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क्या आपने कभी सोचा है कि जिस Xbox कंट्रोलर से आप घर में बैठकर वीडियो गेम खेलते हैं उसी से असली जंग में मिसाइलें और ड्रोन गिराए जा सकते हैं? सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म या फिर 'Halo' गेम का सीन लगता है लेकिन अमरीकी सेना ने इसे बिल्कुल सच कर दिखाया है. मिडिल ईस्ट के बेहद संवेदनशील इलाके Strait of Hormuz (होर्मुज जलडमरूमध्य) में अमरीकी सेना ने अपने सबसे आधुनिक हाई-एनर्जी लेजर हथियार (High-Energy Lasers) तैनात कर दिए हैं. सबसे मजेदार बात यह है कि अमरीकी सैनिक इन बेहद खतरनाक लेजर बीम गन्स को किसी कॉम्प्लिकेटेड पैनल से नहीं बल्कि गेमिंग रिमोट यानी Xbox कंट्रोलर से चला रहे हैं. आइए समझते हैं कि आख़िर अमरीका का यह $500 मिलियन का प्रोजेक्ट क्या है और यह कैसे काम करता है.
क्या हैं हाई-एनर्जी लेजर वेपन्स?
New York Post की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अमरीकी रक्षा विभाग (Department of War) ने इस बात की पुष्टि की है कि Strait of Hormuz में हाई-एनर्जी लेजर वेपन्स का इस्तेमाल शुरू हो चुका है. अमरीकी सेना इन लेजर बीम का इस्तेमाल दुश्मन के आने वाले ड्रोन और क्रूज मिसाइलों को तबाह करने के लिए कर रही है. अमरीका इस टेक्नोलॉजी पर पिछले 50 सालों से काम कर रहा था और अब जाकर इसे असली जंग के मैदान में उतारा गया है. यह टेक्नोलॉजी दुनिया की किसी भी दूसरी सेना के पास मौजूद हथियारों से काफी आगे है.
एक्सबॉक्स कंट्रोलर से क्यों चला रहे हैं हथियार?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इतनी महंगी और हाई-टेक लेजर गन को चलाने के लिए गेमिंग रिमोट यानी Xbox कंट्रोलर का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है? अमरीकी सेना का मानना है कि गेमिंग इंडस्ट्री ने पहले ही अरबों डॉलर खर्च करके इंसानी हाथों के लिए सबसे बेस्ट और कम्फर्टेबल कंट्रोलर डिज़ाइन कर लिया है. ऐसे में किसी नए हथियार के लिए नया कंट्रोलर बनाकर पैसे और समय बर्बाद करने की कोई ज़रूरत नहीं है. आज के युवा सैनिकों ने बचपन से Xbox खेला हुआ है इसलिए उन्हें इस लेजर गन को चलाने के लिए किसी लंबी ट्रेनिंग की भी ज़रूरत नहीं पड़ती. जैसा कि डिफेंस एक्सपर्ट्स कहते हैं - अगर आपने गेम में 'स्पार्टन लेजर' चलाया है तो आप असली लाइफ में भी इसे आराम से चला सकते हैं.
कैसे काम करती है यह लेजर गन? साइंस समझें!
आम मिसाइल या गन में लोहे की गोली या एक्सप्लोसिव होता है लेकिन लेजर गन में ऐसा कुछ नहीं होता. यह सिस्टम जनरेटर या हैवी बैटरी पैक्स से ढेर सारी इलेक्ट्रिक एनर्जी खींचता है. इसके बाद उस एनर्जी को 'फोटॉन्स' यानी लाइट पार्टिकल्स में बदल दिया जाता है. फिर इन सारे लाइट पार्टिकल्स को एक बहुत ही पतली और बेहद पावरफुल लेजर बीम में कंसंट्रेट किया जाता है. जब यह लेजर बीम किसी उड़ते हुए ड्रोन या मिसाइल पर पड़ती है तो वह उसकी सतह को इतना ज्यादा गर्म कर देती है कि वो हवा में ही ब्लास्ट हो जाता है या उसके सेंसर्स जलकर राख हो जाते हैं.
करोड़ों की मिसाइल के सामने कुछ पैसों का खर्चा!
अमरीका इस लेजर प्रोजेक्ट पर करीब $500 मिलियन (लगभग 4,797 करोड़ रुपये) खर्च कर रहा है. लेकिन इसके बावजूद इसे बहुत किफायती यानी सस्ता माना जा रहा है. सोचिए अगर दुश्मन 5-10 लाख रुपये का एक सस्ता ड्रोन भेजता है तो उसे गिराने के लिए अमरीका को 10-15 करोड़ रुपये की मिसाइल दागनी पड़ती थी. यह तो अमरीका के लिए बहुत बड़ा घाटे का सौदा था. लेकिन लेजर गन चलाने में सिर्फ़ बिजली का खर्चा आता है जो कि बहुत ही कम है. जब तक गन में पावर सप्लाई है तब तक लेजर बीम से हमले किए जा सकते हैं और इसके एमुनेशन यानी बारूद के खत्म होने का भी कोई डर नहीं रहता.
HELIOS और Boeing CLWS: कितने खतरनाक हैं ये हथियार?
अमरीका ने समुद्र में अपनी नौसेना के जहाजों पर HELIOS (High-Energy Laser with Integrated Optical Dazzler and Surveillance) सिस्टम लगाया हुआ है. यह 60-किलोवाट (60-kW) की पावरफुल लेजर बीम फेंकता है जो सेकेंडों में दुश्मन के ऑब्जेक्ट को पिघला सकती है. इसके अलावा बोइंग (Boeing) कंपनी ने CLWS नाम का एक कॉम्पैक्ट लेजर वेपन भी बनाया है जो ग्रुप-3 कैटेगिरी के बड़े ड्रोन्स को भी मार गिराने में सक्षम है.
मैक्सिको बॉर्डर से लेकर मिडिल ईस्ट तक दबदबा!
इस लेजर टेक्नोलॉजी का टेस्ट सिर्फ मिडिल ईस्ट में ही नहीं बल्कि अमरीका के दक्षिणी बॉर्डर पर मैक्सिको के ड्रग कार्टेल के खिलाफ भी किया जा चुका है. हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी तक इस लेजर बीम का इस्तेमाल सीधे इंसानों पर नहीं किया गया है. इसका मुख्य काम दुश्मन के सर्विलांस ड्रोन्स, आत्मघाती ड्रोन्स और मिसाइलों को हवा में ही नाकाम करना है.
इस नई टेक्नोलॉजी में कमियां क्या हैं?
भले ही यह लेजर वेपन बहुत ही कूल और फ्यूचरिस्टिक लगता है लेकिन इसकी कुछ अपनी सीमाएं भी हैं. पहली बात यह है कि यह सिस्टम बहुत ज्यादा भारी और बड़े होते हैं जिन्हें अभी के लिए सिर्फ बड़े जहाजों या ट्रकों पर ही फिट किया जा सकता है. सैनिक इसे अपनी पीठ पर लादकर नहीं घूम सकते. दूसरी सबसे बड़ी कमी यह है कि लेजर गन को काम करने के लिए बिल्कुल साफ़ आसमान चाहिए. अगर मौसम खराब है धुंध, कोहरा, बारिश या बहुत ज्यादा धूल है तो लेजर बीम की ताक़त कमजोर पड़ जाती है. इसके अलावा अगर दुश्मन एक साथ दर्जनों ड्रोन (Swarm Drones) से हमला कर दे तो लेजर गन सबको एक साथ टारगेट नहीं कर पाती.
फ्यूचर वॉरफेयर का बदला रूप!
चाहे जो भी हो लेकिन अमरीका द्वारा जंग के मैदान में Xbox कंट्रोलर से लेजर वेपन चलाना इस बात का सबूत है कि भविष्य की लड़ाइयाँ बिल्कुल बदलने वाली हैं. अब जंग सिर्फ़ बारूद और तोपों की नहीं रह गई है बल्कि यह लाइट, एनर्जी और सॉफ्टवेयर का खेल बनती जा रही है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि चीन और रूस अमरीका के इस लेजर वेपन का क्या तोड़ निकालते हैं.