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जमीन छोड़ पेड़ों पर बसाया आशियाना: 140 फीट ऊपर रहती है यह जनजाति, जंगल में शिकार से चलता है गुजारा

इंडोनेशिया के पापुआ के घने जंगलों में कोरोवाई जनजाति का जीवन बाकी दुनिया से काफी अलग है. इस समुदाय के कुछ लोग आज भी जमीन से कई मीटर ऊपर पेड़ों पर घर बनाकर रहते हैं. लकड़ी, बेंत और पत्तों से बने इन घरों में पूरा परिवार रहता है. जंगल ही इनके लिए घर, बाजार और खाने का सबसे बड़ा जरिया है. शिकार, फल, कंद-मूल और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों से इनका जीवन चलता है.

जमीन छोड़ पेड़ों पर बसाया आशियाना: 140 फीट ऊपर रहती है यह जनजाति, जंगल में शिकार से चलता है गुजारा
Image Credit: प्रतीकात्मक AI इमेज

दुनिया के ज्यादातर लोगों के लिए घर का मतलब जमीन पर बनी चार दीवारें हैं. लेकिन पापुआ के जंगलों में रहने वाले कोरोवाई समुदाय के कुछ परिवारों के लिए घर की शुरुआत जमीन से नहीं, बल्कि पेड़ की ऊंची शाखाओं से होती है.

घने जंगल के बीच 15 से 20 मीटर तक ऊंचे पेड़ों पर बने ये घर पहली नजर में किसी फिल्म का सेट लग सकते हैं. लेकिन कोरोवाई लोगों के लिए यह कोई रोमांचक एडवेंचर नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली का हिस्सा है.

आखिर इतनी ऊंचाई पर क्यों रहते हैं?

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, पेड़ों पर घर बनाने के पीछे कई वजहें बताई जाती हैं. घने जंगल में जमीन पर सांप और दूसरे जंगली जानवरों का खतरा रहता है. ऊंचाई पर घर होने से इस जनजाति का परिवार ऐसे खतरों से कुछ हद तक बचा रहता है. इसके अलावा, कोरोवाई समुदाय की मान्यताओं का भी उनके घरों की बनावट पर असर है. कुछ मान्यताओं के मुताबिक, जमीन पर मौजूद खतरों के साथ-साथ बुरी आत्माओं से बचने के लिए भी ऊंचाई को सुरक्षित माना जाता है. इसका मतलब उनके लिए पेड़ सिर्फ घर बनाने की जगह नहीं है. वह सुरक्षा, परंपरा और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है.

घर बनाने में माहिर हैं ये लोग

इतनी ऊंचाई पर घर बनाना आसान काम नहीं है. कोरोवाई लोग जंगल में मिलने वाली चीजों का इस्तेमाल करके अपने घर तैयार करते हैं. लकड़ी, बेंत और पेड़ों के पत्तों जैसी प्राकृतिक चीजें इसमें काम आती हैं. पेड़ की मजबूत शाखाओं को आधार बनाकर फर्श तैयार करते हैं. उसके बाद ऊपर दीवार और छत बनाई जाती है. पूरी संरचना को इस तरह तैयार किया जाता है कि वह ऊंचाई पर टिक सके. इसकी सबसे खास बात यह है कि ये लोग यह काम आज की मशीनों के बिना करते हैं. पीढ़ियों से चली आ रही जानकारी और अनुभव इस काम में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं.

जंगल ही इनका सबसे बड़ा सहारा

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोवाई लोगों की जिंदगी जंगल से जुड़ी हुई है. खाने से लेकर घर बनाने के सामान तक, उनकी कई जरूरतें आसपास के जंगल से पूरी होती हैं. ये लोग आज भी शिकार करते हैं और जंगल में मिलने वाले फल, कंद-मूल तथा दूसरी खाने वाली चीजों पर निर्भर रहते हैं. कई परिवारों के लिए सागो पाम भी खाने का एक अहम स्रोत है. यही वजह है कि जंगल इनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं है. उनके लिए यही खेत है, यही बाजार है और यही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का आधार है.

शिकार और खाना जुटाने का काम

परंपरागत तौर पर समुदाय में काम अलग-अलग तरह से बांटे जाने की बात कही जाती है. पुरुष शिकार और जंगल से भोजन जुटाने जैसे कामों में हिस्सा लेते हैं, जबकि महिलाएं घर और बच्चों की देखभाल से जुड़े काम संभालती हैं. हालांकि, कोरोवाई समाज को एक ही तस्वीर में बांधकर देखना ठीक नहीं होगा. अलग-अलग परिवारों और इलाकों में उनकी जीवनशैली में बदलाव देखने को मिल सकता है. जंगलों के बाहर की दुनिया से संपर्क बढ़ने के साथ उनके रहन-सहन में भी बदलाव आया है.

क्या सच में हजारों साल से ऐसे ही रह रहे हैं?

कोरोवाई लोगों को अक्सर दुनिया की उन जनजातियों में गिना जाता है, जिनकी पारंपरिक जीवनशैली मॉडर्न समाज से काफी अलग रही है. पेड़ों पर घर बनाने की उनकी परंपरा ने दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींचा है. हालांकि, उन्हें सीधे 'पाषाणकाल में जीने वाले लोग' कहना सही नहीं होगा. यह एक आधुनिक मानव समुदाय है, जिसके पास अपनी अलग संस्कृति, तकनीक और सामाजिक व्यवस्था है. जंगल में रहना या पारंपरिक तरीके अपनाना किसी समुदाय को अतीत का इंसान नहीं बना देता.

नरभक्षियों को लेकर भी रही चर्चा

कोरोवाई समुदाय को लेकर सबसे ज्यादा सनसनीखेज बातें उनकी कथित नरभक्षी परंपराओं को लेकर कही जाती रही हैं. कुछ पुरानी रिपोर्टों और बाहरी लोगों के दावों में ऐसे आरोप सामने आए हैं. लेकिन इस विषय को लेकर बहुत सावधानी जरूरी है. कोरोवाई समुदाय के बारे में कई कहानियां बाहरी लोगों की रिपोर्टिंग और पुराने दावों पर आधारित हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि हर मामले में नहीं हुई है. इसलिए पूरे समुदाय को नरभक्षी बताना गलत और भ्रामक होगा. आज कोरोवाई समाज के कई लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क भी है और उनकी जिंदगी पहले की तुलना में बदल रही है.

बदल रही है पेड़ों पर रहने की जिंदगी

समय के साथ जंगलों में रहने वाले समुदायों का आधुनिक दुनिया से संपर्क बढ़ा है. सड़क, बाजार, स्कूल और दूसरे इलाकों से संपर्क ने उनकी जिंदगी में कई बदलाव किए हैं. इसी वजह से हर कोरोवाई परिवार आज पेड़ के ऊपर ही रहता हो, ऐसा नहीं है. पेड़ों पर बने घर उनकी पारंपरिक पहचान का एक हिस्सा हैं, लेकिन समुदाय की पूरी जिंदगी को सिर्फ इन्हीं घरों तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा.

फिर भी दुनिया को क्यों आकर्षित करते हैं ये घर?

कोरोवाई लोगों के पेड़ों पर बने घरों की तस्वीरें इसलिए खास लगती हैं, क्योंकि शहरों में रहने वाले लोगों के लिए ऐसी जिंदगी की कल्पना करना भी मुश्किल है. जहां हम जमीन पर घर बनाने के लिए सीमेंट, सरिया और मशीनों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं यहां जंगल की चीजों से ऊंचाई पर रहने की जगह तैयार की जाती है. इन घरों को देखकर एक बात साफ समझ आती है कि इंसान ने अलग-अलग जगहों और हालात के हिसाब से रहने के कितने तरीके खोजे हैं.

पेड़ों पर बसे घरों की कहानी

कोरोवाई जनजाति की जिंदगी हमें जंगल और इंसान के रिश्ते की एक अलग तस्वीर दिखाती है. उनके लिए जंगल कोई ऐसी जगह नहीं, जहां सिर्फ कभी-कभार जाया जाए. यही उनका घर है और यहीं से खाने-पीने से लेकर रहने तक की कई जरूरतें पूरी होती हैं. पेड़ों पर बने घर उनकी पहचान का सबसे दिलचस्प हिस्सा जरूर हैं, लेकिन उनकी पूरी कहानी इससे कहीं बड़ी है. बदलती दुनिया के बीच यह समुदाय अपनी पुरानी परंपराओं और नए बदलावों के बीच आगे बढ़ रहा है. शायद यही वजह है कि पापुआ के जंगलों में ऊंचे पेड़ों पर बने ये घर आज भी दुनिया भर के लोगों की उत्सुकता का कारण बने हुए हैं.

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About the Author

Santosh Kumar Mishra

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संतोष मिश्रा जी न्यूज में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. वह पिछले 4.5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं. ट्रैवल, फीचर, ऑफबीट, ट्रेंडिंग और वायरल खबरों के साथ-साथ टेक और साइंस से जुड़ी खबरों में भी उनकी विशेष विशेषज्ञता है. उनकी खबरें अपनी विश्वसनीयता और सटीक जानकारी के लिए जानी जाती हैं. आसान और सहज भाषा में लिखे गए उनके कंटेंट को पाठक काफी पसंद करते हैं. सोशल मीडिया की दुनिया (Instagram, X, Reddit, Threads और Facebook) पर उनकी अच्छी पकड़ है. वह ट्रेंडिंग विषयों पर लगातार नजर रखते हैं और फ्रेश व यूनिक खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं. संतोष मिश्रा इससे पहले News Nation और India Ahead जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में भी काम कर चुके हैं. उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) किया है.
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