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70 साल की उम्र में ज्यादातर लोग अपनी जिंदगी की भागदौड़ से थोड़ा दूर होना चाहते हैं. सुबह आराम से उठना, परिवार के साथ बैठना और बाकी जिंदगी सुकून से बिताना शायद हर किसी की इच्छा होती है. लेकिन जिंदगी हर किसी को ऐसी सुविधा नहीं देती.
कोलकाता के ठाकुरपुकुर में रहने वाले समीर काका की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. उम्र भले ही 70 साल हो गई हो, लेकिन उनके कंधों पर आज भी परिवार की जिम्मेदारी है. इसलिए हर सुबह उन्हें अपने गुब्बारों का गुच्छा उठाकर घर से निकलना पड़ता है. उनका काम देखने में छोटा लग सकता है, लेकिन उसके पीछे की मेहनत सुनकर तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है.
समीर काका अपने घर से उस जगह तक करीब 4 किलोमीटर पैदल जाते हैं, जहां वह गुब्बारे बेचते हैं. यह सफर उनके लिए आसान नहीं है. पैरों में तकलीफ है और चलने में परेशानी होती है, लेकिन उनको रोज का रास्ता तय करना ही पड़ता है. वह अपनी जगह पहुंचने के बाद कई घंटे सड़क किनारे बैठकर या खड़े होकर ग्राहकों का इंतजार करते हैं. छह घंटे से ज्यादा वक्त इसी उम्मीद में गुजर जाता है कि कोई राहगीर रुकेगा और उनके हाथ से एक-दो गुब्बारे खरीदेगा. फिर जब दिन ढलता है तो काम खत्म होता है. लेकिन घर पहुंचने के लिए अभी 4 किलोमीटर का रास्ता और बाकी होता है. मतलब रोज करीब 8 किलोमीटर पैदल चलना, घंटों सड़क पर गुजारना और आखिर में करीब 150 रुपये लेकर घर लौटना समीर काका की नियति है.
कोलकाता की सड़क पर रंग-बिरंगे गुब्बारों का गुच्छा लिए समीर काका किसी को भी नजर आ सकते हैं. बच्चों के लिए उनके गुब्बारे खुशी की वजह हो सकते हैं, लेकिन उनके लिए यही गुब्बारे घर चलाने का जरिया हैं. सड़क से गुजरते हुए कोई बच्चा गुब्बारे की तरफ देखता है तो उनके चेहरे पर शायद उम्मीद की एक छोटी सी झलक आ जाती है. क्योंकि एक गुब्बारा बिकना भी उनकी रोज की कमाई में कुछ रुपये जोड़ता है. यह काम उनके लिए कोई नया नहीं है. वह करीब 26 साल से गुब्बारे बेच रहे हैं.
इतने लंबे समय में समीर काका की जिंदगी में काफी कुछ बदला, लेकिन उनका काम नहीं बदला. करीब 26 साल से वह इसी तरह गुब्बारे बेचकर अपना परिवार चला रहे हैं. इस दौरान उनकी सेहत ने भी कई मुश्किलें झेली हैं. कुछ साल पहले उन्हें स्ट्रोक आया था. इसके बाद उन्हें लंबे समय तक लकवे की परेशानी से गुजरना पड़ा. उनकी गर्दन भी अब पूरी तरह सीधी नहीं हो पाती. इसके अलावा उनके पैरों में त्वचा से जुड़ी गंभीर बीमारी बताई गई है. इसकी वजह से चलना उनके लिए और मुश्किल हो जाता है. फिर भी सुबह होने पर बीमारी उन्हें घर में रोक नहीं पाती.
समीर काका के लिए सबसे बड़ी वजह उनका परिवार है. बताया गया है कि वह पांच सदस्यों के परिवार के अकेले कमाने वाले सदस्य हैं. ऐसे में रोज की 150 रुपये के आसपास की कमाई भले ही बाहर से देखने पर बहुत कम लगे, लेकिन उनके घर के लिए यही पैसा जरूरी है. राशन हो, घर का खर्च हो या दूसरी छोटी जरूरतें, उनकी कमाई किसी न किसी काम आती है. यही वजह है कि पैरों में दर्द होने के बावजूद वह काम पर निकलते हैं. शायद उनके पास आराम करने का ऑप्शन ही नहीं है.
समीर काका की जिंदगी की यह कहानी सोशल मीडिया पर कंटेंट क्रिएटर अराधना चटर्जी के वीडियो के जरिए सामने आई. अराधना ने उन्हें सड़क पर देखा तो उनकी नजर उनके चलने के तरीके पर गई. वह धीरे-धीरे और लंगड़ाते हुए आगे बढ़ रहे थे. हाथ में गुब्बारों का बड़ा सा गुच्छा था. पहली नजर में यह कोलकाता की सड़क पर दिखने वाला एक आम नजारा लग सकता था. लेकिन जब अराधना ने उनसे बात की और उनकी जिंदगी के बारे में जाना तो कहानी कहीं ज्यादा गहरी निकली. उन्होंने समीर काका की कहानी को वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर शेयर किया. इसके बाद लोगों का ध्यान उनकी तरफ गया.
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस कोशिश की तारीफ की. लोगों का कहना था कि सड़क पर काम करने वाले ऐसे बुजुर्गों की जिंदगी अक्सर हमारी नजरों के सामने होते हुए भी हमारी नजर से छूट जाती है. समीर काका भी रोज उसी सड़क पर निकलते हैं. लोग उनके पास से गुजरते हैं, बच्चे गुब्बारे खरीदते हैं और फिर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं. लेकिन शायद ही कोई सोचता होगा कि इन गुब्बारों को बेचने वाला इंसान रोज कितनी दूर से चलकर यहां पहुंचता है और दिन खत्म होने के बाद फिर उतनी ही दूरी तय करके घर जाता है.
समीर काका की कहानी में कोई फिल्मी मोड़ नहीं है. यहां कोई बड़ी सफलता की कहानी भी नहीं है. यहां बस एक बुजुर्ग इंसान है, जिसकी जिंदगी में जिम्मेदारियां अभी खत्म नहीं हुई हैं. अगली सुबह उन्हें फिर उठना होगा. गुब्बारों का गुच्छा संभालना होगा. करीब 4 किलोमीटर पैदल चलकर अपनी जगह पहुंचना होगा. फिर छह घंटे या उससे ज्यादा वक्त ग्राहकों का इंतजार करना होगा. अगर उस दिन सब सही हुआ तो करीब 150 रुपये मिल जाते हैं. इसके बाद वह शाम को उसी रास्ते से वापस घर लौट जाते हैं. और अगले दिन फिर यही सिलसिला एक बार फिर शुरू हो जाता है.
समीर काका की कहानी इसलिए लोगों को छू रही है क्योंकि इसमें जिंदगी की वह सच्चाई दिखाई देती है, जिसे अक्सर हम नजरअंदाज कर देते हैं. उम्र बढ़ने के साथ हर किसी की परेशानियां खत्म नहीं होतीं. कई लोगों के लिए जिम्मेदारियां उम्र से बड़ी हो जाती हैं. 70 साल के समीर काका के कदम भले ही धीमे पड़ गए हों, पैरों में तकलीफ हो और शरीर पहले जैसा साथ न देता हो, लेकिन परिवार के लिए उनकी मेहनत आज भी जारी है. सड़क पर उनके हाथ में दिखने वाले रंगीन गुब्बारे सिर्फ बच्चों के खिलौने नहीं हैं. उनके लिए यही गुब्बारे घर की रोजी-रोटी हैं. यही वजह है कि हर सुबह वह उन्हें लेकर निकल पड़ते हैं और उम्मीद करते हैं कि आज कुछ ज्यादा गुब्बारे बिक जाएं.
(Disclaimer: प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए शुक्रिया. यह खबर इंटरनेट पर मौजूद डिटेल्स को एकत्रित करके बनाई गई है. Zee News इसके प्रमाणिकता, दावों और सत्यता की पुष्टि नहीं करता है.)