)
अगर आप भी सुपरफास्ट इंटरनेट के लिए सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस Starlink का इंतजार कर रहे हैं, तो जल्द आपका इंतजार खत्म होने वाला है! भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू होने का रास्ता अब और साफ हो गया है. दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक समेत कई सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनियां जल्द ही भारत में अपनी सर्विस शुरू कर सकती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, Digital Communications Commission यानी DCC ने TRAI की सैटेलाइट स्पेक्ट्रम से जुड़ी ज्यादातर सिफारिशों को मंजूरी दे दी है. इसके बाद सरकार के लिए सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनियों को कमर्शियल सर्विस के लिए स्पेक्ट्रम देने का रास्ता साफ हो गया है.
मनीकंट्रोल और ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, DCC ने बीते सप्ताह TRAI की सिफारिशों को मंजूरी दी. DCC, DoT का सबसे बड़ा फैसला लेने वाला निकाय है. अब DoT इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय कैबिनेट के पास भेज सकता है.
इस फैसले से स्टारलिंक अमेजन लियो, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशन जैसी कंपनियों को भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू करने में मदद मिलेगी. हालांकि, इन कंपनियों को अभी सुरक्षा से जुड़ी मंजूरी लेनी होगी. इसके बाद ही वे भारत में कमर्शियल सर्विस शुरू की जा सकेगी.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विस के लिए स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू यानी AGR का 5 प्रतिशत रखा गया है. वहीं, चिन्हित ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में सर्विस देने वाले ऑपरेटरों के लिए यह प्रभावी चार्ज 4 प्रतिशत हो सकता है.
TRAI ने पहले 4 प्रतिशत AGR के हिसाब से स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज की सिफारिश की थी. इसके साथ ही नॉन जियोस्टेशनरी ऑर्बिट यानी NGSO सैटेलाइट सर्विस के लिए हर शहरी कस्टमर्स पर सालाना 500 रुपये का अतिरिक्त चार्ज लगाने का सजेशन दिया गया था. ग्रामीण और दूरदराज के कस्टमर्स को इस अतिरिक्त चार्ज से बाहर रखने की बात कही गई थी.
हालांकि, DoT ने प्रति कस्टमर्स चार्ज लगाने के प्रस्ताव को रद्द कर दिया. DoT का मानना था कि ग्रामीण और शहरी ग्राहकों के बीच अंतर करना मुश्किल होगा. इसके साथ ही ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में सैटेलाइट टर्मिनल खरीदने के लिए सब्सिडी देने का प्रस्ताव भी स्वीकार नहीं किया गया. TRAI के अनुसार, सैटेलाइट इंटरनेट कनेक्शन के लिए इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर की शुरुआती कीमत लगभग 20,000 से 50,000 रुपये तक हो सकती है. ऐसे में ग्रामीण और कम सुविधा वाले इलाकों में यह कीमत ग्राहकों के लिए बड़ी बाधा बन सकती है.
DCC की मंजूरी मिलने के बाद भी स्टारलिंक समेत दूसरी कंपनियों के लिए भारत में सर्विस शुरू करने से पहले सुरक्षा मंजूरी जरूरी है. अधिकारियों के मुताबिक, Global Mobile Personal Communication by Satellite लाइसेंस रखने वाली कंपनियों को सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी. साथ ही गृह मंत्रालय और दूसरी एजेंसियों की ओर से उठाई गई चिंताओं का समाधान भी करना होगा.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, किसी एक सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन से दिल्ली जैसे बड़े शहर में लगभग 10,000 से 20,000 कनेक्शन ही मिल सकते हैं, जबकि वहां करीब 50 लाख ब्रॉडबैंड कनेक्शन मौजूद हैं. इसलिए स्टारलिंक जैसी सर्विस का बड़ा फोकस बड़े शहरों के बजाय उन इलाकों पर रहने की उम्मीद है, जहां फाइबर इंटरनेट पहुंचाना मुश्किल है और मोबाइल टावर कम हैं.
स्टारलिंक के लिए भारत में एक और चुनौती उसकी 100 प्रतिशत विदेशी हिस्सेदारी है. कंपनी ने हाल ही में भारत के स्पेस रेगुलेटर IN-SPACe के पास Gen 2 सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन की मंजूरी के लिए फिर से अप्लाई किया है. कंपनी लगभग 30,000 लो अर्थ ऑर्बिट यानी LEO सैटेलाइट के लिए मंजूरी चाहती है. इस कॉन्स्टेलेशन में डायरेक्ट टू डिवाइस सुविधा भी शामिल हो सकती है.
मस्क लगातार भारत में स्टारलिंक सर्विस शुरू करने में दिलचस्पी दिखाते रहे हैं. पिछले महीने उन्होंने X पर कहा था कि स्टारलिंक भारत में खासकर ग्रामीण इलाकों में उन लोगों की मदद कर सकता है, जिन्हें अभी अच्छी इंटरनेट सर्विस नहीं मिल रही है.
अब DCC की मंजूरी के बाद भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू करने की प्रक्रिया एक कदम आगे बढ़ गई है. हालांकि Starlink और दूसरी कंपनियों को कमर्शियल लॉन्च से पहले अभी सुरक्षा और दूसरी जरूरी मंजूरियां हासिल करनी होंगी.