Deoria Sadar Assembly Constituency Election 2027/ त्रिपुरेश पति त्रिपाठी: पूर्वांचल की राजनीति में देवरिया सदर विधानसभा सीट हमेशा से एक अहम धुरी रही है. महर्षि देवरहा बाबा की पवित्र तपोस्थली, स्वतंत्रता सेनानी बाबा राघव दास की कर्मभूमि और सिद्धपीठ देवरही माता मंदिर की इस पावन धरा का राजनीतिक इतिहास बहुत समृद्ध रहा है.
रामलीला मैदान में शहीद रामचंद्र विद्यार्थी का स्मारक आज भी देश प्रेम के उस जज्बे की गवाही देता है, लेकिन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से समृद्ध इस सीट पर अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी गर्माहट अभी से महसूस की होने लगी है.
कभी कांग्रेस का गढ़, अब भाजपा का परचम
देवरिया सदर सीट के चुनावी मिजाज ने समय-समय पर करवट ली है. 1952 से लेकर अब तक इस सीट पर कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल, सपा और भाजपा का दबदबा रहा है. इस सीट पर कांग्रेस ने 3 बार कब्जा जमाया, जबकि भाजपा ने अब तक 6 बार यहां अपना परचम लहराया है. समाजवादी पार्टी भी एक बार यहां जीत हासिल कर चुकी है.
पिछले चुनाव में भाजपा के शलभ मणि त्रिपाठी ने 1,06,701 वोट हासिल कर सपा के अजय प्रताप सिंह उर्फ पिंटू को 66,046 वोट के अंतर से शिकस्त दी थी. अब 2027 में एक बार फिर इस सीट पर सियासी मुकाबला दिलचस्प होने वाला है.
जातीय गणित और मतदाताओं का रुझान
देवरिया सदर सीट का चुनावी गणित मुख्य रूप से सोशल इंजीनियरिंग पर निर्भर करता है. इस सीट पर लगभग 65,000 से 70,000 की संख्या के साथ ब्राह्मण मतदाता सबसे निर्णायक भूमिका में रहते हैं. अब अगर बात करें यादव और मुस्लिम वोटर्स की तो, सपा का पारंपरिक आधार बनाते हुए करीब 50,000 से 55,000 की मजबूत उपस्थिति रखते हैं. वहीं, सैंथवार (कुर्मी), क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ और दलित आबादी किसी भी प्रत्याशी की हार-जीत का संतुलन बनाने में अहम किरदार निभाती है.
राजनीतिक जानकारों की मानें तो 2027 के चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन का साझा पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) दांव भाजपा के मजबूत पारंपरिक वोट बैंक से सीधे टकराएगा.
'चीनी के कटोरे' की कड़वाहट, जमीनी शिकायतें
कभी चीनी उद्योग के कारण 'चीनी का कटोरा' कही जाने वाली देवरिया की पहचान समय के साथ बंद पड़ी मिलों के दर्द में बदल गई. बंद पड़ी चीनी मिलें, गन्ना किसानों का बकाया और युवाओं का पलायन आज भी सबसे बड़ा कसक भरा मुद्दा है. हालांकि, मेडिकल कॉलेज बनने से स्वास्थ्य सेवाओं को संजीवनी मिली है, लेकिन शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत चिंताजनक बनी हुई है.
जानिए जनता का मिजाज
जब ज़ी मीडिया की टीम ने देवरिया सदर क्षेत्र के अलग-अलग जगहों पर जाकर मतदाताओं से बात की, तो मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं. कुछ लोगों ने मौजूदा सदर विधायक के कामों की सराहना की, तो कुछ ने कहा कि बदलाव जरूरी है. कोई भी विकास का कार्य देवरिया सदर में नहीं हुआ है. केवल यहां धर्म की राजनीति होती है. रोडवेज की बदहाली, जाम और जल निकासी की समस्याओं को लोगों ने सामने रखा.
बहुत दिलचस्प होगा ये चुनाव
2027 की सियासी जंग में देवरिया सदर का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है. जहां भाजपा के सामने शलभ मणि त्रिपाठी के जरिए अपने किले की हिफाजत करने की चुनौती है, वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपनी पिछली गलतियों से सबक लेकर इस गढ़ में सेंध लगाने को बेताब हैं. जमीनी हकीकत यही बयां करती है कि चुनाव में केवल धर्म या जाति का ताना-बाना काम नहीं आएगा.
इस बार बंद मिलों का दर्द, सड़कों का जाम और जल निकासी जैसे बुनियादी मुद्दे भी उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे. अब देखना यह होगा कि देवरिया की जनता इस बार विकास के वादों पर भरोसा जताती है या जातीय बिसात की चालें बाजी मारती हैं.