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5 साल की यात्रा: धरती-चांद-तारे कैसे बने? ये जानने के लिए NASA के स्‍पेसक्राफ्ट ने तय किया 3.5 अरब KM का सफर

NASA के Lucy स्पेसक्राफ्ट ने बृहस्पति के ट्रोजन एस्टेरॉयड क्षेत्र में पहुंचकर रचा इतिहास. जानिए सौरमंडल के इन अनसुने रहस्यों और पूरे मिशन की पूरी कहानी...

5 साल की यात्रा: धरती-चांद-तारे कैसे बने? ये जानने के लिए NASA के स्‍पेसक्राफ्ट ने तय किया 3.5 अरब KM का सफर
Image Credit: इस ऐतिहासिक मिशन की शुरुआत 16 अक्टूबर 2021 को हुई थी.

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसके बारे में जानकर आपका दिमाग घूम जाएगा. नासा का फेमस स्पेसक्राफ्ट 'ल्यूसी' (Lucy) ऑफिशियल तौर पर अंतरिक्ष के उस रहस्यमयी इलाके में एंट्री मार चुका है, जहां आज तक इंसानों का भेजा कोई भी यान नहीं पहुंच पाया था. इस स्पेसक्राफ्ट ने स्पेस में पूरे 2.2 अरब मील यानी करीब 3.5 अरब किलोमीटर से भी ज्यादा की लंबी दूरी तय की है. इस ऐतिहासिक मिशन की शुरुआत 16 अक्टूबर 2021 को हुई थी. तब से लेकर आज तक यह यान बिना थके, अकेले ही अंतरिक्ष की गहराइयों में आगे बढ़ता जा रहा है. अब जाकर यह उस जगह पर पहुंचा है जहां हमारे सोलर सिस्टम के बनने के सबसे पुराने राज छिपे हुए हैं.

क्या है Jupiter का ट्रोजन एस्टेरॉयड जोन?
जुपिटर हमारे सोलर सिस्टम का सबसे बड़ा और भारी ग्रह है. इसके आसपास अंतरिक्ष में हजारों की संख्या में छोटे-बड़े एस्टेरॉयड्स (यानी स्पेस की विशाल चट्टानें) घूम रही हैं. ये चट्टानें जुपिटर के साथ-साथ सूरज का चक्कर लगाती हैं. इसी पूरे इलाके को वैज्ञानिक 'जुपिटर ट्रोजन एस्टेरॉयड रीजन' कहते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि आज से करीब 4.5 अरब साल पहले जब हमारा सोलर सिस्टम बन रहा था, तब ये एस्टेरॉयड्स उसी समय के बचे हुए टुकड़े हैं. आप इन्हें एक तरह से सोलर सिस्टम के बनने के समय का 'टाइम कैप्सूल' मान सकते हैं. ये सारी चट्टानें जुपिटर की ऑर्बिट में दो बड़े ग्रुप्स में बंटी हुई हैं. साइंस की भाषा में इन खास स्पॉट्स को 'लैग्रेंज पॉइंट्स' (Lagrange Points) कहा जाता है, जिन्हें L4 और L5 के नाम से जाना जाता है.

पहला ग्रुप (L4): यह एस्टेरॉयड्स का ग्रुप जुपिटर के आगे-आगे चलता है.

दूसरा ग्रुप (L5): यह ग्रुप जुपिटर के ठीक पीछे-पीछे चलता है.

सबसे मजेदार बात यह है कि सूरज और जुपिटर की जबरदस्त ग्रेविटी की वजह से ये एस्टेरॉयड्स अपनी जगह से भटकते नहीं हैं और सालों से एक ही जगह पर टिके हुए हैं.

यह जगह जुपिटर से लगभग 484 मिलियन मील दूर है. यानी जितनी दूरी सूरज से जुपिटर की है, लगभग उतनी ही दूरी पर ये एस्टेरॉयड्स जुपिटर से दूर फैले हैं. इनके बीच आपस में भी औसतन 6 मिलियन मील की गैपिंग है. जब ल्यूसी ने इन्हें पहली बार दूर से देखा, तो ये रात के आसमान में छोटे-छोटे चमकते हुए डॉट्स की तरह दिखाई दे रहे थे. लेकिन अब यान बिल्कुल इनके करीब पहुंच गया है.

2027 में होगा पहला आमना-सामना: जानिए किससे टकराएगा ल्यूसी?
नासा के प्लान के मुताबिक, ल्यूसी स्पेसक्राफ्ट की सबसे पहली क्लोज मीटिंग 'एरिबेट्स' नाम के एक बड़े ट्रोजन एस्टेरॉयड से होगी. नासा ने इस मुलाकात की तारीख 11 अगस्त 2027 फिक्स की है. फिलहाल नासा के वैज्ञानिक और ग्राउंड टीम दिन-रात एक करके यान के सारे कैमरों और सेंसर्स को इस ऐतिहासिक मुलाकात के लिए ट्यून कर रहे हैं. जब ल्यूसी एरिबेट्स के पास से गुजरेगा, तो यह वहां कुछ घंटे बिताएगा. इस दौरान यह यान बेहद करीब से उस एस्टेरॉयड की हाई-रिजॉल्यूशन फोटो खींचेगा और उसका डेटा धरती पर भेजेगा. किसी एस्टेरॉयड को इतने करीब से देखने का मौका इंसानों को पहली बार मिलने जा रहा है.

ल्यूसी का आगे का पूरा ट्रैवल प्लान
एरिबेट्स से मिलने के बाद ल्यूसी की यह राइड यहीं खत्म नहीं होगी. इसके बाद यह एक-एक करके कई दूसरे एस्टेरॉयड्स की तरफ बढ़ेगा. नासा ने इसका आगे का शेड्यूल कुछ इस तरह सेट किया है:

सितंबर 2027 (Polymele): ल्यूसी 'पॉलीमले' नाम की अंतरिक्षीय चट्टान के बेहद करीब से गुजरेगा.

अप्रैल 2028 (Leucus): इसके बाद यह अपने अगले टारगेट 'ल्यूकस' के पास पहुंचेगा.

नवंबर 2028 (Orus): इस महीने में ल्यूसी 'ओरस' एस्टेरॉयड को क्लोजली स्कैन करेगा.

इसके बाद साल 2030 में ल्यूसी वापस हमारी धरती के चक्कर लगाने आएगा. चौंकिए मत! यान धरती पर लैंड नहीं करेगा, बल्कि धरती की ग्रेविटी का इस्तेमाल करके अपनी स्पीड बढ़ाएगा. साइंस में इसे 'ग्रेविटी असिस्ट' (Gravity Assist) कहा जाता है. धरती से मिलने वाला यह पुश (धक्का) ल्यूसी को जुपिटर के दूसरे ग्रुप (L5) के ट्रोजन एस्टेरॉयड्स की तरफ फेंक देगा.

इस पूरे सफर का आखिरी और सबसे स्पेशल मोमेंट मार्च 2033 में आएगा. उस समय ल्यूसी 'पैट्रोक्लस' और 'मैनोएटियस' नाम के दो एस्टेरॉयड्स के पास पहुंचेगा. यह एक बहुत ही अनोखा बाइनरी पेयर है, यानी दो एस्टेरॉयड्स जो आपस में जुड़े हुए हैं और एक साथ घूमते हैं.

आखिर नासा के लिए क्यों इतना खास है यह मिशन?
वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर हमें यह समझना है कि हमारी पृथ्वी, चांद और बाकी ग्रह कैसे बने, तो हमें इन ट्रोजन एस्टेरॉयड्स को समझना पड़ेगा. ये एस्टेरॉयड्स आज से 4.5 अरब साल पुराने उसी मलबे से बने हैं जिससे पूरा सोलर सिस्टम तैयार हुआ था. एक तरह से ये एस्टेरॉयड्स हमारे अतीत के वो पन्ने हैं जो अब तक खुले नहीं थे.

जैसे-जैसे ल्यूसी स्पेसक्राफ्ट सूरज से दूर जा रहा है, वहां धूप बहुत कम हो रही है और ठंड बहुत ज्यादा बढ़ रही है. यह इलाका हमारी पृथ्वी के मुकाबले सूरज से 5 गुना ज्यादा दूर है. लेकिन ल्यूसी को इसी तरह के कठिन माहौल में काम करने के लिए बनाया गया है. नासा ने कंफर्म किया है कि स्पेसक्राफ्ट के सारे पार्ट्स और सोलर पैनल्स बिल्कुल सही काम कर रहे हैं.

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About the Author

Mohit Chaturvedi

Mohit Chaturvedi

मोहित चतुर्वेदी डिजिटल न्यूज मीडिया में 16 से अधिक वर्षों का एक्सपीरियंस रखने वाले एक वरिष्ठ टेक जर्नलिस्ट हैं, जो वर्तमान में Zee News में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के रूप में टेक्नोलॉजी सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं. स्मार्टफोन रिव्यू, गैजेट एनालिसिस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा में गहरी विशेषज्ञता रखने वाले मोहित ने Apple, Samsung, OnePlus, Vivo और Xiaomi जैसे टॉप ब्रांड्स के फ्लैगशिप डिवाइसों का गहन और निष्पक्ष इन-डेप्थ रिव्यू किया है. अंतरराष्ट्रीय टेक इवेंट्स की ऑन-ग्राउंड रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव रखने वाले मोहित ने लंदन में 'Nothing Phone' और आयरलैंड के बेलफास्ट में 'Realme' के ग्लोबल लॉन्च इवेंट्स को कवर किया है, और इससे पहले वे NDTV, आजतक और दैनिक भास्कर जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में टेक जर्नलिज्म और डिजिटल कंटेंट स्ट्रेटेजी में अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं. जटिल तकनीकी बारीकियों को बेहद आसान भाषा में डिकोड करने के लिए पहचाने जाने वाले मोहित से सीधे Mohit.chaturvedi@zeemedia.com पर ईमेल के जरिए या उनके एक्स और इंस्टाग्राम हैंडल्स पर कनेक्ट किया जा सकता है.
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