EXPLAINER: नौकरशाही से नेतागिरी तक... दिव्या मित्तल समेत यूपी के इन अफसरों ने क्यों चुनी सियासत?
Divya Mittal Announcement: आईएएस पद से इस्तीफा देकर सुर्खिंयों में आईं दिव्या मित्तल सियासी एंट्री करने जा रही हैं. दिव्या मित्तल पहले ऐसी नौकरशाह नहीं हैं जो प्रशासनिक सेवा छोड़कर जनसेवा को चुना है. इससे पहले भी कई अफसरों ने नौकरी छोड़कर सियासत में कदम रखा है...
Divya Mittal: 13 साल तक IAS रहीं दिव्या मित्तल के राजनीति में आने के ऐलान के बाद एक बार फिर यूपी में उन अफसरों की चर्चा हो रही है जिन्होंने सरकारी नौकरी के बाद सियासत का रास्ता चुना. कोई चुनाव लड़कर विधायक बना तो कोई राज्यसभा पहुंचा. ऐसे में सवाल है कि आखिर अफसर राजनीति में क्यों आते हैं और प्रशासनिक सेवा से राजनीति तक का यह सफर कितना अलग होता है?
दिव्या मित्तल ने चुनी राजनीति की राह
2013 बैच की IAS अधिकारी दिव्या मित्तल उत्तर प्रदेश कैडर की अधिकारी रही हैं. उन्होंने करीब 13 साल तक प्रशासनिक सेवा में काम किया. इस दौरान प्रदेश के कई जिलों में उनकी तैनाती रही. मीरजापुर की डीएम रहते हुए वह लहुरियादह गांव में पानी पहुंचाने की कोशिश को लेकर भी चर्चा में रहीं. गांव में लंबे समय से पानी की समस्या थी और लोगों को टैंकर पर निर्भर रहना पड़ता था. दिव्या मित्तल ने अगस्त 2026 में प्रशासनिक सेवा छोड़ने का फैसला किया. सितंबर में उनका इस्तीफा मंजूर हुआ. इसके बाद 29 सितंबर को वीडियो संदेश जारी कर उन्होंने राजनीति में आने का ऐलान किया. उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मभूमि बताया. साथ ही कहा कि वह लोगों के मुद्दों को उठाने के लिए राजनीति में आना चाहती हैं. खास बात यह है कि उन्होंने फिलहाल किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने की बात नहीं कही है. वह अपनी अलग राजनीतिक राह बनाने की बात कर रही हैं. अब वह चुनाव लड़ेंगी या किसी नए राजनीतिक मंच के जरिए आगे बढ़ेंगी. यह अभी साफ नहीं है. लेकिन उनके फैसले ने यूपी में अफसरों के राजनीति में आने की पुरानी कहानी को फिर चर्चा में ला दिया है.
असीम अरुण ने खाकी छोड़कर सियासत चुनी
यूपी में पुलिस सेवा से राजनीति में आने वाले अफसरों में असीम अरुण का नाम प्रमुख है. 1994 बैच के IPS अधिकारी असीम अरुण कानपुर के पुलिस कमिश्नर रह चुके हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने VRS लिया और बीजेपी में शामिल हो गए. पार्टी ने उन्हें कन्नौज सदर सीट से चुनाव मैदान में उतारा. वह चुनाव जीते और विधायक बने. इसके बाद योगी सरकार में मंत्री भी बनाए गए. यानी उनका सफर पुलिस की नौकरी से शुरू हुआ. फिर उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा और इसके बाद सरकार का हिस्सा बने.
राजेश्वर सिंह भी नौकरी छोड़कर चुनाव में उतरे
पूर्व ED अधिकारी राजेश्वर सिंह ने भी सरकारी सेवा छोड़कर राजनीति का रास्ता चुना. उन्होंने 2022 में VRS लिया और बीजेपी में शामिल हुए. पार्टी ने उन्हें लखनऊ की सरोजनीनगर सीट से चुनाव लड़ाया. राजेश्वर सिंह चुनाव जीते और विधायक बने. ED में रहते हुए वह आर्थिक अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों की जांच का हिस्सा रहे थे. नौकरी छोड़ने के बाद उनकी भूमिका बदल गई. अब वह विधायक के तौर पर अपने क्षेत्र के लोगों के मुद्दे विधानसभा में उठाते हैं. असीम अरुण और राजेश्वर सिंह के मामले में एक बात समान रही. दोनों ने सरकारी सेवा छोड़ने के बाद सीधे चुनावी राजनीति का रास्ता चुना.
बृजलाल और पीएल पुनिया का रास्ता अलग रहा
उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP बृजलाल और पूर्व IAS अधिकारी पीएल पुनिया ने भी सरकारी सेवा के बाद राजनीति का रुख किया. लेकिन दोनों का राजनीतिक सफर चुनावी राजनीति से थोड़ा अलग रहा. बृजलाल यूपी के DGP रह चुके हैं. पुलिस सेवा से रिटायर होने के बाद वह बीजेपी में शामिल हुए. इसके बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया. यानी पुलिस की नौकरी से निकलने के बाद उन्होंने सीधे संसदीय राजनीति का रास्ता चुना. पीएल पुनिया भी यूपी में प्रशासनिक पदों पर काम कर चुके हैं. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा. वह राज्यसभा और लोकसभा दोनों के सदस्य रहे. दोनों की राजनीतिक यात्रा बताती है कि सरकारी सेवा के बाद राजनीति में आने का सिर्फ एक रास्ता नहीं है. कोई विधानसभा चुनाव लड़ सकता है. कोई राज्यसभा या लोकसभा के जरिए संसद पहुंच सकता है. कोई पार्टी संगठन में काम कर सकता है.
अफसर राजनीति में क्यों आते हैं?
इसका कोई एक जवाब नहीं है. हर अधिकारी का फैसला अलग होता है. प्रशासनिक सेवा में रहते हुए अफसरों को सरकार की योजनाओं और व्यवस्था को करीब से देखने का मौका मिलता है. जिलों में तैनाती के दौरान वे लोगों की समस्याओं से भी सीधे रूबरू होते हैं. कुछ अफसरों को लगता है कि राजनीति में आने के बाद उन्हें फैसले लेने की प्रक्रिया में सीधे भूमिका मिल सकती है. जनता के मुद्दों को उठाने के लिए भी उन्हें एक अलग मंच मिलता है. हालांकि राजनीति में आने का मतलब सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं है. कोई पार्टी में शामिल होकर काम करता है. कोई विधान परिषद का रास्ता चुनता है. कोई राज्यसभा जाता है. और दिव्या मित्तल की तरह कोई फिलहाल किसी पार्टी में शामिल हुए बिना अपनी राह बनाने की कोशिश कर सकता है.
अफसर की नौकरी और राजनीति में कितना फर्क है?
दोनों जगह जनता से जुड़ाव जरूर है, लेकिन काम करने का तरीका काफी अलग है. एक प्रशासनिक अधिकारी सरकारी नियमों और नीतियों के तहत काम करता है. उसके सामने योजनाओं को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी होती है. कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में भी उसे तय व्यवस्था के तहत काम करना होता है. राजनीति में तस्वीर अलग होती है. यहां लोगों के बीच जाना पड़ता है. अपनी बात रखनी होती है. संगठन के साथ काम करना होता है. जनता का भरोसा हासिल करना होता है. चुनाव लड़ने वाले नेता के सामने वोट हासिल करने की चुनौती भी होती है. इसलिए प्रशासनिक अनुभव राजनीति में काम आ सकता है. लेकिन यह अपने आप में राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं है.
क्या अफसरों के लिए राजनीति आसान होती है?
सरकारी नौकरी में अफसर के पास एक तय जिम्मेदारी और पद होता है. राजनीति में ऐसा नहीं है. यहां अपनी जगह खुद बनानी पड़ती है. असीम अरुण और राजेश्वर सिंह ने चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी आगे बढ़ाई. बृजलाल और पीएल पुनिया संसद तक पहुंचे. दूसरी तरफ दिव्या मित्तल ने अभी किसी राजनीतिक दल का रास्ता नहीं चुना है. यानी हर अफसर के लिए राजनीति में आने का अनुभव अलग रहा है. प्रशासनिक सेवा में बनाई पहचान मदद जरूर कर सकती है. लेकिन राजनीति में आगे बढ़ने के लिए जनता के बीच लगातार काम करना भी जरूरी होता है.
क्या जन सेवा के लिए नौकरी छोड़ना जरूरी है?
सरकारी सेवा जनता के लिए काम करने का एक रास्ता है. राजनीति दूसरा रास्ता है. दोनों की अपनी भूमिका है और दोनों में काम करने का तरीका अलग है. यूपी में असीम अरुण और राजेश्वर सिंह जैसे अफसर चुनाव जीतकर विधायक बने. बृजलाल और पीएल पुनिया संसद तक पहुंचे. अब दिव्या मित्तल ने भी राजनीति में आने का फैसला किया है. लेकिन उन्होंने फिलहाल किसी राजनीतिक दल से दूरी रखते हुए अपनी अलग राह चुनने की बात कही है.