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इमेजिन कीजिए, आप WhatsApp पर बॉस को मैसेज करें कि सर.. दो दिन की छुट्टी और चाहिए. उधर से रिप्लाई आए- ‘OK’. अब भला कौन कर्मचारी इस दो अक्षर के जवाब को छुट्टी की मंजूरी नहीं समझेगा? न कोई लंबी-चौड़ी बातचीत, न कोई सवाल-जवाब. बॉस ने ‘OK’ लिखा और कर्मचारी ने मान लिया कि छुट्टी ओके हो गई. लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब कर्मचारी छुट्टी मनाकर दफ्तर लौटा. उसे स्वागत में कोई स्माइल नहीं मिली. उलटे सस्पेंशन का सामना करना पड़ा. जिस ‘OK’ को वह छुट्टी का ग्रीन सिग्नल समझ रहा था, वही उसके गले की फांस बन गया. पूरा मामला जानकर आप भी ‘OK’ रहेंगे या नहीं... ये तो आगे ही पता चलेगा! चलिये पूरा मामला जान लेते हैं.
यह अनोखा मामला उत्तर मध्य रेलवे के प्रयागराज का है. यहां काम करने वाले प्रिया रंजन कुमार ने जुलाई 2025 में तीन दिन की छुट्टी ली थी. उनकी छुट्टी 14 से 16 जुलाई तक मंजूर थी. अब घर पर रुकने का मन हुआ या कोई और वजह रही, उन्होंने दो दिन की छुट्टी और बढ़ाने के लिए अपने सीनियर हिमांशु शुक्ला को WhatsApp पर मैसेज भेज दिया. उन्हें 17 और 18 जुलाई को भी छुट्टी चाहिए थी.
प्रिया रंजन कुमार ने छुट्टी बढ़ाने की गुजारिश की. जवाब में सीनियर की ओर से कथित तौर पर सिर्फ ‘OK’ आया. बस फिर क्या था! प्रिया ने इसे अपनी छुट्टी की मंजूरी मान लिया. शायद उन्हें लगा कि जब बॉस ने खुद लिखकर ओके कर दिया है तो अब कौन-सी फॉर्मेलिटी बाकी रह गई. लेकिन दफ्तर की व्यवस्था में WhatsApp पर आया छोटा-सा जवाब और छुट्टी की आधिकारिक मंजूरी दो अलग बातें हो सकती हैं.
रेलवे के मुताबिक जिस अधिकारी को कर्मचारी ने मैसेज किया था.. वह उस समय प्रशिक्षण पर थे. प्रशासन से जुड़े काम दूसरे अधिकारी अतुल यादव देख रहे थे. रेलवे का कहना था कि छुट्टी के लिए HRMS पोर्टल पर आवेदन और सक्षम अधिकारी की मंजूरी जरूरी थी. यानी कर्मचारी जिस ‘OK’ के भरोसे था... रेलवे के मुताबिक वह छुट्टी मंजूर होने का पक्का प्रमाण नहीं था.
प्रिया रंजन कुमार 21 जुलाई को ड्यूटी पर लौटे. लेकिन उनकी वापसी के साथ मामला शांत होने के बजाय और उलझता चला गया. उन्हें सस्पेंड कर दिया गया. इसके बाद 25 जुलाई को उनका ट्रांसफर प्रयागराज से फतेहपुर कर दिया गया. 28 जुलाई को उन्हें प्रयागराज से कार्यमुक्त कर दिया गया और 31 जुलाई को आरोपपत्र भी जारी हुआ. अब उनके सामने सवाल सिर्फ छुट्टी का नहीं था. मामला नौकरी में कार्रवाई और ट्रांसफर तक पहुंच चुका था.
प्रिया रंजन कुमार का आरोप था कि उनका ट्रांसफर सामान्य प्रशासनिक जरूरत के कारण नहीं किया गया. उन्होंने इसे अपने खिलाफ की गई कार्रवाई का हिस्सा बताया और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT की इलाहाबाद पीठ का दरवाजा खटखटाया. उनकी दलील थी कि पूरे घटनाक्रम को देखते हुए ट्रांसफर के पीछे की वजह पर सवाल उठते हैं.
दूसरी ओर रेलवे ने कहा कि फतेहपुर में नए प्रवेश द्वार और बुकिंग कार्यालय के लिए कर्मचारियों की जरूरत थी. वहां पद खाली था. कर्मचारी 2019 से प्रयागराज कार्यालय में तैनात थे. रेलवे के मुताबिक ट्रांसफर की सिफारिश प्लेसमेंट कमेटी ने की थी और सक्षम स्तर पर इसे मंजूरी दी गई थी. यानी रेलवे ने तबादले को छुट्टी वाले विवाद की सजा नहीं बल्कि प्रशासनिक जरूरत बताया.
मामले की सुनवाई के दौरान अधिकरण ने रेलवे की दलीलों पर विचार किया. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, CAT को ऐसा पर्याप्त आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि कर्मचारी का तबादला सिर्फ उन्हें दंडित करने के लिए किया गया था. इसलिए कर्मचारी की चुनौती स्वीकार नहीं की गई. हालांकि इस फैसले को यह मान लेना सही नहीं होगा कि अधिकरण ने WhatsApp पर मिले ‘OK’ को छुट्टी की मंजूरी मानने या न मानने का सबके लिए एक जैसा नियम तय कर दिया.
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात वही दो अक्षर हैं- ‘OK’. रोजमर्रा की बातचीत में इनका मतलब होता है कि बात समझ ली गई या ठीक है. लेकिन दफ्तर में इन्हीं दो अक्षरों का मतलब हर बार यह नहीं होता कि आवेदन मंजूर हो गया. खासकर तब, जब छुट्टी या किसी दूसरी अनुमति के लिए तय प्रक्रिया मौजूद हो. कर्मचारी ने ‘OK’ को छुट्टी की पक्की मुहर समझ लिया. रेलवे ने कहा कि आधिकारिक मंजूरी की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी. नतीजा यह हुआ कि दो दिन की छुट्टी बढ़ाने का मामला निलंबन, ट्रांसफर और अदालत जैसी लंबी प्रक्रिया तक पहुंच गया.
तो आगे से बॉस WhatsApp पर सिर्फ ‘OK’ लिखें तो खुश होने से पहले एक छोटा सा सवाल पूछ लेना बेहतर हो सकता है- सर, छुट्टी मंजूर समझूं या अभी आवेदन करना बाकी है?
(रिपोर्ट- अंबरीश पांडेय)