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Janmashtami 2026 Krishna Morpankh: सनातन धर्म में देवी-देवता की पूजा करते हुए श्रृंगार करने का विशेष महत्व है. वहीं जब श्रृंगार की बात आती है तो भगवान श्रीकृष्ण का जिक्र जरूर होता है. इस साल जन्माष्टमी पर्व 4 सितंबर को मनाया जाएगा और इस पूजा में भी भक्त भगवान कृष्ण को मोरपंख लगाकर उनके श्रृंगार को पूरा करेंगे. भगवान का बाल रूप लड्डू गोपाल हो या कोई अन्य मनमोहक रूप, उनके श्रृंगार की एक विशेष बात हमेशा एक सी होती है. वो ये है कि भगवान कृष्ण हमेशा मोरपंख धारण करते हैं. अब एक प्रश्न मन में उठता है कि भगवान श्री कृष्ण अपनी पगड़ी या अपने मुकुट में मोरपंख क्यों लगाते हैं. आइए इसके पीछे के कुछ कारणों को जानें.
भगवान कृष्ण मोरपंख क्यों धारण करते हैं
राधा-कृष्ण की प्रेम निशानी
वैसे तो भगवान कृष्ण के मोरपंख धारण करने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं. जिनमें से एक कारण तो यही है कि भगवान श्रीकृष्ण के सिर पर सजने वाला मोरपंख श्रीराधा से उनके अटूट प्रेम की निशानी है. इसे लेकर धार्मिक मान्यता है कि एक समय जब वृंदावन में कृष्ण जी बांसुरी बजा रहे थे तो उस धुन पर राधा जी नृत्य करने लगीं. इसी के साथ महल में मोरों ने भी नाचा शुरू कर दिया. मोरों के नाचने से उनके पंख भूमि पर गिर गए जिसे उठाकर कृष्ण जी ने अपने माथे पर धारण कर लिया. इस तरह राधा-कृष्ण की प्रेम निशानी के रूप में मोरपंख को देखा जाता है.
कुंडली के दोष से जुड़ा है दूसरा कारण
श्रीकृष्ण के मोरपंख धारण करने के पीछ ज्योतिषीय कारण भी बताया जाता है. इसके पीछे की मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण इसलिए मोरपंख धारण करते हैं क्योंकि उनकी कुंडली में एक बड़ा दोष था. धार्मिक मान्यता के अनुसार कृष्ण जी की कुंडली में कालसर्प दोष था जिसके काट के लिए उन्होंने मोरपंख धारण किया.
सादगी और सकारात्मकता से जुड़ा है मोरपंख
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अपने मुकुट में भगवान श्रीकृष्ण ने सोने, हीरे या कोई और बहुमूल्य रत्नों को स्थान देने के बजाय साधारण से मोरपंख को महत्व दिया. ऐसा करना सिखाता है कि बाहरी दिखावे की बजाए सरलता, प्रेम और विनम्रता को अधिक महत्व देना चाहिए. मोरपंख सकारात्मक ऊर्जा को भी दर्शाता है. इसके सुंदर रंग जीवन में संतुलन बनाए रखने की सीख देते हैं.
(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक ग्रंथों, व्रत कथाओं, पौराणिक प्रसंगों एवं प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है. विभिन्न ग्रंथों, क्षेत्रों, परंपराओं और विद्वानों के मतानुसार कथाओं एवं उनके विवरण में अंतर संभव है. इसका उद्देश्य धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक जानकारी प्रदान करना है.)