क्या बिजली के झटके से पकड़े जाएंगे एलियंस? अब रॉकेट नहीं यह नैनो-चिप करेगी दूध का दूध और पानी का पानी
क्या बिजली के करंट से पकड़े जाएंगे एलियंस? ओसाका यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने नैनो-टेक्नोलॉजी और AI की मदद से अमीनो एसिड का पता लगाने वाली नई तकनीक खोजी है. जानिए कैसे यह छोटी सी चिप मंगल और अंतरिक्ष में एलियंस का सुराग खोजेगी.
न जानें कितने सालों से स्पेस साइंटिस्ट्स अंतरिक्ष में एलियंस की खोज कर रहे हैं. अब तक साइंटिस्ट पानी, ऑक्सीजन और कुछ केमिकल्स की मदद से एलियंस का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन जापान की ओसाका यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट्स ने ऐसा तरीका ढूंढ निकाला है जिसने दुनिया को हैरानी में डाल दिया है. उनका दावा है कि बिजली के करंट की मदद से एलियंस या उनके जिंदा होने का सबूत मिल सकता है. आइए जानते हैं डिटेल में...
क्या होते हैं बायोसिग्नेचर्स और क्यों थी नई तकनीक की जरूरत?
साइंटिस्ट लंबे समय से अंतरिक्ष में बायोसिग्नेचर्स यानी जीवन के केमिकल क्लूज का पीछा कर रहे हैं. जब भी किसी ग्रह पर कोई जीव या बैक्टीरिया होता है, तो वह पीछे कुछ खास केमिकल छोड़ता है. लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इन केमिकल्स को जांचने वाली मशीनें बहुत भारी और बड़ी होती थीं. इन्हें स्पेसक्राफ्ट या रोवर में रखकर दूसरे ग्रहों पर भेजना लगभग नामुमकिन सा काम था. इसी चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों को एक ऐसी टेक्नोलॉजी चाहिए थी जो साइज में बहुत छोटी हो और अंतरिक्ष के झटकों को झेल सके.
ओसाका यूनिवर्सिटी का बड़ा कारनामा
जापान की ओसाका यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट्स ने इस नामुमकिन काम को मुमकिन कर दिखाया है. उन्होंने एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बनाया है जो प्रोटीन के ढांचे यानी अमीनो एसिड को सेकंडों में पहचान सकता है. इस रिसर्च की रिपोर्ट इंटरनेशनल जर्नल 'नेचर कम्युनिकेशंस' में पब्लिश हुई है. वैज्ञानिकों का यह नया नैनो-डिवाइस साइज में इतना छोटा है कि इसे आसानी से किसी भी छोटे से छोटे स्पेस रोवर में फिट किया जा सकता है.
बाएं हाथ और दाएं हाथ का खेल, कैसे पहचाना जाएगी एलियन लाइफ?
धरती पर मौजूद सभी जीवों का आधार अमीनो एसिड होता है. मजेदार बात यह है कि अमीनो एसिड दो तरह के होते हैं- एक L-अमीनो एसिड (लेफ्ट-हैंडेड) और दूसरा D-अमीनो एसिड (राइट-हैंडेड). हमारी धरती पर जितने भी पेड़-पौधे, इंसान या जीव-जंतु हैं, वे सभी केवल L-अमीनो एसिड का इस्तेमाल करते हैं. वहीं दूसरी तरफ, जो चीजें बेजान होती हैं या बिना जीवन के केमिकल रिएक्शन से बनती हैं, उनमें L और D दोनों बराबर मात्रा में पाए जाते हैं. इसलिए अगर अंतरिक्ष में L-अमीनो एसिड की मात्रा ज्यादा मिलती है, तो समझ लीजिए कि वहां जीवन का कोई न कोई सबूत पक्का मौजूद है.
दो सोने के तारों और AI का पावरफुल कॉम्बिनेशन
पुराने जमाने में अमीनो एसिड के इस फर्क को जांचने के लिए बहुत सारे भारी केमिकल्स की जरूरत पड़ती थी. लेकिन ओसाका की टीम ने नैनो-टेक्नोलॉजी का सहारा लिया. उन्होंने सोने के दो बेहद पतले तारों (गोल्ड नैनो-वायर्स) के बीच एक छोटी सी गैप बनाया. जब भी कोई अकेला मॉलिक्यूल इस गैप से गुजरता है, तो बिजली का एक खास करंट पैदा होता है. L-अमीनो एसिड और D-अमीनो एसिड का करंट एक-दूसरे से काफी अलग होता है. जब वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जोड़ा, तो 80% से ज्यादा सटीकता के साथ सही अमीनो एसिड की पहचान हो गई.
उल्कापिंड और रेगिस्तान की मिट्टी पर हुआ धांसू टेस्ट
यह टेक्नोलॉजी असल दुनिया में काम करेगी या नहीं, इसे टेस्ट के लिए वैज्ञानिकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में गिरे मर्चिसन उल्कापिंड के टुकड़ों और चिली के अटाकामा रेगिस्तान की मिट्टी का सैंपल लिया. अटाकामा रेगिस्तान धरती की सबसे सूखी जगह मानी जाती है और इसका माहौल काफी हद तक मंगल ग्रह जैसा है. जब वैज्ञानिकों ने अपनी इस नई चिप से सैंपल को स्कैन किया, तो नतीजे बिल्कुल सटीक निकले.
मंगल ग्रह से लेकर यूरोपा तक फैलेगा यह जाल
इस नई टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कोई भारी केमिकल नहीं लगता और न ही स्पेसक्राफ्ट के हिलने-डुलने से इस पर कोई असर पड़ता है. भविष्य में जब नासा या अन्य एजेंसियां मंगल ग्रह, बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा, या शनि के चंद्रमा एन्सेलेडस पर अपने रोवर भेजेंगी, तो इस चिप का इस्तेमाल होगा. सोचिए, एक छोटा सा रोवर किसी दूर दराज ग्रह पर जाकर वहां की मिट्टी में सीधे अमीनो एसिड की गिनती करेगा और तुरंत बता देगा कि वहां एलियंस हैं या नहीं.