1898 में बनी बाराबंकी की बारादरी को मिला राजकीय दर्जा, अब बहुरेंगे ऐतिहासिक विरासत के दिन?
Barabanki Heritage Site: उपेक्षा, जर्जरता और अतिक्रमण की मार झेल रही बाराबंकी की ऐतिहासिक विरासत के दिन अब बहुरने की उम्मीद जगी है. गोकुलपुर-असेनी रियासत के तालुकेदार कुंवर गिरधारी सिंह की करीब 128 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक समाधि बारादरी को प्रदेश सरकार ने राजकीय धरोहर घोषित कर दिया है.
नितिन श्रीवास्तवव/बाराबंकी: उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में उपेक्षा, जर्जरता और अतिक्रमण की मार झेल रही ऐतिहासिक इमारतों के दिन अब बहुरने वाले हैं. अयोध्या-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित गोकुलपुर-असेनी रियासत के तालुकेदार कुंवर गिरधारी सिंह की 128 वर्ष पुरानी समाधि बारादरी को राज्य सरकार ने 'राजकीय धरोहर' घोषित कर दिया है। राज्य पुरातत्व विभाग के इस फैसले से अवध की इस गौरवशाली विरासत को नया जीवन मिलने की उम्मीद जगी है. कभी अपनी भव्य स्थापत्य कला के लिए पहचान रखने वाली यह इमारत अब संरक्षण और सौंदर्यीकरण की राह पर आगे बढ़ सकेगी. जिला प्रशासन का कहना है कि जिले की अन्य ऐतिहासिक इमारतों को भी सुरक्षित रखने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं.
अयोध्या-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग से करीब दो किलोमीटर दूर गोकुलपुर-असेनी गांव में स्थित यह ऐतिहासिक बारादरी अपने भीतर अवध के गौरवशाली अतीत की कहानी समेटे हुए है.समय के साथ उचित देखरेख के अभाव में इमारत की हालत बिगड़ती गई, लेकिन इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता आज भी बरकरार है.
1898 में बनी थी नक्काशीदार भव्य समाधि बारादरी
इस ऐतिहासिक बारादरी का निर्माण वर्ष 1898 में कुंवर गिरधारी सिंह की स्मृति में उनके परिजनों द्वारा कराया गया था. मंदिरनुमा स्थापत्य शैली में बनी इस इमारत की दीवारों पर सैनिकों, शेरों और कई कलात्मक आकृतियों की बारीक नक्काशी उस दौर की उत्कृष्ट शिल्पकला को दर्शाती है. कुंवर गिरधारी सिंह अवध के एक प्रभावशाली तालुकेदार और प्रमुख कायस्थ जमींदार परिवार से थे, जिनका उल्लेख प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ 'द इलस्ट्रेटेड हिस्टोरिकल एल्बम ऑफ द राजा एंड तालुकेदार्स ऑफ अवध' में भी मिलता है.
कुंवर गिरधारी सिंह अवध के प्रभावशाली तालुकेदार और प्रमुख कायस्थ जमींदार परिवार से जुड़े थे. उनकी रियासत का उल्लेख प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ द इलस्ट्रेटेड हिस्टोरिकल एल्बम ऑफ द राजा एंड तालुकेदार्स ऑफ अवध में भी मिलता है. यह संदर्भ इस परिवार की ऐतिहासिक पहचान और अवध के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में उसके महत्व को रेखांकित करता है. ऐसे में बारादरी को राजकीय धरोहर का दर्जा मिलना केवल एक पुरानी इमारत का संरक्षण नहीं, बल्कि क्षेत्र के इतिहास, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक पहचान को सहेजने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
प्रशासन तैयार कर रहा जीर्णोद्धार की कार्ययोजना
जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग अब इमारत की संरचनात्मक सुरक्षा, मूल स्थापत्य के संरक्षण और परिसर को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए विस्तृत कार्ययोजना पर काम कर रहे हैं. इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षित होने से न केवल क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि बाराबंकी में पर्यटन (Tourism) को भी बढ़ावा मिलेगा.
जिलाधिकारी ईशान प्रताप सिंह ने बताया कि राज्य पुरातत्व विभाग ने ऐतिहासिक बारादरी को संरक्षित करने का निर्णय लिया है. उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन जिले की पुरानी ऐतिहासिक विरासतों को सुरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. डीएम ने बताया कि प्रख्यात हॉकी खिलाड़ी केडी सिंह बाबू की पुश्तैनी हवेली को भी प्रदेश की योगी सरकार ने संरक्षित करने का निर्णय लिया है. सरकार की मंशा है कि जिले की पुरानी रियासतों और ऐतिहासिक इमारतों को सुरक्षित रखा जाए तथा उन्हें अवैध कब्जों से बचाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी विरासत से परिचित हो सकें.
शासन को भेजी जाएगी कार्ययोजना
उन्होंने यह भी बताया कि कुंवर गिरधारी सिंह की पुश्तैनी हवेली के संरक्षण के लिए जल्द ही कार्ययोजना तैयार कर शासन को भेजी जाएगी. इससे जिले की ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने की मुहिम को और गति मिलने की उम्मीद है.
स्थानीय लोगों में खुशी
ऐतिहासिक बारादरी को राजकीय संरक्षण मिलने की खबर से स्थानीय लोगों में खुशी है. लोगों का मानना है कि संरक्षण और सौंदर्यीकरण के बाद यह ऐतिहासिक स्थल अपनी पुरानी पहचान हासिल कर सकेगा। इससे न केवल क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित होगी, बल्कि बाराबंकी के पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है.
अब निगाहें संरक्षण की कार्ययोजना पर
राजकीय धरोहर का दर्जा मिलने के बाद सबसे अहम कदम इमारत की मौजूदा स्थिति का आकलन, संरचनात्मक सुरक्षा, मूल स्थापत्य का संरक्षण और अतिक्रमण से बचाव होगा. यदि योजनाबद्ध तरीके से काम हुआ, तो 128 साल पुरानी यह बारादरी आने वाली पीढ़ियों के लिए अवध के इतिहास की एक जीवंत पहचान बन सकती है.