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कभी-कभी इंसान कोई ऐसा फैसला कर लेता है, जिसे सुनकर बाकी लोग उसे पागलपन समझ बैठते हैं. ब्रिटेन के कार्ल बुशबी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. साल 1998 में जब वह करीब 29 साल के थे, तब उन्होंने दक्षिण अमेरिका के चिली से एक ऐसी यात्रा शुरू की, जिसमें उन्हें पूरे रास्ते पैदल चलते हुए अपने घर तक पहुंचना था.
उनका लक्ष्य था कि वह दुनिया का चक्कर लगाकर इंग्लैंड के हल शहर में अपनी मां के घर पहुंचेंगे. इस सफर को उन्होंने 'गोलियथ एक्सपीडिशन' नाम दिया था. शुरुआत में उन्हें लगा था कि यह काम करीब 12 साल में पूरा हो जाएगा. लेकिन रास्ते की मुश्किलों ने इस यात्रा को 28 साल लंबा कर दिया. अंत में 57 साल की उम्र में जब वह अपनी मां के घर लौटे तो भावुक मुलाकात देखने वालों की आंखें भी नम हो गईं.
AP की रिपोर्ट के अनुसार, कार्ल ने 1 नवंबर 1998 को चिली के पुंटा एरेनास से अपना सफर शुरू किया था. इसके बाद वह करीब 50 हजार किलोमीटर की दूरी तय करते हुए चार महाद्वीपों और 30 देशों से गुजरे. इस यात्रा में उनके सामने रेगिस्तान, घने जंगल, पहाड़ और बर्फ से ढके इलाके आए. कई बार ऐसे हालात बने, जहां आगे बढ़ने का मतलब अपनी जान खतरे में डालने जैसा था. लेकिन उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला. अपने इस सफर के लिए कार्ल ने दो सख्त नियम बनाए थे. पहला, आगे बढ़ने के लिए किसी भी तरह के ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल नहीं करेंगे. दूसरा, जब तक पैदल चलते हुए अपने घर नहीं पहुंचेंगे, तब तक वापस नहीं लौटेंगे.
कार्ल का यह सफर सिर्फ लंबा नहीं था, बल्कि कई बार जानलेवा भी साबित हुआ. दक्षिण और मध्य अमेरिका के बीच मौजूद डेरियन गैप के खतरनाक जंगलों से गुजरना उनके लिए बड़ी चुनौती था. पेरू में उन पर भीड़ ने हमला किया. एक बार उनका सामना ध्रुवीय भालू से भी हुआ. 2006 में उन्होंने अमेरिका के एडवेंचरर दिमित्री कीफर के साथ बेरिंग स्ट्रेट पार करने की कोशिश की. यह इलाका बर्फीले पानी और बदलती बर्फ की चादरों के लिए जाना जाता है. इस दौरान वह ठंडे पानी में गिर गए और उनकी जान पर बन आई. बाद में उन्हें हेलिकॉप्टर की मदद से सुरक्षित निकाला गया. कैस्पियन सागर पार करना भी आसान नहीं था. कार्ल ने करीब 31 दिन तक फ्लोटिंग और स्विमिंग के मिले-जुले तरीके से इसे पार किया. उन्होंने अपनी इस तकनीक को 'फ्लोटिमिंग' नाम दिया था.
कार्ल ने शुरुआत में सोचा था कि 12 साल में घर पहुंच जाएंगे, लेकिन कई बार ऐसी रुकावटें आईं, जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था. रूस में वीजा से जुड़ी परेशानियों के कारण उन्हें वहां से गुजरने में करीब एक दशक लग गया. 2012 में रूस का वीजा नहीं मिलने पर उन्होंने विरोध का अनोखा तरीका अपनाया. वह लॉस एंजिलिस से पैदल चलते हुए वॉशिंगटन डीसी स्थित रूसी दूतावास तक पहुंच गए. बाद में उन्हें जरूरी कागजात मिले और यात्रा आगे बढ़ सकी. कोरोना महामारी ने भी उनके सफर पर लंबा ब्रेक लगा दिया. इसके अलावा रूस और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक हालात के कारण उन्हें अपना रास्ता बदलना पड़ा. कई बार महीनों तक इंतजार करना पड़ा, लेकिन उन्होंने यात्रा छोड़ने का फैसला नहीं किया.
एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस कहानी का सबसे भावुक पल 2 नवंबर 2026 को आया. इस दिन कार्ल आखिरकार इंग्लैंड के हल शहर में अपनी मां एंजेला के घर पहुंच गए. जिस घर से वह 1998 में निकले थे, वहां उनका स्वागत करने के लिए परिवार, दोस्त, पत्रकार और बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे. घर के बाहर 'वेलकम होम सन' का बैनर लगा था. मां ने बेटे को सामने देखा तो भावुक हो गईं. उन्होंने कार्ल से पूछा कि तुम कहां चले गए थे? इसके बाद दोनों एक-दूसरे के गले लग गए. मां-बेटे की यह मुलाकात 28 साल के इंतजार का सबसे खास पल बन गई. इस दौरान शहर के सिटी हॉल में भी लोगों ने उनका स्वागत किया. कार्ल ने कहा कि उन्हें यहां तक पहुंचाने में पूरी दुनिया के लोगों का योगदान रहा है. वह अपने बेटे और पोती से भी दोबारा जुड़े.
कार्ल ने इस सफर में दुनिया के कई देशों में अनजान लोगों की मदद और मेहमाननवाजी देखी. कहीं लोगों ने उन्हें अपने घर में जगह दी, तो कहीं खाने और मुश्किल वक्त में मदद की. उनका कहना है कि इस यात्रा ने इंसानियत पर उनका भरोसा और मजबूत किया. एक प्रेस इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि जिन लोगों से वह मिले, उनमें से 99.9999 फीसदी ने उन्हें इंसानियत का सबसे अच्छा रूप दिखाया. अब 28 साल की यह यात्रा पूरी हो चुकी है, लेकिन कार्ल के सामने एक नई चुनौती है. इतने लंबे समय तक सड़क पर रहने के बाद सामान्य जिंदगी में लौटना उनके लिए आसान नहीं होगा. उन्होंने पहले माना था कि यात्रा खत्म होने के बाद उन्हें अपनी पहचान और जिंदगी के मकसद को लेकर खालीपन महसूस हो सकता है. फिलहाल उनके पास लोगों को अपने अनुभव सुनाने, किताब पर आगे काम करने और एक डॉक्यूमेंट्री से जुड़ने जैसे काम हैं. लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि 28 साल पहले जिस घर से निकले थे, आखिरकार उसी घर के दरवाजे पर लौट आए.