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विदेश की यात्रा अक्सर नई जगहों, नई सड़कों और अलग तरह के अनुभवों से भरी होती है. लेकिन कभी-कभी सफर का एक छोटा सा झटका पूरी ट्रिप का प्लान बिगाड़ देता है. ऐसा ही कुछ भारतीय डॉक्टर गरिमा चौहान के साथ हुआ, जब वह यूरोप ट्रिप के दौरान फ्रांस में बस से सफर कर रही थीं.
गरिमा ने अपने इंस्टाग्राम वीडियो में बताया कि वह पेरिस जा रही थीं. इसके लिए उन्होंने फ्लिक्सबस बुक की थी. सफर ठीक चल रहा था, लेकिन सुबह करीब 4 बजे बस अचानक खराब हो गई. इसके बाद बस को एक पेट्रोल पंप पर रोकना पड़ा.
डॉक्टर गरिमा ने वीडियो में बताया कि जब उन्होंने अपनी बात रिकॉर्ड की, तब सुबह के करीब 10 बज चुके थे. इसका मतलब है कि बस खराब हुए लगभग 6 घंटे बीत चुके थे. लेकिन न तो पुरानी बस ठीक हो पाई थी और न ही यात्रियों के लिए दूसरी बस का इंतजाम हुआ था. उन्होंने बताया कि वह पेट्रोल पंप पर ही फंसी हुई थीं. सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि उनके आगे की पूरी यात्रा का प्लान इस देरी की वजह से बिगड़ने लगा था. उनके लिए यह सिर्फ बस खराब होने की परेशानी नहीं थी. यूरोप ट्रिप का पूरा शेड्यूल बना हुआ था और एक जगह पर घंटों रुक जाने का असर आगे के पूरे कार्यक्रम पर पड़ रहा था.
इस इंतजार के बीच गरिमा को भारत की याद आई. उन्होंने कहा कि अगर यही बस भारत में खराब हुई होती तो शायद कोई न कोई मैकेनिक आसपास से मिल जाता और गाड़ी जल्दी ठीक हो जाती. उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि भारत में लगभग हर इलाके में मैकेनिक मिल जाते हैं. कई बार तो ड्राइवर खुद भी गाड़ी की छोटी-मोटी खराबी समझ लेता है. उनके अनुसार, यही वजह है कि भारत में ऐसी स्थिति में लोग ज्यादा देर तक फंसे रहने के बजाय किसी तरह रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं. हालांकि, डॉक्टर की यह बात किसी वैज्ञानिक तुलना के तौर पर नहीं थी. वह अपने पर्सनल अनुभव के आधार पर भारत और यूरोप में काम करने के तरीके का फर्क बता रही थीं.
गरिमा ने इस घटना को भारत की 'ग्राइंड कल्चर' यानी लगातार काम करते रहने की आदत से जोड़ दिया. उनका कहना था कि भारत में लोग देर रात तक काम करने, अचानक आई परेशानी से निपटने और किसी न किसी तरीके से काम निकालने के आदी हो गए हैं. उन्होंने कहा कि भारत में रात के वक्त भी कई तरह की सर्विस मिल जाती हैं. कोई मैकेनिक देर रात बुलाने पर आ सकता है, कोई दुकानदार मदद कर सकता है या कोई ड्राइवर खुद ही छोटी समस्या ठीक करने की कोशिश कर सकता है. यही चीज विदेश में उन्हें अलग लगी. वहां काम करने के घंटे ज्यादा तय होते हैं और हर व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह अपनी ड्यूटी खत्म होने के बाद भी तुरंत काम पर लौट आए.
बस कंपनी की तरफ से यात्रियों को हुई परेशानी के लिए 10 यूरो का वाउचर दिया गया. लेकिन गरिमा के मुताबिक, असली नुकसान सिर्फ उस वाउचर से पूरा नहीं हो सकता था. उनकी चिंता यह थी कि बस की देरी की वजह से उनकी पूरी ट्रिप और आगे का शेड्यूल प्रभावित हो रहा था. जिस समय उन्हें पेरिस पहुंचकर अपनी यात्रा आगे बढ़ानी थी, उस समय वह अभी भी बस के इंतजार में थीं. यही वजह थी कि उन्हें लगा कि भारत में ऐसी स्थिति शायद इतनी परेशान करने वाली नहीं होती, क्योंकि वहां लोग किसी भी वक्त समस्या का कोई न कोई रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं.
अपने पोस्ट के कैप्शन में गरिमा ने लिखा कि भारतीयों की काम करने की आदत थोड़ी अलग है. हम बचपन से लोगों को लंबे घंटे काम करते, रात में सफर करते और अचानक आई दिक्कतों से किसी तरह निकलते देखते आए हैं. उनका कहना था कि भारत में रात के किसी भी समय कोई परेशानी आ जाए तो लोगों को यह उम्मीद रहती है कि कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा. इसी वजह से सुबह 4 बजे बस खराब होने जैसी स्थिति भी भारतीयों को शायद उतनी असहाय महसूस नहीं कराती. उन्होंने यह भी माना कि इस तरह की लगातार भागदौड़ वाली जिंदगी के नुकसान भी हैं. लेकिन मुश्किल आने पर चलते रहने और तुरंत समाधान खोजने की आदत इसका एक हिस्सा जरूर है.
गरिमा की बात सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की राय दो हिस्सों में बंटी नजर आई. कुछ लोगों ने कहा कि भारत में सेवाएं जल्दी मिल जाने के पीछे लोगों की मेहनत और उपलब्धता है. वहीं कई यूजर्स ने कहा कि यूरोप में काम के तय घंटे और वर्क-लाइफ बैलेंस को ज्यादा महत्व दिया जाता है. एक यूजर ने लिखा कि यूरोप में ड्यूटी खत्म होने के बाद कर्मचारी अपनी निजी जिंदगी को समय देते हैं. इसलिए रात के समय मैकेनिक का मिल जाना वहां असामान्य बात नहीं है. एक दूसरे यूजर ने इसी बात को विकासशील और विकसित देशों के बीच फर्क से जोड़ दिया. उसका कहना था कि भारत में चीजें जल्दी ठीक हो जाती हैं, लेकिन कई बार जल्दबाजी में सेफ्टी को नजरअंदाज करने का खतरा भी रहता है.
सोशल मीडिया पर एक कमेंट ने इस पूरी बहस का दूसरा पहलू सामने रखा. यूजर ने कहा कि भारत में बस जल्दी ठीक हो सकती है, लेकिन कई बार 'चल जाएगा' वाली सोच खतरा भी पैदा कर सकती है. वहीं पश्चिमी देशों में लोग सुरक्षा के मामले में ज्यादा सावधानी बरतते हैं. यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि किसी गाड़ी को खराब होने के बाद तुरंत सड़क पर उतार देना और उसे पूरी तरह जांचने के बाद चलाना, दोनों में फर्क है. ऐसे मामलों में सिर्फ यह देखना काफी नहीं कि काम कितनी जल्दी हुआ. यह भी देखना जरूरी है कि काम सुरक्षित तरीके से हुआ या नहीं.
गरिमा के वीडियो पर कई लोगों ने उनके अनुभव से सहमति जताई. कुछ ने भारत की जुगाड़ वाली सोच और हर समय उपलब्ध रहने वाली सर्विस की तारीफ की. एक यूजर ने तो सीधे लिखा, 'ईस्ट हो या वेस्ट, इंडिया इज द बेस्ट.' हालांकि, कुछ लोगों ने भारत में मिलने वाली सस्ती लेबर और लंबे काम के घंटों को भी इस अंतर की वजह बताया. मतलब सोशल मीडिया पर बहस सिर्फ भारत बनाम यूरोप तक सीमित नहीं रही, बल्कि काम के घंटे, कर्मचारियों के अधिकार, सुरक्षा और जिंदगी जीने के तरीके तक पहुंच गई.
(Disclaimer: प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए शुक्रिया. यह खबर इंटरनेट पर मौजूद डिटेल्स को एकत्रित करके बनाई गई है. Zee News इसके प्रमाणिकता, दावों और सत्यता की पुष्टि नहीं करता है.)