उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस ने 2027 विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले अपने संगठन का चेहरा बदल दिया है. तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा 'मोना' को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है जबकि सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है.
इसके साथ देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया गया है. महराजगंज की फरेंदा सीट से विधायक वीरेंद्र चौधरी को कांग्रेस विधायक दल का नेता बनाया गया है.
पहली नजर में यह महज संगठनात्मक फेरबदल लग सकता है लेकिन नियुक्तियों की सामाजिक और क्षेत्रीय संरचना को देखें तो कांग्रेस ने एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है.
आराधना मिश्रा के जरिए ब्राह्मण और महिला नेतृत्व, इमरान मसूद के जरिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मुस्लिम प्रतिनिधित्व, देवेंद्र निषाद के जरिए ओबीसी और खासकर निषाद समुदाय तथा आलोक प्रसाद के जरिए दलित प्रतिनिधित्व को सामने रखा गया है.
इन नियुक्तियों को कांग्रेस की व्यापक सामाजिक पहुंच बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है लेकिन कांग्रेस के सामने असली सवाल नेतृत्व का नहीं है. सवाल यह है कि क्या नया नेतृत्व वोट लाने में सक्षम है?
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 399 सीटों पर लड़ी और सिर्फ दो सीटें जीत सकी.
अब 2027 की चुनौती यह है कि क्या नया नेतृत्व कांग्रेस को उस राजनीतिक स्थिति से बाहर निकाल सकता है जहां पार्टी का विधानसभा वोट शेयर दो से तीन प्रतिशत के आसपास सिमट गया है?
आराधना मिश्रा मोना की नियुक्ति कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है. वह प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से तीन बार विधायक हैं और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं. वह इससे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता थीं.
उनका राजनीतिक आधार मुख्यतः पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ क्षेत्र में है. ऐसे समय में जब कांग्रेस लंबे समय से अपने स्थानीय नेतृत्व और मजबूत विधानसभा चेहरों की कमी से जूझ रही है, पार्टी ने एक ऐसे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है जिसके पास विधानसभा चुनाव लड़ने और जीतने का प्रत्यक्ष अनुभव है.
इसके साथ एक दूसरा संदेश भी है. कांग्रेस ने लंबे समय बाद एक प्रमुख ब्राह्मण महिला चेहरे को प्रदेश संगठन की कमान दी है. इससे पहले उत्तर प्रदेश कांग्रेस की आखिरी महिला ब्राह्मण अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी थीं जिनका कार्यकाल 2012 में समाप्त हुआ था. यानी पूरे 14 साल बाद किसी ब्राह्मण महिला को यह कमान मिली है.
इसे उस सामाजिक वर्ग तक दोबारा पहुंच बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुराने सामाजिक आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा था और बाद के दशकों में भाजपा सहित दूसरे राजनीतिक विकल्पों की ओर गया.
दूसरी तरफ इमरान मसूद की नियुक्ति पश्चिमी उत्तर प्रदेश को केंद्र में लाती है. सहारनपुर के सांसद मसूद मुस्लिम समुदाय में प्रभाव रखने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं और पश्चिमी यूपी की राजनीति में उनका अपना आधार है.
इस लिहाज से कांग्रेस की नई टीम को एक तरह के सामाजिक-संगठनात्मक कॉम्बिनेशन के रूप में देखा जा सकता है. इसमें ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी और दलित शामिल हैं.
यह संयोजन अपने आप में चुनावी गठबंधन नहीं बनाता लेकिन यह बताता है कि कांग्रेस सिर्फ अपने पुराने वोटरों को वापस लाने की कोशिश नहीं कर रही, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों में नए राजनीतिक संपर्क बनाने का प्रयास कर रही है.
देवेंद्र निषाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाना पूर्वांचल के लिहाज से महत्वपूर्ण है. निषाद समुदाय पूर्वी उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर चुनावी रूप से प्रभावशाली है. उनकी नियुक्ति को निषाद समुदाय में कांग्रेस की पहुंच बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
आलोक प्रसाद की नियुक्ति दलित प्रतिनिधित्व को संगठन के शीर्ष स्तर पर जगह देती है. इस तरह कांग्रेस की नई टीम में सामाजिक प्रतिनिधित्व पहले की तुलना में ज्यादा स्पष्ट दिखाई देता है.
यहां एक दिलचस्प राजनीतिक संदर्भ भी है. समाजवादी पार्टी पिछले कुछ वर्षों से पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक की राजनीति पर जोर देती रही है.
कांग्रेस की नई टीम में ओबीसी, दलित और मुस्लिम चेहरों को प्रमुख जिम्मेदारी मिलना उस व्यापक विपक्षी सामाजिक रणनीति के साथ भी मेल खाता दिखाई देता है.
हालांकि कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि इन समुदायों को केवल संगठनात्मक पदों के जरिए प्रतिनिधित्व देने के बजाय उन्हें स्थानीय स्तर पर राजनीतिक भागीदारी, टिकट और नेतृत्व में भी जगह मिले.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की गिरावट को समझने के लिए 1989 को एक निर्णायक मोड़ माना जा सकता है.
1985 में कांग्रेस ने 425 सदस्यीय विधानसभा में 269 सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर 39.25 प्रतिशत था. केवल चार साल बाद 1989 में पार्टी 94 सीटों पर आ गई और वोट शेयर 27.90 प्रतिशत रह गया.
इसके बाद गिरावट लगातार गहरी होती गई.

1989 के बाद कांग्रेस के कमजोर होने के पीछे एक ही कारण नहीं था. उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक और वैचारिक दोनों स्तरों पर बड़े बदलाव हो रहे थे.
पहला बड़ा बदलाव मंडल-कमंडल की राजनीति का था. 1990 के दशक में पिछड़ी जातियों की राजनीति के उभार के साथ समाजवादी राजनीति को नया आधार मिला जबकि राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा को हिंदुत्व की राजनीति के जरिए तेजी से विस्तार दिया.
कांग्रेस इस नए ध्रुवीकरण में अपना पुराना व्यापक सामाजिक गठबंधन कायम नहीं रख सकी.
दूसरा बड़ा बदलाव समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का उभार था. यादव-मुस्लिम और दलित-केंद्रित राजनीति ने उन सामाजिक समूहों को अलग-अलग राजनीतिक विकल्प दिए जो पहले कांग्रेस के व्यापक सामाजिक गठबंधन का हिस्सा रहे थे.
तीसरा कारण अयोध्या का सवाल था. कांग्रेस की अयोध्या नीति को लेकर मुस्लिम मतदाताओं में असंतोष बढ़ा और पार्टी हिंदू मतदाताओं को भी भाजपा की ओर जाने से रोक नहीं सकी.
इस पूरे दौर को लेकर राजनीतिक इतिहासकारों और विश्लेषकों के बीच अलग-अलग व्याख्याएं हैं लेकिन इतना स्पष्ट है कि अयोध्या आंदोलन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति की धुरी बदल दी.
चौथा कारण स्थानीय संगठन का कमजोर होना था. जब क्षेत्रीय दलों ने बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक मजबूत जातीय-सामाजिक नेटवर्क तैयार किए तब कांग्रेस का पारंपरिक कैडर धीरे-धीरे कमजोर होता गया.
पांचवां कारण मजबूत स्थानीय नेतृत्व का अभाव था. उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में केवल राष्ट्रीय नेताओं के भरोसे चुनावी संगठन नहीं चल सकता.
कांग्रेस के पास लंबे समय तक ऐसा प्रदेशव्यापी नेतृत्व नहीं रहा जो अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी के लिए चुनावी नेटवर्क खड़ा कर सके.
2012 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए पूरी तरह सफल नहीं था लेकिन उसमें वापसी का एक संकेत जरूर दिखाई दिया.
पार्टी 28 सीटें जीतने और 11.65 प्रतिशत वोट हासिल करने में सफल रही. यह 2007 के 8.61 प्रतिशत से सुधार था लेकिन 2017 में कहानी पलट गई.
समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ सात सीटें जीत सकी. उसका वोट शेयर 6.25 प्रतिशत रह गया.
यहां एक महत्वपूर्ण बात है कि 2017 का चुनाव कांग्रेस के लिए केवल सीटों की कमी का मामला नहीं था. पार्टी का वोट शेयर भी लगभग साढ़े पांच प्रतिशत अंक गिर गया.
चुनाव का माहौल मुख्य रूप से भाजपा बनाम सपा-कांग्रेस के बीच ध्रुवीकृत हुआ. कांग्रेस का स्वतंत्र संगठन और स्थानीय राजनीतिक पहचान गठबंधन की छाया में और कमजोर दिखाई दी.
इसके चलते कांग्रेस को गठबंधन का लाभ उतना नहीं मिला जितनी उम्मीद की गई थी. यह सवाल आज भी 2027 के लिए प्रासंगिक है कि क्या कांग्रेस गठबंधन में रहते हुए अपनी अलग पहचान बचा सकती है?
2022 कांग्रेस के लिए सबसे कठिन विधानसभा चुनावों में से एक था. पार्टी ने 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. लगभग 21.5 लाख वोट वोट हासिल किए और वोट शेयर 2.33 प्रतिशत रहा.
उसे सिर्फ दो सीटें मिलीं लेकिन इस परिणाम को सिर्फ नेतृत्व की विफलता कह देना तस्वीर को बहुत सरल बना देगा.
पार्टी के सामने कई स्तरों पर समस्याएं थीं. जैसेकि कमजोर स्थानीय संगठन, मजबूत क्षेत्रीय चेहरों की कमी, उम्मीदवारों की सीमित चुनावी पकड़ और चुनाव का मुख्य मुकाबला भाजपा तथा सपा के बीच केंद्रित होना.
महिला उम्मीदवारों के प्रयोग ने भी यही चुनौती उजागर की. प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' अभियान चलाया और 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने का फैसला किया.
पार्टी ने 399 सीटों में 155 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया लेकिन सिर्फ एक महिला उम्मीदवार जीत सकी. कुल कांग्रेस की सीटें दो रहीं.
बाद के विश्लेषणों में कांग्रेस के भीतर से यह बात सामने आई कि बड़ी संख्या में महिला उम्मीदवारों का स्थानीय राजनीतिक आधार कमजोर था और कई उम्मीदवारों को पर्याप्त जमीनी संगठन नहीं मिला.
इसका अर्थ यह नहीं कि महिला-केंद्रित अभियान का विचार असफल था बल्कि सवाल उसके संगठनात्मक क्रियान्वयन का था.
यही 2027 के लिए सबसे बड़ा सबक है कि सिर्फ नया नारा या नया चेहरा पर्याप्त नहीं होगा.
एक और सवाल बार-बार पूछा जाता है कि क्या कांग्रेस का ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम आधार पूरी तरह खत्म हो चुका है? तो इसे पूरी तरह खत्म हो चुका कहना आंकड़ों से साबित नहीं होता.
2022 में कांग्रेस का विधानसभा वोट शेयर 2.33 प्रतिशत था लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की 17 सीटों पर चुनाव लड़ा, छह सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 9.46 प्रतिशत रहा.
यह अंतर महत्वपूर्ण है. इससे कम से कम इतना संकेत मिलता है कि कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में कुछ क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में वोट जुटाने की क्षमता अभी भी मौजूद है.
हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों की प्रकृति अलग होती है और 2024 का प्रदर्शन गठबंधन के संदर्भ में था इसलिए उसे सीधे 2027 विधानसभा चुनाव का अनुमान मानना उचित नहीं होगा.
फिर भी कांग्रेस के लिए 2024 यह संदेश जरूर देता है कि पार्टी का वोट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. चुनौती यह है कि क्या उस समर्थन को विधानसभा स्तर के स्थायी संगठन और स्थानीय नेतृत्व में बदला जा सकता है.
कांग्रेस की जमीनी ताकत को लेकर सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई भरोसेमंद डेटाबेस उपलब्ध नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि कितने जिलों या ब्लॉकों में पार्टी के पास सक्रिय कैडर अथवा चुनाव जीतने योग्य मजबूत स्थानीय चेहरे हैं. इसलिए इस संख्या को लेकर कोई दावा करना उचित नहीं होगा.
चुनाव परिणामों का पैटर्न बताता है कि समस्या केवल वोट प्रतिशत की नहीं है. 2022 में कांग्रेस ने लगभग पूरे राज्य में उम्मीदवार उतारे लेकिन दो सीटों पर सिमट गई. यह बताता है कि व्यापक उम्मीदवार उपस्थिति और वास्तविक चुनावी संगठन में अंतर था.
2027 के लिए कांग्रेस को तीन स्तरों पर अपनी ताकत बढ़ानी होगी.
पहला, हर बूथ पर जिम्मेदार कार्यकर्ता और मतदाता संपर्क अभियान चलाना चाहिए.
दूसरा, विधानसभा स्तर पर ऐसे स्थानीय चेहरे का चुनाव हो जो पार्टी के नाम से वोट मांग सकें केवल केंद्रीय नेतृत्व के नाम पर निर्भर न रहें.
तीसरा, जिला स्तर पर संगठन में लगातार सक्रिय रहने वाले ऐसे नेता और कार्यकर्ता तलाशे जो चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने के बजाय पूरे पांच साल काम करें.
2027 के चुनाव में कांग्रेस-सपा संबंध सबसे महत्वपूर्ण समीकरणों में से एक होगा. 2024 लोकसभा चुनाव में दोनों दल साथ लड़े और उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं.
इसमें से सपा 37 और कांग्रेस छह पर जीत दर्ज की लेकिन विधानसभा चुनाव का सीट बंटवारा कहीं ज्यादा जटिल होगा.
सितंबर 2026 में कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि पार्टी 403 सीटों पर उम्मीदवार उपलब्ध होने का दावा करती है और गठबंधन की स्थिति में 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ना चाहती.
दूसरी तरफ हालिया रिपोर्टों में सपा की ओर से अपने लिए बड़ी संख्या में सीटें रखने की चर्चा सामने आई है.
यानी सीटों की संख्या पर बातचीत सिर्फ गणित नहीं होगी. यह दोनों पार्टियों की राजनीतिक हैसियत का सवाल भी होगी.
अभी कांग्रेस के सामने दो समानांतर जरूरतें हैं. उसे सपा के साथ तालमेल बनाए रखना है और अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान भी खड़ी करना है.
अगर पार्टी पूरी तरह गठबंधन पर निर्भर रहती है तो उसे ज्यादा सीटों के लिए बातचीत में अपनी संगठनात्मक ताकत दिखानी होगी.
अगर वह अधिक सीटों पर स्वतंत्र रूप से लड़ने का विकल्प चुनती है तो उसके लिए बूथ स्तर का संगठन और स्थानीय उम्मीदवार और भी महत्वपूर्ण हो जाएंगे.
कांग्रेस की 2027 की चुनौती को केवल इस सवाल से नहीं देखा जा सकता कि पार्टी कितनी सीटें जीतेगी. पहला सवाल इससे पहले का है कि क्या कांग्रेस अपना वोट शेयर स्थायी रूप से बढ़ा सकती है?
आराधना मिश्रा मोना के सामने संगठन को फिर से खड़ा करने की चुनौती है. इमरान मसूद के सामने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की चुनौती है.
देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद के सामने अपने-अपने सामाजिक वर्गों तक कांग्रेस का संदेश पहुंचाने की चुनौती है.
लेकिन इन सभी नियुक्तियों की सफलता का अंतिम पैमाना यही होगा कि क्या ये चेहरे अपने-अपने सामाजिक और क्षेत्रीय संपर्कों को स्थायी संगठनात्मक नेटवर्क में बदल पाते हैं.
कांग्रेस के लिए 1985 का 39.25 प्रतिशत वोट शेयर अब इतिहास है. 2012 का 11.65 प्रतिशत एक अंतरिम वापसी का उदाहरण था.
2022 का 2.33 प्रतिशत पार्टी की वर्तमान कमजोरी का सबसे स्पष्ट आंकड़ा है.लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में 9.46 प्रतिशत वोट और छह सीटों का प्रदर्शन यह भी बताता है कि पार्टी के पास उत्तर प्रदेश में पूरी तरह शून्य से शुरुआत करने की स्थिति नहीं है.
इसलिए 2027 का असली सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस रातोंरात उत्तर प्रदेश में सत्ता के पुराने दौर में लौट सकती है या नहीं.
असली सवाल यह है कि क्या नया नेतृत्व 2.33 प्रतिशत वाली कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी में बदल सकता है जिसके पास हर विधानसभा क्षेत्र में संगठन, स्थानीय चेहरा और सामाजिक आधार हो.
अगर नई टीम सामाजिक प्रतिनिधित्व को संगठन में, संगठन को वोट में और वोट को स्थानीय राजनीतिक प्रभाव में बदल पाती है तभी 2027 कांग्रेस के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत बन सकता है.
वरना प्रदेश अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष बदलने के बावजूद पार्टी के सामने वही पुरानी चुनौती खड़ी रहेगी कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की मौजूदगी है लेकिन उसका राजनीतिक विस्तार कहां है?