मुंबई की भागदौड़ और पायलट की नौकरी छोड़ी: उत्तराखंड के पहाड़ों में बस गया कपल, बताया महीने का खर्च
मुंबई की भाग-दौड़ भरी जिंदगी , पायलट की अच्छी-खासी नौकरी और शहर की सुविधाएं छोड़कर गौरव और गरिमा ने करीब 9 साल पहले उत्तराखंड के पहाड़ों को अपना घर बना लिया. नैनीताल जिले के कोटाबाग में अब उनकी जिंदगी होमस्टे, खेती, नेचर और सुकून के बीच गुजरती है. खास बात यह है कि दोनों ने अपनी माउंटेन लाइफ सोशल मीडिया पर शेयर की है और यह भी बताया है कि उनका महीने का खर्च कितने रुपये आता है.
किसी बड़े शहर में अच्छी नौकरी मिल जाए तो ज्यादातर लोग उसे छोड़ने के बारे में सोचते भी नहीं. खासकर तब, जब नौकरी पायलट की हो और कमाई भी अच्छी हो. लेकिन गौरव ने करीब 9 साल पहले अपनी जिंदगी का रास्ता ही बदल दिया.
उनका ज्यादातर बचपन और करियर मुंबई में बीता था. स्कूल से लेकर पायलट की ट्रेनिंग और फिर फ्लाइंग करियर तक, उनकी जिंदगी शहर के आसपास ही घूमती रही. लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब उन्हें लगा कि अब जिंदगी को किसी दूसरी दिशा में ले जाने का समय है. उन्होंने पायलट की नौकरी छोड़ी और पत्नी गरिमा के साथ उत्तराखंड के पहाड़ों में शिफ्ट हो गए.
अब सुबह अलार्म से नहीं, पहाड़ों के बीच होती है
गौरव और गरिमा नैनीताल जिले के कोटाबाग में रहते हैं. दोनों सोशल मीडिया पर अपनी जिंदगी के छोटे-छोटे हिस्से लोगों के साथ शेयर करते रहते हैं. उन्होंने 'मूविंग टू द माउंटेन्स' नाम से अपनी इस यात्रा के कई वीडियो भी शेयर किए हैं. गौरव बताते हैं कि मुंबई में उनकी जिंदगी काफी अलग थी. वहां स्कूल, ट्रेनिंग, फ्लाइंग और काम के बीच एक तय रूटीन था. अब पहाड़ों में सुबह उठने के बाद सामने शहर की ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि पहाड़, पेड़ और खुला आसमान दिखाई देता है. उनकी जिंदगी अब किसी तय स्क्रिप्ट पर नहीं चलती. कभी होमस्टे का काम, कभी खेत, कभी मेहमानों के साथ वक्त और कभी बस आसपास की खूबसूरती को देखते हुए दिन निकल जाता है.
सड़क पर ट्रैफिक नहीं, घोड़े दिखते हैं
गौरव ने अपने एक वीडियो में पहाड़ों की जिंदगी के बारे में बताते हुए कहा कि यहां वह ऐसी सड़कों पर चलते हैं, जहां उन्हें ट्रैफिक के बीच फंसने के बजाय घोड़े आराम से चरते हुए दिखाई दे जाते हैं. छोटे-मोटे काम के लिए बाजार जाना भी अब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. कभी किसी मेहमान को शांत नदी के किनारे ले जाना होता है तो कभी अपने होमस्टे से जुड़े काम देखने होते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि उन्हें लगता है कि प्रकृति अब उनके लिए घूमने की जगह नहीं रही. वह उनकी रोज की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है.
पहाड़ों पर क्यों आए? जिंदगी परफेक्ट बनाने नहीं
गौरव के अनुसार, उन्होंने मुंबई इसलिए नहीं छोड़ा कि पहाड़ों पर आने के बाद जिंदगी बिल्कुल परफेक्ट हो जाएगी. उनका मकसद सिर्फ शहर से दूर भागना भी नहीं था. वह ऐसी जिंदगी चाहते थे, जिसमें अपने आसपास रहने वाले लोगों को जान सकें. पड़ोसियों से पहचान हो, प्रकृति रोज की जिंदगी में शामिल हो और जिंदगी सिर्फ काम और ट्रैफिक के बीच न निकल जाए. शहर में जो चीजें छुट्टी लेकर महसूस की जाती थीं, गौरव और गरिमा ने उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने का फैसला किया.
पायलट से खेती और फिर होमस्टे तक का सफर
पहाड़ों में पहुंचने के बाद गौरव ने ऑर्गेनिक खेती से शुरुआत की. मतलब, एक समय जो शख्स आसमान में प्लेन उड़ाता था, वह अब जमीन पर खेती और पहाड़ों में अपनी जिंदगी खड़ी करने में जुट गया. धीरे-धीरे उन्होंने होमस्टे का काम भी शुरू किया. आज गौरव तीन होमस्टे चलाते हैं. अब उनके लिए यह सिर्फ कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि पहाड़ों में बनाई गई नई जिंदगी का अहम हिस्सा है. यही वजह है कि वह अपनी जिंदगी को नौकरी छोड़ने की कहानी के बजाय एक अलग तरह की लाइफस्टाइल के तौर पर देखते हैं.
किराया नहीं, सोलर से बिजली का खर्च भी बचा
अब बात उस सवाल की, जो पहाड़ों पर जाकर बसने का सपना देखने वाले लगभग हर व्यक्ति के मन में आता है. वह है, आखिर वहां महीने का खर्च कितना आता है? गौरव ने अपने सोशल मीडिया पर इसका पूरा हिसाब शेयर किया है. उनके मुताबिक, वह और गरिमा अपने ही एक होमस्टे में रहते हैं. इसलिए उन्हें घर का अलग किराया नहीं देना पड़ता. घर में सोलर पैनल लगे हुए हैं, जिसकी वजह से उन्हें हर महीने बिजली का सामान्य बिल भी नहीं देना पड़ता. हालांकि, पानी का खर्च आता है. उन्होंने बताया कि दो महीने का पानी का बिल करीब 488 रुपये आता है.
मोबाइल, राशन और ईंधन का इतना खर्च
गौरव के बताए हिसाब के मुताबिक, वाई-फाई और मोबाइल रिचार्ज पर हर महीने करीब 1,500 रुपये खर्च होते हैं. वहीं, ईंधन और किराने का सामान मिलाकर लगभग 10 हजार रुपये का खर्च आता है. बीमा और दूसरी पॉलिसियों के लिए करीब 6 हजार रुपये हर महीने रखने पड़ते हैं. इसके अलावा, जिम की मेंबरशिप और वेलनेस से जुड़े खर्च पर करीब 5 हजार रुपये जाते हैं. मतलब, पहाड़ों में रहने का मतलब यह नहीं कि हर खर्च अपने आप खत्म हो जाता है. कुछ खर्च शहर जैसे ही हैं, बस उनकी जिंदगी का बाकी हिस्सा काफी बदल गया है.
दो लोग और एक कुत्ता, कुल खर्च करीब 33 हजार
गौरव और गरिमा के साथ उनका पालतू कुत्ता भी रहता है. गौरव उसे अपनी बेटी की तरह बताते हैं. उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया कि अप्रैल नाम का यह कुत्ता उनके परिवार का अहम हिस्सा है और उसे भी उनकी लाइफस्टाइल में पूरा प्यार मिलता है. बाहर खाना खाने और दिल्ली की यात्रा का खर्च भी उनके बजट में शामिल है, क्योंकि गरिमा दिल्ली की रहने वाली हैं. इस मद में करीब 10 हजार रुपये महीने का खर्च आता है. इन सभी खर्चों को जोड़ने पर गौरव के मुताबिक, दो लोगों और उनके पालतू कुत्ते का कुल मासिक खर्च करीब 33 हजार रुपये बैठता है.
अच्छी सैलरी से ज्यादा जरूरी लगा सुकून
गौरव की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि उन्होंने पहाड़ों में आने के लिए सिर्फ शहर नहीं छोड़ा, बल्कि एक ऐसा करियर भी पीछे छोड़ दिया, जिसे हासिल करने का सपना बहुत से लोग देखते हैं. उनकी जिंदगी यह नहीं बताती कि हर किसी को नौकरी छोड़कर पहाड़ों पर चले जाना चाहिए. बल्कि यह दिखाती है कि कभी-कभी इंसान अपनी प्राथमिकताएं बदलकर जिंदगी का अलग रास्ता चुन सकता है. मुंबई में पायलट की नौकरी से लेकर उत्तराखंड में खेती और होमस्टे तक का उनका सफर इसी बदलाव की कहानी है. अब उनका दिन ऑफिस की घड़ी से नहीं, बल्कि पहाड़ों की जरूरत और अपनी पसंद के हिसाब से चलता है.
क्या 33 हजार में पहाड़ों पर रहना संभव है?
गौरव द्वारा बताया गया करीब 33 हजार रुपये का आंकड़ा उनकी अपनी जिंदगी और खर्चों पर आधारित है. हर परिवार का खर्च घर, जमीन, बच्चों, हेल्थ, यात्रा, काम और दूसरी जरूरतों के हिसाब से अलग हो सकता है. फिर भी उनकी कहानी उन लोगों के लिए जरूर दिलचस्प है, जो शहर की भीड़ से दूर जाकर शांत जिंदगी जीने का सपना देखते हैं. क्योंकि गौरव ने सिर्फ पहाड़ों की खूबसूरत तस्वीरें नहीं दिखाई हैं, बल्कि यह भी बताया है कि उस जिंदगी को चलाने में हर महीने कितना पैसा लगता है.