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क्या आपने कभी सोचा है कि जब इंसान चांद या मंगल ग्रह पर पहुंचेगा, तो वहां रहेगा कहां? क्या वहां भी हमारे जैसे कंक्रीट के घर होंगे, या फिर कुछ एकदम अलग और एडवांस्ड? इसी मिलियन डॉलर सवाल का जवाब लेकर आए हैं भारतीय एस्ट्रोनॉट ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला. रूस से अपनी कड़क ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने एक ऐसा प्रोजेक्ट पेश किया है, जिसे सुनकर आज का यूथ भी बोलेगा- "यह तो एकदम नेक्स्ट लेवल विजन है!" उन्होंने इस फ्यूचरिस्टिक घर का नाम रखा है BHEEM. आइए जानते हैं भारतीय एस्ट्रोनॉट का यह 'भीम' प्लान अंतरिक्ष में इंसानों की जिंदगी कैसे बदलने वाला है.
कौन हैं शुभांशु शुक्ला और क्या है उनका यह धांसू विजन
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला भारत के उन चुनिंदा एस्ट्रोनॉट्स में से एक हैं, जो देश के गगनयान मिशन और फ्यूचर स्पेस ट्रैवल का चेहरा हैं. रूस में अपनी कड़ी ट्रेनिंग पूरी करके लौटने के बाद, उन्होंने सिर्फ स्पेसक्राफ्ट उड़ाने तक खुद को सीमित नहीं रखा. उन्होंने सोचा कि जब हम रॉकेट से दूसरे ग्रह पर उतर जाएंगे, तो उसके आगे क्या होगा? इसी सोच से जन्म हुआ B.H.E.E.M. प्रोजेक्ट का, जिसका फुल फॉर्म है Bharatiya Habitable Expandable Extraterrestrial Habitat.
B.H.E.E.M. — Bharatiya Habitable Expandable Extraterrestrial Habitat.
When we returned from our training in Russia, we began the Indian leg of our astronaut training. This involved learning the systems of the launch vehicle and orbital module, along with extensive physical and… pic.twitter.com/2Ubt0FiVbj— Shubhanshu Shukla (@gagan_shux) September 1, 2026
आखिर क्या है B.H.E.E.M. और यह कैसे काम करेगा
BHEEM आसान भाषा में एक ऐसा खास फोल्डेबल या फैलने वाला (Expandable) घर है, जिसे अंतरिक्ष में ले जाकर आसानी से सेट किया जा सकता है. यह प्रोजेक्ट IISc (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस) बेंगलुरु की आलोक लैब (Aloke Lab) में डेवलप किया गया है. जब इंसान चांद या मंगल ग्रह पर कदम रखेगा, तो उसे रहने के लिए एक ऐसी जगह चाहिए जो रॉकेट में कम जगह घेरे, लेकिन वहां पहुंचकर बड़ी हो जाए. BHEEM इसी परेशानी का सबसे बेस्ट सॉल्यूशन है.
स्पेस में घर बनाना पृथ्वी पर घर बनाने जैसा बिल्कुल नहीं है
शुभांशु शुक्ला ने बताया कि रॉकेट और स्पेसक्राफ्ट इंसानों को चांद या मंगल तक पहुंचा तो सकते हैं, लेकिन वहां जाकर जिंदा रहना एकदम अलग गेम है. अंतरिक्ष में भयंकर रेडिएशन होता है, जो इंसानी शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है. वहां का टेम्परेचर या तो बहुत ज्यादा गर्म होता है या माइनस में हड्डियों को जमा देने वाला ठंडा. इसके अलावा, वहां सांस लेने के लिए ऑक्सीजन और पीने के लिए पानी का लाइफ-सपोर्ट सिस्टम होना बेहद जरूरी है. BHEEM को इन्हीं सब खतरों से इंसानों को बचाने के लिए डिजाइन किया जा रहा है.
'20 साल बाद रहना है, तो काम आज से शुरू करना होगा'
शुभांशु शुक्ला ने एक बहुत ही पते की बात कही, जो आज के यूथ को जरूर सीखनी चाहिए. उन्होंने कहा—"अगर हम चाहते हैं कि आज से 20 साल बाद इंसान चांद या मंगल पर रहें, तो उसकी तैयारी हम 20 साल बाद शुरू नहीं कर सकते. उसका काम हमें आज ही शुरू करना होगा." उनका मानना है कि अंतरिक्ष में जाने की रेस सिर्फ रॉकेट बनाने की नहीं है, बल्कि वहां जाकर इंसानों को बसाने की टेक्नोलॉजी विकसित करने की भी है.
भारत का गगनयान और स्पेस में लंबी छलांग
भारत इस वक्त अपने स्पेस प्रोग्राम्स को बहुत तेजी से आगे बढ़ा रहा है. गगनयान मिशन के जरिए भारत अपने एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस में भेजने की तैयारी कर रहा है. लेकिन भारत का विजन सिर्फ लो-अर्थ ऑर्बिट तक सीमित नहीं है. शुभांशु शुक्ला का BHEEM प्रोजेक्ट यह दिखाता है कि भारत अब चांद और मंगल ग्रह पर अपनी लंबी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए अभी से रोडमैप तैयार कर रहा है.
ईंट-पत्थर नहीं, एक सोच से शुरू होती है नई दुनिया
शुभांशु शुक्ला का कहना है कि किसी दूसरी दुनिया पर घर बनाने का पहला कदम वहां पहली ईंट रखना नहीं होता. पहला कदम होता है यह हिम्मत जुटाना कि हम सोच सकें कि वह घर दिखेगा कैसा. भारतीय लैब्स में तैयार हो रहा यह कॉन्सेप्ट दिखाता है कि आने वाले टाइम में जब मून या मार्स पर कॉलोनियां बसेंगी, तो उसमें भारत का दिमाग और भारत की टेक्नोलॉजी सबसे आगे खड़ी होगी.
म्यूजियम और लैब्स से निकलकर अब असलियत बनने की राह पर
यह प्रोजेक्ट आज के युवाओं के लिए एक बड़ा इंस्पिरेशन है कि कैसे साइंस सिर्फ थ्योरी नहीं, बल्कि फ्यूचर को सच करने का जरिया है. बेंगलुरु की लैब से शुरू हुआ BHEEM आने वाले कुछ दशकों में स्पेस एक्सप्लोरेशन की पूरी गेम बदल सकता है. अब वह दिन दूर नहीं जब भारतीय एस्ट्रोनॉट्स चांद पर भारत का तिरंगा फहराने के साथ-साथ BHEEM जैसे एडवॉन्स्ड घरों में आराम से रह भी सकेंगे.