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UP Arrival of 308-Wheeled Truck: कल्पना कीजिए कि आप सुबह-सुबह हाईवे पर जा रहे हों और सामने से लोहे का एक पूरा का पूरा पहाड़ आपकी तरफ सरकता हुआ आए. कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों उत्तर प्रदेश की सड़कों पर देखने को मिल रहा है. बेल्जियम से मंगाया गया करीब 200 टन वजनी एक विशालकाय वेसल जब 308 पहियों वाले एक 100 फीट लंबे मल्टी-एक्सल ट्रक पर सवार होकर निकला, तो देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं.
बलरामपुर तक का तय कर रहा सफर
लोग गाड़ियां रोक-रोककर इस 'बाहुबली ट्रक' के साथ सेल्फी लेने लगे. यह कोई मामूली खेप नहीं है. यह विशाल वेसल बलरामपुर चीनी मिल और एथेनॉल प्लांट के लिए मंगाया गया है. बेल्जियम से जहाजों के जरिए पानी के रास्ते ओडिशा के पारादीप पोर्ट तक पहुंचा यह विशाल ढांचा अब सड़क मार्ग से उत्तर प्रदेश के बलरामपुर तक का सफर तय कर रहा है.
जहां से गुजरा, वहां थम गई रफ्तार!
पारादीप से शुरू हुआ यह हैरतअंगेज सफर ओडिशा, झारखंड और बिहार के रोहतास, गया, औरंगाबाद होते हुए अब चंदौली के रास्ते उत्तर प्रदेश की सीमा में दाखिल होने जा रहा है, लेकिन इस 200 टनी बाहुबली को संभालना बच्चों का खेल नहीं था. बिहार के औरंगाबाद में जब यह रेलवे ओवरब्रिज के नीचे से गुजरा, तो सुरक्षा के लिहाज से ट्रेनों की आवाजाही रोकनी पड़ी और रेलवे ट्रैक की हाईटेंशन बिजली सप्लाई तक बंद करनी पड़ी.
कहां है सबसे बड़ी चुनौती?
अब इस बाहुबली के सामने सबसे बड़ी परीक्षा प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में होने वाली है. एनएचएआई (NHAI) और स्थानीय प्रशासन की जांच में पता चला है कि इस महा-ट्रक की ऊंचाई इतनी ज्यादा है कि वाराणसी के तीन फुटओवर ब्रिज इसके रास्ते में बाधा बन रहे हैं. फैसला लिया गया है कि इन ब्रिजों के कुछ हिस्सों को काटकर हटाया जाएगा और ट्रक निकलने के बाद उन्हें फिर से जोड़ दिया जाएगा.
कछुए की चाल और सस्पेंस भरा सफर
लॉजिस्टिक्स कंपनी जेएम बक्सी हैवी की निगरानी में चल रहा यह ट्रक दिन-रात मिलाकर सिर्फ 5 से 10 किलोमीटर ही दूरी तय कर पाता है. हर एक पुल की भार क्षमता, सड़क का मोड़ और सिर के ऊपर से गुजरते बिजली के तार इंजीनियरों की टीम एक-एक इंच नापकर आगे बढ़ रही है.
यह महज एक सामान की ढुलाई नहीं, बल्कि भारतीय इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स और ट्रैफिक मैनेजमेंट का एक इम्तिहान है. सड़क पर रेंगता हुआ यह 308 पहियों का विशालकाय ढांचा हमें याद दिलाता है कि इंसान चाहे तो लोहे के पहाड़ को भी चींटी की रफ्तार से सही, मगर उसकी मंजिल तक पहुंचा ही देता है. अब देखना यह है कि बाबा विश्वनाथ की नगरी बनारस इस 'बाहुबली' का स्वागत किस अंदाज में करती है.