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अगर आपसे पुछा जाए कि दिवाली क्यों मनाया जाता है, तो आप यही बोलेंगे कि भगवान राम के 14 साल बाद वनवास से अयोध्या लौटने के खुशी में मनाया जाता है.
आज के दिन ही पूरी अयोध्या नगरी को दीयों से सजाकर उनका स्वागत किया गया था. लेकिन दिवाली मनाने की वजह सिर्फ यही एक नहीं है.
देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पावन पर्व को कई ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के साथ मनाया जाता है.
आज हम इस खबर में जानेंगे कि कार्तिक अमावस्या के इस रात क्यों इतना खास क्यों माना जाता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी कार्तिक अमावस्या के दिन समुद्र मंथन के दौरान मां लक्ष्मी प्रकट हुई थी.
इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना था. इसी पावन घटना की खुशी में हर साल दीपावली पर मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की खास पूजा की जाती है.
लोग अपने घरों में दीये जलाकर खुशहाली और धन की देवी का स्वागत करते हैं.
दिवाली का कनेक्शन भगवान श्रीकृष्ण की एक महान विजय से भी जुड़ा हुआ है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस समय के आसपास भगवान श्रीकृष्ण ने राक्षस नरकासुर को मारा था.
उन्होंने उसकी कैद से 16 हजार कन्याओं को सुरक्षित मुक्त कराया था.
इस क्रूर असुर के आतंक से मुक्ति मिलने की खुशी में प्रजा ने पूरे राज्य में दीये जलाकर उत्सव मनाया था, जो आगे चलकर दिवाली परंपरा का हिस्सा बना.
पूर्वी भारत के राज्यों, खासकर बंगाल और ओडिशा में दिवाली की रात को काली पूजा के रूप में मनाया जाता है.
माना जाता है कि राक्षसों का संहार करते समय मां काली बहुत गुस्सा हो गई थीं. उनके इस विकराल रूप को शांत करने के लिए भगवान शिव स्वयं उनके मार्ग में आ गए.
जैसे ही माता का पैर शिव जी पर पड़ा, उनका क्रोध शांत हो गया. इसी शांत स्वरूप और विजय की खुशी में मां काली की खास पूजा की जाती है.
महाभारत काल की एक कथा के अनुसार, पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला था.
कार्तिक अमावस्या के दिन ही पांडव अपना अज्ञातवास सफलतापूर्वक पूरा करके अपने राज्य लौटे थे.
अपनी प्रिय प्रजा ने पांडवों के सुरक्षित वापस आने की खुशी में पूरे नगर में दीप जलाकर उनका अभिनंदन किया था. तभी से इस दिन दीप जलाने की परंपरा चली आ रही है.
ये दिन केवल सनातन धर्म ही नहीं, बल्कि सिख और जैन धर्म के लिए भी बेहद पवित्र माना जाता है.
सिख समुदाय इसे बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है, क्योंकि इसी दिन छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी 52 राजाओं के साथ ग्वालियर किले से आजाद हुए थे.
वहीं जैन मान्यताओं के अनुसार, 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को इसी दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जिसकी खुशी में उनके अनुयायियों ने ज्ञान की ज्योति के प्रतीक के रुप में दीये जलाए थे.
(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारियां पौराणिक कथाओं, धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक परंपराओं पर आधारित हैं. इसका उद्देश्य सांस्कृतिक और पौराणिक तथ्यों की जानकारी प्रदान करना है, किसी भी धर्म, समुदाय या मान्यता की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है. पाठक इसे केवल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान के संदर्भ में लें.