श्रीमद्भागवत में कृष्ण हैं, गोपियां हैं...फिर एक बार भी क्यों नहीं आया राधा का नाम? समाधि से जुड़ी है दिलचस्प मान्यता
“राधा-कृष्ण” भारतीय भक्ति परंपरा में एक-दूसरे के पर्याय हैं और उनकी लीलाओं, रासलीला पर कई ग्रंथ, पुराण लिखे गए हैं. जिसमें श्रीमद्भागवत पुराण प्रमुख है. इस पुराण में एक अनोखी बात देखने को मिलती है इसमें कहीं भी राधा का नाम सीधे तौर पर नहीं लिखा गया है. ऐसा क्यों?
राधा-कृष्ण का नाम लेते ही प्रेम और भक्ति की तस्वीर सामने आती है. उन्हें 2 अलग रूप नहीं बल्कि एक ही कहा गया है. भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, रासलीला और उनके प्रेम को प्रमुखता से बताने वाले श्रीमद्भागवत पुराण में वो सब कुछ है जो कृष्ण के जीवन में घटित हुआ और जाहिर है कृष्ण का जिक्र बिना राधा के अधूरा है. इसके बाद भी इस पूरे पुराण में कहीं भी राधा का नाम सीधे तौर पर एक बार भी नहीं आया है. आखिर ऐसा क्यों है?
श्रीमद्भागवत क्या है?
श्रीमद्भागवत महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित ग्रंथ है और इसकी रचना के पीछे एक रोचक कहानी है. पुराणों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि जब महर्षि वेद व्यास जी ने सारे वेद-पुराणों की रचना कर ली तब भी उनका मन शांत नहीं हुआ. तो उनकी व्यथा देखकर नारद मुनि प्रकट हुए. वेद व्यास ने अपनी व्यथा उन्हें बताकर समाधान पूछा तो नारद मुनि ने उनसे कहा कि आपने सारे ग्रंथ तो रच लिए लेकिन भगवान के नाम, गुण, लीला, धाम की चर्चा नहीं की.
इसके बाद महर्षि वेद व्यास ने श्रीमद्भागवत की रचना की जिसमें भगवान विष्णु के 10 अवतारों का वर्णन है. इसमें 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हजार श्लोक हैं. इसके 10वें, 11वें और 12वें स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण के नाम, गुण, लीला, धाम का विस्तार से वर्णन किया गया है. जब वेद व्यास जी ने श्रीमद्भागवत की रचना कर ली, तब उन्हें शांति मिली. यही उनके द्वारा रचित आखिरी ग्रंथ था.
श्रीमद्भागवत में राधा नाम क्यों नहीं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वेद व्यास जी भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे. वे भविष्य देख सकते थे. उनके पुत्र शुकदेव जी हुए जो ब्रह्मज्ञानी थे. उन्होंने राजा परीक्षित को अपने पिता द्वारा रचित श्रीमद्भागवत कथा सुनाई थी. इसमें उन्होंने भगवान कृष्ण की समस्त लीलाओं, गुणों, नाम के महत्व आदि का वर्णन किया लेकिन कहीं भी राधा का नाम नहीं लिया. कहा जाता है कि वे जैसे ही राधा जी का नाम लेते थे, वे समाधि में चले जाते थे. इससे कथा समय पर पूरी नहीं हो पाती, लिहाजा उन्होंने पूरी कथा सुनाने के दौरान राधा नाम ही नहीं लिया.
चूंकि वेदव्यास जी भविष्यदर्शा होने के कारण ये बात जानते थे कि भविष्य में ऐसा होगा इसलिए उन्होंने राधा जी के प्रति कृष्ण जी के प्रेम और भक्ति का वर्णन करते हुए केवल विशेष सखी का संकेत दिया है, सीधे तौर पर उनका नाम नहीं लिया.
प्रेमानंद महाराज जी ने भी किया है उल्लेख
वृंदावन के मशहूर संत प्रेमानंद महाराज जी ने भी कई बार अपने प्रवचनों में इस घटना का उल्लेख किया है कि जब राजा परीक्षित को शृंगी ऋषि ने श्राप दिया कि 7 दिन बाद तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु हो जाएगी. तब वे राजपाट छोड़कर गंगा तट पर आ गए. वहां महर्षि वेद व्यास के पुत्र ब्रह्मज्ञानी महर्षि शुकदेव जी पधारे. राजा परीक्षित ने उनसे पूछा कि यदि मृत्यु करीब हो तो मोक्ष प्राप्ति के लिए क्या करना चाहिए?
तब राजा परीक्षित को शुकदेव जी ने 7 दिन तक श्रीमद्भागवत कथा सुनाई. इस दौरान उन्हें राधा जी का नाम एक बार भी नहीं लिया. राधा आनंद स्वरूपा हैं, वे भगवान कृष्ण को आनंद देने वाली हैं. भक्तों को आनंद देने वाली हैं. शुकदेव जी उनके परम भक्त थे और जब भी वे राधा नाम लेते तो समाधि में चले जाते. कहते हैं कि उनकी ये समाधि 6 महीने तक लंबी हो जाती थी. इसलिए पूरी श्रीमद्भागवत कथा सुनाने के दौरान उन्होंने राधा नाम नहीं लिया. वरना वे राजा परीक्षित की मृत्यु तक कथा पूर्ण नहीं कर पाते.
इस श्लोक में है राधा जी का संकेत
विद्वानों के अनुसार श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 30वें अध्याय के 28वे श्लोक में श्रीराधा का संकेत/गूढ़ उल्लेख माना गया है.
यह श्लोक है—
अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः ।
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद् रहः ॥
अर्थ: “निश्चय ही इस गोपी ने भगवान श्रीहरि की विशेष रूप से आराधना की है. इसी से प्रसन्न होकर गोविन्द हम सबको छोड़कर इसे एकांत स्थान में ले गए हैं.”
आचार्यों ने यह “अनया आराधितः” शब्द को ही राधा जी के नाम का संकेत माना है, जिसका अर्थ है “जिसने भगवान की सर्वोत्तम आराधना की, वही राधा”.
यहां तक कि भागवत के महाविद्वान श्री रामचन्द्र केशव डोंगरे जी महाराज की एक प्रसिद्ध व्याख्या भी उनके द्वारा रचित किताबों में मिलती है कि भागवत में राधाजी का नाम प्रत्यक्ष रूप से न आने का अर्थ यह नहीं कि राधा भागवत में नहीं हैं. बल्कि राधाजी का स्वरूप और उनका प्रेम भागवत के कृष्ण-प्रेम में अन्तर्निहित है.
(Disclaimer- इस लेख में दी गई समाधि से जुड़ी बात धार्मिक मान्यता और वैष्णव परंपरा में प्रचलित व्याख्याओं पर आधारित है. अलग-अलग संप्रदायों और विद्वानों की इस विषय पर अलग-अलग मान्यताएं हो सकती हैं.)