन की घोषणा होती है.

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