किंग कोबरा के 4 भाई, चारों 'तबाही'! एक डंक में 30 लोगों का कर सकते हैं खात्मा! 6 मीटर लंबा ये सांप है बेहद ज़हरीला
King Cobra Latest Research: बहुत कम लोगों को पता होगा कि दुनिया में किंग कोबरा की 4 प्रजातियां पाई जाती हैं. ये चारों प्रजातियां बेहद खतरनाक हैं. अपने एक डंक से ये 30 लोगों का खात्मा कर सकते हैं.
How Many People King Cobra Can Kill in Single Bite? सांपो की तस्वीर देखकर आमतौर पर डर लगता है. मगर इंसानों का यही डर सांपो के लिए काल बन जाता है. इस डर में इंसान विषहीन सांप को भी जहरीला समझकर मार डालता है. जबकि दुनिया भर के सांपों की प्रजातियों में 25 फीसदी ही जहरीले होते हैं.
दुनिया का सबसे लंबा औऱ विषैला सांप होता है किंग कोबरा. इसका आकार-प्रकार ऐसा, कि इसे देखते ही इंसान की जान निकल जाए. लेकिन आज डरिए मत, किंग कोबरा पर आधारित इस रिपोर्ट से अपना डर भगाइए. असल में कोबरा आक्रामक नहीं, बल्कि एकांत प्रेमी सांप होता है. इसे यूं समझिए कि इंसान को देखकर भागने वाला, मतलब एक तरह से डरपोक.
हमारा राष्ट्रीय रेप्टाइल है किंग कोबरा
किंग कोबरा हमारा नेशनल रेप्टाइल भी है. यानी राष्ट्रीय सरीसृप. लेकिन आज की रिपोर्ट में एक चौंकाने वाली स्टडी आपके सामने लेकर आए हैं. अब तक हम यही जानते हैं, कि पूरी दुनिया में किंग कोबरा के 40 प्रकार पाए जाते हैं. लेकिन ये 40 प्रकार 4 परिवारों में बंटे हुए हैं. यानी पूरी दुनिया में किंग कोबरा की 4 प्रजातियां हैं.
ये 4 प्रजातियां, यानी किंग कोबरा के 4 भाई. सभी भाइयों का रंग-रूप और व्यवहार अलग. जैसा हम इंसानों के साथ होता है. लेकिन किंग कोबरा को लेकर ये रिसर्च आखिर क्यों अहम है, हमारे इको सिस्टम के लिए? सांपों की सुरक्षा के लिए और सांपों से हमारी सुरक्षा के लिए. ये पूरी डिटेल समझिए आज की स्पेशल एक्सप्लेनर रिपोर्ट से.
डॉ. पी गौरीशंकर देश ही नहीं, दुनिया के जाने माने हर्पेटोलॉजिस्ट, यानी सर्पजीव संरक्षक हैं. डॉ. गौरीशंकर के नाम सबसे लंबे किंग कोबरा को पकड़ने और बचाने का रिकार्ड है. इसके लिए अपनी जान पर खेल जाते हैं और ऐसे पकड़ते हैं, जैसे किंग कोबरा नहीं, बच्चों का खिलौना हो.
किंग कोबरा पर आई नई रिसर्च में डॉक्टर गौरीशंकर का जिक्र इसलिए, क्योंकि यही वो शख्स हैं, जिन्होंने ये पता किया, कि किंग कोबरा किसी एक प्रजाति का हिस्सा नहीं, बल्कि इसकी चार प्रजातियां हैं.
एक-दूजे से अलग हैं कोबरा की 4 प्रजातियां
12 साल की रिसर्च में पता चला कि 4 प्रजातियां एक दूसरे से अलग हैं. डॉ पी गौरीशंकर उस रिसर्च टीम को लीड कर रहे थे, जिसने 12 साल तक दुनिया के अलग अलग हिस्सों में किंग कोबरा की प्रजातियों पर नजर रखी. उनके विष और उनके व्यावहार की स्टडी की.
आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि इस स्टडी की शुरूआत एक हादसे से हुई थी. दरअसल एक रेस्क्यू ऑपरेशन में किंग कोबरा ने डॉ. गौरीशंकर को डंस लिया. उन्हें समय पर एंटीवेनम भी मिल गया. लेकिन वो एंटीवेनम उस कोबरा के जहर के लिए नहीं था, जिसने उन्हें डंसा था..
<pre><code class="language-java">डॉ. गौरीशंकर बताते हैं, 'उस एंटीवेनम ने काम नहीं किया और मैं मरते मरते बचा. तब मैंने फैसला किया कि हमें ये जरूर पता करना होगा कि किंग कोबरा की कितनी अलग प्रजातियां हैं. कितने अलग समूह हैं. अगर हमें ये पता होगा कि हां ये अलग प्रजातियां हैं. तभी हम हर प्रजाति के लिए सटीक एंटीवेनम बना सकते हैं.'
एंटीवेनम लगवाने पर क्यों मर जाते हैं हजारों लोग?
आपने ये कहावत जरूर सुनी होगी- जहर को जहर ही काटता है. ठीक इसी तरह अगर कोबरा की एक प्रजाति ने काटा है, तो दूसरी प्रजाति के जहर से बना एंटीवेनम काम नहीं करेगा. दुनिया भर में हजारों मौत एंटीवेनम में इसी गड़बड़ी की वजह से होती है. लेकिन डॉ. पी. गौरीशंकर ने इस गड़बड़ी का आसान उपाय निकाल लिया. उनकी अगुवाई वाली वैज्ञानिकों की टीम ने दुनिया के सबसे लंबे, सबसे विषैले सांप की पूरी कुंडली ही निकाल ली.
किंग कोबरा को इतने करीब से देखना अपने आप में जोखिम भऱा काम है. इसलिए इस दिलचस्प सरीसर्प के बारे में पिछले 200 साल से यही राय बनी रही कि सभी किंग कोबरा एक ही प्रजाति- ओफियोफैगस हन्ना- के वंशज हैं.
लेकिन ऐसा नहीं है. अगर आप किंग कोबरा को उपरी तौर पर भी देखें, तो इनमें फर्क साफ दिख जाएगा. लंबाई में, मोटाई में और कई बार स्किन कलर में भी. इसके अलावा हर प्रजाति के किंग कोबरा का शारीरिक व्यवहार और जहर की तीव्रता भी अलग होती है. ये डॉ. गौरीशंकर एंड टीम की 12 साल लंबी रिसर्च में पता चला.
किंग कोबरा के 4 भाई, चारों 'तबाही'
1. नॉर्थ किंग कोबरा- ओफियोफैगस हन्ना
ये उत्तर भारत, दक्षिणी चीन, दक्षिण पूर्व एशिया में पाए जाते हैं.
2. सुंडा किंग कोबरा- ओफियोफैगस बंगारस
ये मलय प्रायद्वीप, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में मिलते हैं.
3. वेस्टर्न घाट किंग कोबरा- ओफियोफैगस कलिंगा
ये प्रजाति भारत के पश्चिमी घाट तक ही सीमित है.
4. लूजॉन किंग कोबरा- ओफियोफैगस साल्वाटाना
ये प्रजाति सिर्फ फिलीपींस के मुख्य द्वीप लूजोन में मिलती है.
केवल भारत में मिलती है कोबरा की ये प्रजाति
यूरोपीय जर्नल ऑफ टैक्सोनॉमी में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक, किंग कोबरा की ये सभी प्रजातियां लाखों वर्षों से एक-दूसरे से अलग-थलग होकर स्वतंत्र रूप से विकसित हुई हैं.
रिसर्च के मुताबिक अलग अलग क्षेत्रों में किंग कोबरा के शरीर का रंग, पैटर्न और आकार अलग अलग होता है. कहीं ये पांच से 7 फीट लंबे होते हैं, तो कहीं 10 से 12 फीट तक लंबे होते हैं. इसी तरह इनका वजन भी प्रजाति के आधार के हिसाब से भिन्न होता है. किंग कोबरा की एक प्रजाति ऐसी है, जो सिर्फ भारत में पाई जाती है.
हमारी स्पेशल रिपोर्ट का दुर्लभ सर्प यही ओफियोफैगस कलिंगा प्रजाति का कोबरा है. पश्चिमी घाट के पूरे क्षेत्र में इस कोबरा को कलिंगा सर्प कहा जाता है. ये खासतौर पर केरल, कर्नाटक और उत्तरी तमिलनाडु के जंगलों में पाया जाता है.
‘कलिंगा सर्प’, घोंसला बनाने वाला अनूठा कोबरा
जैसा कि हमने आपको पहले बताया, कोबरा की पूरी प्रजाति इंसानों से दूर भागती है. कलिंगा कोबरा उसके एक कदम आगे चलता है. इस प्रजाति की मादा कोबरा अंडे देने से पहले ना सिर्फ पत्तों और टहनियों से घोंसला बनाती है, बल्कि अंडे से बच्चे निकलने के बाद 100 दिनों तक एक ही जगह बनी रहती है. इस दौरान उसे कोई शिकार न मिले, भूखा रहना पड़े, तो भी वो तीन महीने के करीब कहीं हिलती नहीं है.
वैज्ञानिक अध्ययन ये बताते हैं कि भारत के पश्चिमी घाट का पहाड़ी क्षेत्र कलिंगा कोबरा को इसलिए भाता है, क्योंकि यहां के जंगल घने हैं, वातावरण नम और तापमान ठंडा है. तभी दुनिया का सबसे लंबा विषैला कोबरा यहां के जंगलों में रहता है. यहां शिकार, पानी और छिपने की जगह भरपूर मिलती है.
स्थानीय समुदाय कलिंगा सर्प का करता है सम्मान
इस इलाके के कई स्थानीय समुदाय कलिंगा सर्प का सम्मान करते हैं, उनसे डरते या मारते नहीं. स्थानीय परिस्थिति तंत्र में यहां के लोग कोबरा की अहमियत समझते हैं, इसलिए पूरे क्षेत्र में कलिंगा कोबरा सुरक्षित महसूस करता है.
इसके अलावा एक और बात पश्चिमी घाट में कलिंगा कोबरा के पक्ष में जाती है. यहां इनके संरक्षण के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं अभियान चलाती हैं, कुछ सर्पमित्र भी इनके हेबिटाट को बहाल करने में जुटे हैं. क्योंकि अभी कुछ महीने पहले पश्चिमी घाट से कलिंगा कोबरा के विस्थापन की खबरें आई थी.
कुछ कोबरा ट्रेनों के जरिए हजारों किलोमीटर दूर निकल आए थे. यानी अपने मूल निवास से बिलकुल अलग वातावरण में. ये कोबरा की दुर्लभ प्रजाति के लिए बेहद खतरनाक बात है. रिपोर्ट के इस हिस्से में समझिए, किंग कोबरा जैसे जहरीले सर्प का हमारे इको सिस्टम में बने रहना क्यों जरूरी है.
पूरी दुनिया में कोबरा के 40 प्रकार हैं. ये प्रजातियां नहीं, बल्कि 4 अलग अलग प्रजातियों की वंशबेल है. ये अंटार्कटिका और रेगिस्तान जैसे इलाकों को छोड़कर तकरीबन हर महादेश में पाए जाते हैं. इनमें से 3 प्रजातियां भारत में पाई जाती है. कलिंगा कोबरा इन तीनों प्रजातियों में सबसे दुर्लभ है.
क्यों दुर्लभ है कलिंगा कोबरा?
इसकी लंबाई 6 मीटर तक होती है. इसके अंदर विष की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. एक बार में निकले विष से 30 लोगों की मौत हो सकती है. कोबरा दूसरे जहरीले सांपो को खाकर उनकी आबादी सीमित करते हैं. मेंढक, चूहों और कीटों का शिकार कर कृषि को नुकसान से बचाते हैं. कोबरा की मौजूदगी की वजह से जंगलों की कटाई कम होती है, जिससे पर्यावरण संतुलित रहता है.
लेकिन पश्चिमी घाट से लेकर हिमालय की तराई तक इन दुर्लभ जीवों के प्राकृतिक निवास जंगलों की कटाई अंधाधुंध हो रही है. वैज्ञानिकों का अनुमान है, कि कोबरा इन घटनाओं से असुरक्षित और भ्रमित हो रहे हैं. इसी वजह से अपने मूल निवास से दूर भाग रहे हैं और कई बार रिहायशी इलाकों में भी घुस आते हैं. ऐसा होना किंग कोबरा और इंसानी आबादी, दोनों के लिए खतरनाक हो जाता है.