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अगर आप किसी बड़े और प्राचीन मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो आपने अक्सर वहां मेन गेट पर दो विशाल मूर्तियां देखी होंगी. जो हाथों में गदा या त्रिशूल लिए खड़े होते हैं.
लोग केवल मंदिर की सजावट का हिस्सा मान लेते हैं. लेकिन ये सिर्फ सजावट के लिए नहीं होते हैं. ये मंदिर के मुख्य रक्षक होते हैं.
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक वो केवल मंदिर की चौखट की रक्षा नहीं करते हैं. बल्कि किसी भी तरह के नेगेटिव और बुरी एनर्जी को मंदिर परिसर के भीतर आने करने से रोकते हैं.
द्वारपाल शब्द का मतलब तो सीधा और सरल होता है, इसका अर्थ दरवाजे का रक्षक होता है. मंदिर के मेन गेट के दोनों तरफ स्थापित की गई इन मूर्तियों को एक जोड़े के रूप में लगाया जाता है.
द्वारपालों को हमेशा एक ऊंचे, बलशाली और शक्तिशाली शरीर के रूप में दिखाया जाता है. उनके हाथों में गदा, त्रिशूल या अन्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र मौजूद होते हैं.
भारत में बनने वाले लगभग हर छोटे-बड़े सनातन मंदिर में द्वारपाल की मूर्तियां लगाने का नियम बेहद पुराना है. ये रक्षक मंदिर के मुख्य देव स्थल को एक अभेद्य सुरक्षा चक्र प्रदान करते हैं.
एक बार चार युवा ऋषि जिनका नाम सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार था, वे वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु के दर्शन करने पहुंचे.
लेकिन वैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय ने बाल संतों को साधारण समझकर अंदर जाने से रोक दिया.
इस बात से गुस्सा होकर ऋषियों ने जय-विजय को श्राप दे दिया कि वे वैकुंठ से गिरकर धरती पर भगवान विष्णु के शत्रु के रूप में जन्म लेंगे.
बाद में भगवान विष्णु के कहने पर उन्होंने धरती पर तीन जन्मों तक राक्षस बनकर असुर कुल में अवतार लिया. वे हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु, रावण-कुंभकर्ण और शिशुपाल-दंतवक्र के रूप में पैदा हुए.
मंदिर के मेन गेट पर मौजूद द्वारपालों को देखकर आप अंदर विराजमान देवता की पहचान आसानी से कर सकते हैं.
भगवान विष्णु के वैष्णव मंदिरों में द्वारपालों के रूप में हमेशा जय और विजय स्थापित होते हैं. वहीं भगवान शिव के मंदिरों में प्रवेश द्वार पर उनके सेवक या शिवगण पहरा देते हैं.
इसके अलावा माता दुर्गा या अन्य देवी मंदिरों में द्वारपाल के रूप में उग्र रक्षक देवियां या शस्त्रधारी देव खड़े दिखाई देते हैं. हर मंदिर की प्रकृति और देव परंपरा के हिसाब से द्वारपालों का रूप बदल जाता है.
अग्नि पुराण के ग्रंथों में द्वारपालों की शक्ति के बारे में बताया गया है. अग्नि पुराण में साफ कहा गया है कि सभी द्वारपालों में नंदी और महाकाल का स्थान सबसे ऊंचा है.
ये दोनों ही भगवान शिव के प्रमुख गण माने जाते हैं. इसके अलावा मेन गेट के आसपास वास्तु के मुताबिक मूर्तियों का स्थान फिक्स करना भी बेहद शुभ और जरूरी माना गया है.
शास्त्रों के अनुसार द्वारपालों की ये मूर्तियां उन सभी दिखाई न देने वाली शक्तियों को कंट्रोल करती हैं, जो इंसान के मन की बुराइयों और नेगेटिव तरंगों को मंदिर के भीतर जाने से रोकती हैं.
जब भी आप दर्शन करने जाते हैं तो वहां मेन गेट से गुजरते हैं और वहां द्वारपाल की उपस्थिति होती है. जो अपने मन से अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध जैसी भावनाओं को बाहर छोड़ आने की प्रेरणा देती है.
मेन गेट पर बनी ये मूर्तियां मंदिर के पूरे वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाती हैं.
(Disclaimer): यह लेख भागवत पुराण, अग्नि पुराण, वास्तु शास्त्र और प्रचलित हिंदू धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है.