प्याज ₹70 किलो, टमाटर ₹90 किलो... खाने-पीने की हर एक चीज पर मंडराया AI का काला साया! एक्सपर्ट्स की चेतावनी से मची खलबली
फूड और ग्रॉसरी स्टोर्स में AI के बढ़ते इस्तेमाल से अब सामानों की कीमतें रियल टाइम में बदल सकती हैं. McDonald's और बड़े सुपरमार्केट्स पर AI के जरिए डायनेमिक प्राइजिंग और पर्सनलाइज्ड प्राइजिंग के आरोप लग रहे हैं.
आप किसी ग्रॉसरी स्टोर में सब्जियां खरीदने निकलते हैं. कुछ समय पहले जो प्याज 40 से 45 रुपये किलो थी, वो अचानक 70 रुपये किलो दिखने लगे. जहां एक किलो टमाटर 60 रुपये के आस-पास हुआ करते थे, वो 90 रुपये किलो दिखने लगे तो. जाहिर सी बात है कि आप कंफ्यूज हो जाएंगे... आखिर इतनी जल्दी कीमत कैसे बढ़ रही है. इसके पीछे AI का हाथ है. दुनिया भर के बड़े ग्रॉसरी स्टोर्स और फूड चेन्स अब अपना बिजनेस चलाने के लिए AI का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं. एक तरफ जहां एआई की वजह से जल्दी एक्सपायर होने वाले सामान सस्ते मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि एआई आपकी जेब पर भारी भी पड़ सकता है.
सुपरमार्केट्स और फास्ट फूड जॉइंट्स में एआई की एंट्री
आजकल दुनिया भर के रिटेल स्टोर्स और सुपरमार्केट्स अपने काम को आसान बनाने के लिए AI टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं. अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में क्रोगर, वॉलमार्ट, होल फूड्स और टेस्को जैसे बड़े ग्रॉसरी स्टोर्स अब डिजिटल स्क्रीन वाले प्राइस टैग्स लगा रहे हैं. इसका मतलब यह है कि दुकानदारों को अब कागज के प्राइस टैग बदलने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि कंप्यूटर से एक क्लिक करते ही पूरे स्टोर में सामान की कीमत कुछ सेकंड्स में बदल जाती है. इसके अलावा, Sainsbury’s जैसे स्टोर्स AI स्मार्ट-लिस्ट ला रहे हैं, जिससे आप अपनी फोटो या रेसिपी डालकर शॉपिंग लिस्ट बना सकते हैं.
मैकडोनाल्ड्स पर लगा बड़ा आरोप और प्राइजिंग इंजन का विवाद
हाल ही में दुनिया की सबसे बड़ी फास्ट-फूड चेन McDonald's पर एक बड़ा एंटीट्रस्ट केस दर्ज हुआ है. इस केस में आरोप लगाया गया है कि कंपनी अपने यूएस स्टोर्स में बिग मैक और फ्रेंच फ्राइज जैसे पॉपुलर आइटम्स के रेट्स तय करने के लिए AI आधारित 'प्राइजिंग इंजन' का इस्तेमाल कर रही है, जिससे ग्राहकों से ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं. हालांकि McDonald's ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वे किसी ग्राहक की क्षमता के हिसाब से रेट तय करने के लिए AI का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि सिर्फ अपने फ्रेंचाइजी पार्टनर्स को बेहतर फैसले लेने के लिए डेटा और सुझाव देते हैं.
क्या होती है डायनेमिक और पर्सनलाइज्ड प्राइजिंग?
यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट लंदन की सीनियर लेक्चरर मिरोस्लावा मारिनोवा के मुताबिक, डायनेमिक प्राइजिंग का मतलब होता है मांग, समय और कॉम्पिटिशन्स के हिसाब से कीमतें बदलना. यह टेक्नोलॉजी नई नहीं है, एयरलाइंस, होटल्स और ऊबर जैसी कैब सर्विसेज सालों से इसका इस्तेमाल करती आ रही हैं. लेकिन एआई के आने से अब डायनेमिक प्राइजिंग और पर्सनलाइज्ड प्राइजिंग के बीच की रेखा बहुत पतली हो गई है. पर्सनलाइज्ड प्राइजिंग में एआई आपके पिछले खरीदारी के रिकॉर्ड, आपकी लोकेशन और आपकी पसंद-नापसंद को देखकर यह अंदाजा लगाता है कि आप किसी सामान के लिए कितने पैसे देने को तैयार हैं.
ग्राहकों के लिए क्या है अच्छी खबर?
एआई प्राइजिंग का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हर सामान महंगा ही होगा. इसके कई बड़े फायदे भी हैं. उदाहरण के लिए, अमरीका के ग्रॉसरी स्टोर क्रोगर ने 'फ्लैशफूड' नाम का एक एआई प्लेटफॉर्म शुरू किया है. यह एआई तुरंत पहचान लेता है कि कौन सा सामान या फल जल्द ही खराब होने वाला है या उसकी एक्सपायरी डेट पास आ रही है. इसके बाद एआई अपने आप उस सामान की कीमत घटा देता है और ऐप के जरिए ग्राहकों को नोटिफिकेशन भेज देता है. इससे कम बजट वाले लोगों को सस्ता सामान मिल जाता है और खाना बर्बाद होने से भी बच जाता है. जब एआई सही तरीके से डिस्काउंट देता है, तो गरीब और मिडिल क्लास परिवारों को काफी फायदा होता है.
ग्राहकों के लिए क्या है बड़ा खतरा?
एआई प्राइजिंग का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसमें पारदर्शिता यानी ट्रांसपेरेंसी पूरी तरह खत्म हो जाती है. जब किसी सामान के रेट हर मिनट बदलते रहेंगे, तो ग्राहक को यह पता ही नहीं चलेगा कि उसे जो रेट मिला है, वह सही मार्केट रेट है या फिर एआई ने उसकी पर्सनल डिटेल्स देखकर रेट बढ़ा दिया है. मारिनोवा का कहना है कि जब ग्राहक यह नहीं समझ पाएंगे कि उनसे ज्यादा पैसे क्यों लिए जा रहे हैं और वे दूसरे दुकानदार के पास भी नहीं जा पाएंगे, तो मार्केट में ग्राहकों की चुनने की ताकत कमजोर पड़ जाएगी.
महंगाई मापने में भी खड़ी होगी बड़ी मुसीबत
सिर्फ ग्राहकों की जेब ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी यह AI प्राइजिंग एक सिरदर्द बन सकती है. बैंक ऑफ इंग्लैंड के इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि जब किसी स्टोर में हर ग्राहक के लिए और हर घंटे कीमतें बदलती रहेंगी, तो सरकार और केंद्रीय बैंकों के लिए देश में असली महंगाई को मापना बहुत मुश्किल हो जाएगा. जब महंगाई का सही आंकड़ा ही नहीं मिलेगा, तो ब्याज दरें और नीतियां तय करना भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा.