'तारीख पर तारीख' का 'The End': अब यूपी में फौरन मिलेगा इंसाफ, खुलेंगी 900 नई अदालतें; जानिए 1.20 करोड़ पेंडिंग केस निपटाने का मेगा प्लान
UP 900 New Courts: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. योगी कैबिनेट की बैठक में प्रदेश के 75 जिलों में पहले फेज में 900 नई अदालतें गठित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. यह फैसला क्यों लिया गया, किन जिलों को कितनी अदालतें मिलेंगी, और इससे न्यायिक व्यवस्था व रोजगार पर क्या असर पड़ेगा? आइए समझते हैं पूरा प्लान...
UP 900 New Courts: 'तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख... इंसाफ नहीं मिला माय लॉर्ड, मिली तो सिर्फ तारीख' फिल्मी पर्दे का यह डायलॉग भारत के कानूनी सिस्टम और कचहरियों के चक्कर काटते आम आदमी के दर्द को बयां करने के लिए बहुत मशहूर है. उत्तर प्रदेश की अदालतों में सालों-साल तारीखें गिनते करोड़ों वादियों के लिए अब राहत की किरण चमकी है. 15 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में पहले चरण के तहत 900 नई अदालतें गठित करने के फैसले पर मुहर लगा दी है.
सरकार के इस फैसले से किन जिलों को कितनी अदालतें मिलेंगी, इससे प्रदेश के युवाओं के लिए रोजगार के क्या नए अवसर बनेंगे और उत्तर प्रदेश की पूरी न्यायिक व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या सच में इन अदालतों के बनने से 'तारीख पर तारीख' का सिलसिला खत्म होगा? आइए समझते हैं योगी सरकार का पूरा मास्टरप्लान
आखिर क्यों पड़ी 900 नई अदालतों की जरूरत?
उत्तर प्रदेश देश का सबसे आबादी वाला राज्य है और न्याय प्रणाली पर मुकदमों का भारी दबाव हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है. सरकार के मुताबिक, प्रदेश के 75 जिलों में 1,20,66,105 मुकदमे लंबित हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जरूरत के आकलन के आधार पर प्रदेश में कुल 9,149 अतिरिक्त अदालतों की आवश्यकता बताई है. 900 अदालतों का गठन इसी प्रक्रिया का पहला चरण है.
तारीख-पर-तारीख का चक्रव्यूह
दीवानी (Civil) और आपराधिक (Criminal) मामलों में फैसलों में सालों-साल लग जाते हैं, जिससे आम जनता का समय, पैसा और मानसिक शांति तीनों प्रभावित होते हैं. मुकदमों की इस विशाल संख्या को देखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था का अध्ययन कर कुल 9,149 अतिरिक्त अदालतों की जरूरत बताई थी. हाईकोर्ट की इसी सिफारिश को ध्यान में रखते हुए योगी सरकार ने पहले चरण में 900 नई अदालतों की स्थापना को मंजूरी दी है, ताकि न्याय की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके.
किस श्रेणी की कितनी अदालतें बनेंगी?
प्रदेश के 75 जिलों में नई अदालतों का आवंटन एकसमान न होकर 'पेंडेंसी रेट' (लंबित मुकदमों की संख्या) के आधार पर किया जाएगा. यानी जिस जिले में मुकदमों की संख्या जितनी ज्यादा होगी, वहां उतनी ही अधिक नई अदालतें खोली जाएंगी. इन 900 अदालतों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
1. अपर जिला एवं सत्र न्यायालय (ADJ Courts)-237: ये अदालतें गंभीर आपराधिक मामलों और बड़े दीवानी मुकदमों की सुनवाई करती हैं. 237 नए ADJ कोर्ट्स बनने से गंभीर अपराधों के मामलों में त्वरित सुनवाई और सजा सुनाई जा सकेगी.
2. सिविल जज (सीनियर डिवीजन)-391: ये अदालतें मध्यम वर्ग के संपत्ति विवाद, बड़े वित्तीय लेन-देन और दीवानी मामलों की सुनवाई करती हैं. सबसे ज्यादा 391 अदालतें इसी श्रेणी में बनाई जा रही हैं.
3.सिविल जज (जूनियर डिवीजन)-272: ये अदालतें शुरुआती स्तर के दीवानी और छोटे-मोटे विवादों का निपटारा करती हैं. 272 नए जूनियर डिवीजन कोर्ट्स बनने से ग्रामीण और छोटे शहरों के मुकदमों का तुरंत समाधान होगा.
युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा मौका
900 नई अदालतों के सिर्फ ढांचे ही तैयार नहीं होंगे, बल्कि इन्हें सुचारू रूप से चलाने के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियों के रास्ते भी खुलेंगे. योगी कैबिनेट ने कुल 9,084 नए पदों के सृजन को अपनी मंजूरी दी है. 900 नई अदालतों के संचालन के लिए 6,656 नियमित और 2,428 आउटसोर्स पद सृजित किए जाएंगे. इनमें न्यायिक अधिकारियों के साथ स्टेनोग्राफर, रीडर, मुंसरिम, वरिष्ठ-कनिष्ठ सहायक समेत अन्य पद शामिल होंगे.
अब अगर भर्ती प्रक्रिया के समय की बात करें तो, सरकार के अनुसार, नई भर्तियों की प्रक्रिया मौजूदा स्वीकृत रिक्तियों को भरने और जिला स्तर पर कोर्ट रूम व जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत सुविधाएं) तैयार होने के साथ ही शुरू की जाएगी.
जानिए कितना आएगा वित्तीय बोझ?
इतने बड़े पैमाने पर अदालतों की स्थापना और हजारों अधिकारियों-कर्मचारियों की तैनाती के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा बजट आवंटित किया है. 900 नई अदालतों, न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और दैनिक संचालन पर राज्य सरकार हर साल ₹693.60 करोड़ खर्च करेगी. वहीं, अदालतों के शुरुआती सेटअप, ऑफिस इक्विपमेंट और शुरुआती जरूरतों के लिए ₹8.72 करोड़ का अनावर्ती खर्च स्वीकृत किया गया है. इसके अलावा कोर्ट भवनों का निर्माण, जज चैंबर और आधुनिक कंप्यूटराइजेशन का खर्च इसमें अलग से शामिल किया जाएगा.
वित्त मंत्री सुरेश खन्ना का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों और न्यायालयों की आवश्यकता के आकलन के आधार पर चरणबद्ध तरीके से नए न्यायालयों के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है. पहले चरण के 900 न्यायालयों और सहवर्ती पदों पर करीब 693.60 करोड़ रुपये का वार्षिक खर्च सरकार पर आएगा.
आम जनता और न्यायिक तंत्र पर इसका क्या असर पड़ेगा?
योगी सरकार के इस 'मास्टरप्लान' से उत्तर प्रदेश के आम नागरिकों और कानूनी व्यवस्था को कई लाभ मिलने वाले हैं:
1. 'तारीख-पर-तारीख' से मुक्ति: जब अदालतों की संख्या बढ़ेगी, तो जजों पर मुकदमों का दैनिक बोझ कम होगा. इससे मामलों में बार-बार मिलने वाली लंबी तारीखों पर लगाम लगेगी.
2. समय और धन की बचत: अदालती चक्कर कम होने से पीड़ित और वादी दोनों के पैसे और कीमती समय की भारी बचत होगी.
3. जेलों पर बोझ कम होगा: अंडरट्रायल (विचाराधीन) कैदियों के मुकदमों का तेजी से निस्तारण होने से प्रदेश की ओवरक्रूडेड (अत्यधिक भरी हुई) जेलों पर भी दबाव कम होगा.
4. कानून-व्यवस्था में सुधार: अपराधियों को जल्द सजा मिलने से अपराधियों में खौफ पैदा होगा और राज्य की कानून-व्यवस्था को मजबूती मिलेगी.
5. कानूनी पेशवर युवाओं को अवसर: कानून (LLB/LLM) की पढ़ाई कर चुके युवाओं के लिए न्यायिक सेवा (PCS-J / HJS) में जाने के नए अवसर बनेंगे, साथ ही कोर्ट पैरा-लीगल स्टाफ के लिए भी बड़ी संख्या में रोजगार मिलेगा.
समय, पैसा और मानसिक शांति बचाने का रोडमैप
कुल मिलाकर, योगी कैबिनेट का यह फैसला केवल नई अदालतें खोलने या प्रशासनिक आंकड़े बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह करोड़ों प्रदेशवासियों के समय, पैसे और मानसिक शांति को बचाने का एक बड़ा रोडमैप है. सालों से 'तारीख पर तारीख' के भारी बोझ तले दबती न्याय प्रणाली के लिए यह कदम एक संजीवनी की तरह है, जो आम फरियादी के टूटते भरोसे को दोबारा कायम करने का काम करेगा.
न्यायिक ढांचे के लिए बनेगी नजीर
हालांकि, किसी भी मास्टरप्लान की असली कसौटी उसका जमीनी क्रियान्वयन (Ground Implementation) होता है. 900 नई अदालतों के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना, पारदर्शी तरीके से 9,084 पदों पर योग्य जजों और कर्मचारियों की तैनाती करने के साथ ही तय समय-सीमा में काम शुरू करना ही इस योजना की वास्तविक सफलता तय करेगा. अगर यह महत्वाकांक्षी योजना अपने सही स्वरूप में और समय रहते धरातल पर उतरती है, तो यह न केवल उत्तर प्रदेश में 'त्वरित एवं सुलभ न्याय' का नया अध्याय लिखेगी, बल्कि पूरे देश के न्यायिक ढांचे के लिए एक ऐतिहासिक नजीर भी साबित होगी.