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महाभारत को हिंदू धर्म में सिर्फ एक लड़ाई की कहानी नहीं, बल्कि जिंदगी और धर्म की सबसे बड़ी किताब माना जाता है. इसे लिखे जाने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है, जिसमें अक्ल और त्याग दोनों दिखाई देते हैं.
कहा जाता है कि महाभारत को वेदव्यास जी ने लिखा था. पर इतनी बड़ी और गहरी बात वाली किताब लिखना किसी आम इंसान के बस की बात नहीं थी.
इसलिए वेदव्यास जी ने गणेश जी से इसे लिखने के लिए कहा था. गणेश जी मान तो गए, पर एक शर्त रख दी, लिखते वक्त उनकी कलम एक पल के लिए भी नहीं रुकनी चाहिए.
इसी शर्त को निभाते-निभाते एक ऐसी बात हो गई, जिसकी वजह से गणेश जी का नाम एकदंत पड़ गया था.
कहते हैं वेदव्यास जी हिमालय की एक सुनसान गुफा में गहरे ध्यान में बैठे थे. उसी ध्यान के बीच उनके मन में सही-गलत, राजनीति और रिश्तों से जुड़ी एक बहुत बड़ी कहानी आई. उन्हें लगा कि ये कहानी आगे आने वाले सैकड़ों सालों तक लोगों को राह दिखाएगी.
बस फिर उन्होंने सोच लिया कि इसे लिखना ही है. पर दिक्कत ये थी कि कोई ऐसा तेज लिखने वाला चाहिए था जो उनकी बोली को बिना रुके लिख सके. काफी सोचने के बाद उन्हें गणेश जी याद आए, और उन्होंने उनसे मदद मांगी.
वेदव्यास जी की बात सुनकर गणेश जी लिखने को तैयार हो गए, पर उन्होंने भी अपनी एक शर्त रख दी, एक बार कलम चलनी शुरू हुई तो बीच में रुकेगी नहीं.
अगर वेदव्यास बोलते-बोलते रुक गए, तो वे उसी वक्त लिखना बंद कर देंगे. ये सुनकर वेदव्यास जी ने भी एक चालाकी भरी शर्त जोड़ दी - गणेश जी बिना बात समझे उसे आगे नहीं लिखेंगे.
गणेश जी को ये बात ठीक लगी, और इस तरह दोनों के बीच एक अनोखी शर्त तय हो गई.
शर्त होते ही महाभारत लिखने का काम शुरू हो गया. वेदव्यास जी तेजी से बोलते जाते, और गणेश जी उतनी ही तेजी से उन्हें कागज पर उतारते जाते.
हस्तिनापुर की कहानी से लेकर कौरव-पांडवों का जन्म और द्रौपदी की शादी तक, सब कुछ आगे बढ़ता गया. पर बिना रुके इतना कुछ बोलना वेदव्यास जी के लिए भी आसान नहीं था.
इसलिए जब भी उन्हें आगे की बात सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए होता, वे कोई बहुत मुश्किल और गहरी बात बोल देते. गणेश जी उसका मतलब समझने में कुछ पल लगाते, और इतने में वेदव्यास जी मन ही मन आगे की कई बातें तैयार कर लेते.
कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते कुरुक्षेत्र की लड़ाई तक जा पहुंची. भीष्म, द्रोण, अर्जुन और कृष्ण भगवान की गीता, सब कुछ लिखा जा रहा था. तभी अचानक गणेश जी की कलम बीच में ही टूट गई.
अब गणेश जी के सामने बड़ी मुश्किल आ गई, अगर वे नई कलम ढूंढने रुकते, तो अपनी ही शर्त तोड़ बैठते और महाभारत अधूरा रह जाता. अपनी बात रखना उनके लिए सबसे जरूरी था.
बिना एक पल गंवाए, बिना घबराए, गणेश जी ने खुद अपना एक दांत तोड़ लिया. उसे स्याही में डुबोकर कलम बना लिया और फिर से लिखना जारी रखा, जैसे कुछ हुआ ही न हो.
इस तरह उन्होंने अपनी बात रखी और महाभारत का लिखना रुकने नहीं दिया. इसी दांत तोड़ने और त्याग की वजह से गणेश जी को एकदंत कहा जाने लगा. कई दिन-रात की मेहनत के बाद आखिरकार ये बड़ी किताब पूरी हुई.
डिस्क्लेमर
इस लेख में दी गई जानकारी पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. इसे ऐतिहासिक तथ्य के रूप में न लें. यह वेबसाइट/चैनल इसकी पुष्टि नहीं करता है.