यमुनोत्री मंदिर: कब, कैसे और किसने बनवाया था मां यमुना का यह धाम? जानिए 187 साल पुराना इतिहास
उत्तराखंड में स्थित प्रसिद्ध यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 1839 में टिहरी के राजा सुदर्शन शाह ने कराया था, जिसे बाद में जयपुर की महारानी गुलेरिया ने पुनर्गठित किया. मान्यता है कि यहां यमुना में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है.
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री मंदिर चारों धाम यात्रा का पहला सबसे पावन पड़ाव माना जाता है. ये पवित्र स्थल बडकोट से शुरू होकर मसूरी और कालसी के खूबसूरत पहाड़ी रास्तों से जुड़ता है.
हनुमानचट्टी तक गाड़ियां आसानी से पहुंच जाती हैं. यह छोटी सी चट्टी सयाना चट्टी से केवल 7 किलोमीटर दूर है, जो चारों तरफ सुंदर वादियों से घिरी हुई है.
यमुनोत्री धाम की मुख्य 13 किलोमीटर की पैदल यात्रा यहीं से शुरू होती है. समुद्र तल से लगभग 3,292 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर का परिसर बेहद शांत और अलौकिक अहसास कराता है.
19वीं सदी में राजा सुदर्शन शाह ने करवाया था मंदिर का निर्माण
यमुनोत्री में पवित्र स्थल की पूजा तो अनादि काल से चली आ रही है, लेकिन यहां वर्तमान मंदिर का निर्माण 19वीं सदी में कराया गया था. इतिहास के अनुसार, टिहरी गढ़वाल के राजा सुदर्शन शाह ने साल 1839 में इस मंदिर का निर्माण करवाया था.
आगे चलकर जब प्राकृतिक आपदा और भूकंप से मंदिर को क्षति पहुंची, तो जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी के अंत में इसका जीर्णोद्धार और भव्य पुनर्निर्माण करवाया. शीतकाल में भारी बर्फबारी के कारण जब मंदिर के कपाट बंद होते हैं, तो मां यमुना की प्रतिमा को पास के खरसाली गांव लाया जाता है.
हनुमानचट्टी से यमुनोत्री तक के दो खूबसूरत और कठिन रास्ते
हनुमानचट्टी से यमुनोत्री पहुंचने के लिए दो अलग-अलग पैदल रास्ते बने हुए हैं. पहला मार्ग नदी के दाहिने तट से होकर प्रसिद्ध मार्कंडेय तीर्थ की ओर जाता है. मान्यता है कि इसी पवित्र स्थान पर बैठकर महर्षि मार्कंडेय ने मार्कंडेय पुराण की रचना की थी.
दूसरा रास्ता नदी के बाएं किनारे से होकर खरसाली गांव की तरफ जाता है. यहां से मंदिर तक पहुंचने में श्रद्धालुओं को लगभग 5 से 6 घंटे की कठिन चढ़ाई चढ़नी पड़ती है. पूरे रास्ते में खिलने वाले जंगली गुलाब के फूल और हरे-भरे चेस्टनट के पेड़ यात्रा की थकान मिटा देते हैं.
सूर्य कुंड का उबलता पानी और गौरी कुंड का गुनगुना अहसास
यमुनोत्री धाम पहुंचते ही भक्तों को दो अलौकिक कुंडों के दर्शन होते हैं. पहला है सूर्य कुंड, जिसका पानी प्राकृतिक रूप से हमेशा उबलता रहता है. श्रद्धालु इस कुंड के उबलते पानी में कपड़े में बांधकर चावल और आलू पकाते हैं और फिर उसे प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं.
दूसरा कुंड गौरी कुंड है, जहां का पानी हल्का गुनगुना रहता है. मंदिर के गर्भगृह में मां यमुना की काले पत्थर की बहुत ही दिव्य मूर्ति विराजमान है. यमुना नदी का मुख्य उद्गम स्थल पास ही बंदरपूंछ पर्वत श्रृंखला में स्थित कालिंदी पर्वत से माना जाता है.
असित मुनि की तपस्या और यमराज से जुड़ा पौराणिक सच
धार्मिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में असित मुनि नाम के एक महान ऋषि यहां तपस्या करते थे. वे रोज गंगा और यमुना दोनों नदियों में स्नान करते थे. वृद्धावस्था में जब वे गंगाजी तक जाने में असमर्थ हो गए, तो मां गंगा ने स्वयं यमुनाजी के पास प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए.
इसके अलावा यमुनाजी को सूर्य देव की पुत्री और मृत्यु के देवता यमराज की बहन माना गया है. पौराणिक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति यमुनोत्री में भक्ति भाव से डुबकी लगाता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और उसके सारे पाप कट जाते हैं.
शीतकालीन प्रवास खरसाली और मां यमुना की विदाई
यमुनोत्री केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अटूट केंद्र है. हर साल भाई दूज (यम द्वितीया) के पावन अवसर पर सर्दियों के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं.
इसके बाद मां यमुना की उत्सव डोली को धूमधाम से उनके शीतकालीन प्रवास खरसाली गांव ले जाया जाता है. पूरे शीतकाल में खरसाली में ही मां यमुना की नियमित पूजा-अर्चना की जाती है.
इसके बाद गर्मी की शुरुआत में दोबारा वैशाख महीने की अक्षय तृतीया पर यमुनोत्री मंदिर के कपाट भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिए जाते हैं.
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह लेख ऐतिहासिक अभिलेखों, गढ़वाल रियासत के इतिहास और प्रचलित पौराणिक मान्यताओं पर आधारित एक विवरणात्मक रिपोर्ट है. इसका उद्देश्य पाठकों तक यमुनोत्री धाम के निर्माण और उसके धार्मिक महत्व की प्रामाणिक जानकारी पहुंचाना है.
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